शिष्य हो तो नामवर सिंह जैसा, मुद्राराक्षस जैसा नहीं

दयानंद पांडेय

सच आज की तारीख में अगर शिष्य हो तो नामवर सिंह जैसा। मुद्राराक्षस जैसा नहीं। नामवर जी बीते ३० अगस्त को लखनऊ आए । उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के बुलावे पर। हिंदी संस्थान ने भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी पर व्याख्यान आयोजित किया था। कुसुम वार्ष्णेय भगवती बाबू पर बोलीं। बिलकुल पारंपरिक ढंग से। मुद्राराक्षस अपनी रवायत के मुताबिक अमृतलाल नागर पर बोले विवादास्पद ढंग से। कहा कि नागर जी प्रथम श्रेणी के लेखक नहीं थे। आदि-आदि। इस पर सभा में विवाद भी हुआ। कुछ लोग इतने मुखर हुए कि मुद्रा जी को बोलने नहीं दिए। यह भी शर्मनाक था। लेकिन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी पर नामवर जी बोले बिलकुल पानी की तरह। और इधर जैसा कि वह बढ़ती उम्र के चलते स्मृति दोष के शिकार होने लगे हैं अपने बोलने में जब-तब, आज बिलकुल नहीं हुए। कोई पौन घंटे वह बोले। जैसा एक अभिभूत शिष्य अपने गुरु के लिए बोल सकता है। बिलकुल भक्ति भाव से। उन्हों ने बताया कि कैसे उन के गुरुदेव बिना अपनी हसरत पूरी किए दुनिया से कूच कर गए। उन्हों ने पहले सूर पर लिखा। फिर कबीर पर लिखा। वह तुलसी पर भी लिखना चाहते थे। तैयारी भी कर चुके थे। पर विधिवत तुलसी पर लिखे बिना वह दुनिया छोड़ गए। नामवर ने तुलसी पर उन की लिखी कुछ टीकाओं का हवाला भी दिया। उन्हों ने पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी द्वारा संपादित सरस्वती में तुलसी की रामचरित मानस के अयोध्या कांड की चौपाई:
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथ अमित अति आखर थोरे॥
जिमि मुख मुकुर, मुकुर निज पानी । गहि न जाइ अस अदभुत बानी ॥

पर छपे लेख का विस्तार से ज़िक्र किया। तुलसी की विपन्नता और काशी प्रवास में उन की उपेक्षा को हजारी प्रसाद द्विवेदी की विपन्नता और काशी प्रवास की उपेक्षा से जोड़ा और बताया कि असल में गुरुदेव तुलसी के बहाने अपनी विपन्नता, अपनी उपेक्षा को लिखना चाहते थे। तुलसी ने भी असल में राम के बहाने अपने ही मान-अपमान की कथा लिखी थी। नामवर बोले हर उपन्यास कहीं न कहीं लेखक की आत्मकथा भी होता ही है।



जैसे तुलसी जब बनारस में रहते थे तो बनारस से बाहर रहते थे। अभी भी देखिए कि तुलसी घाट शहर में नहीं शहर से बाहर है। तुलसी भी दरवाज़ा-दरवाज़ा घूम कर एक-एक दाना भिक्षा में बटोरते थे, तब खाते थे। बाबा विश्वनाथ का दर्शन उन्हें नसीब नहीं था। वह शहर से दूर ही रह कर गंगा नहा लेते थे। हमारे गुरुदेव भी उसी बनारस में घूम-घूम कर भागवत बांच-बांच कर जीवन यापन करते थे। शांति निकेतन भी गए पढा़ने तो वहां कोई अच्छी तनख्वाह नहीं मिलती थी। पचास रुपए में कोई बड़े परिवार का खर्च कैसे चला सकता था?वह चलाते थे। तमाम जगहों पर वह लिखते भी रहते थे। बनारस आए। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे।बनारसी राजनीति के शिकार हो कर यहां से भी बर्खास्त कर दिए गए। चंडीगढ़ जाना पड़ा उन्हें फिर पढा़ने के लिए। कहते हैं काशी में मरने से मुक्ति मिलती है। पर हमारे गुरुदेव को मुक्ति नहीं मिली। जैसे कबीर काशी छोड़ मगहर में मरे हमारे गुरुदेव भी दिल्ली में मरे।

हजारी प्रसाद द्विवेदी और उन की रचनाओं से जुड़ी कई अनछुई बातें बड़े मोहक अंदाज़ में आज नामवर ने कहीं। बड़ी शिद्दत और नफ़ासत से । न सिर्फ़ वह डूब कर बोल रहे थे बल्कि सुनने वालों को भी उस में डुबकी लगवा रहे थे। किसी शिष्य का गुरु को ऐसा अवदान मैं पहली बार देख रहा था। और भींग रहा था। बतर्ज़ कबीर बरसे कंबल भींजे पानी। वह व्यौरे पर व्यौरे ऐसे परोसते गए जैसे कोई स्त्री रसोई परोसे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल और राधाबल्लभ त्रिपाठी तक वह ले गए। विश्वनाथ त्रिपाठी के व्योमकेश दरवेश की भी चर्चा की। उन के उपन्यासों और उन की संस्कृत कविताओं की बात की। कहा कि उन के उपन्यासों में भी कविता है। इस बार नामवर के बोलने की खासियत यह भी थी कि वह बिखरे नहीं, कुछ भूले नहीं। उम्र का प्रभाव आज गायब था। अपेक्षतया कम समय बोले लेकिन हम जैसे सुनने वाले गदगद हो गए। और तृप्त हो कर घर लौटे। हालां कि मुद्रा जी भी नागर जी के शिष्य कहे जाते हैं। पर उन्हों ने आज नागर जी के नाम पर जो बड़बोलापन और बदमगजी की वह भी नहीं भूलने वाली है। जाने क्या है कि वह धारा के खिलाफ़ बोलने के चक्कर में इधर कुछ वर्षों से वह निरंतर कुछ का कुछ इस अंदाज़ में बोल जाते हैं कि अर्थ का अनर्थ हो जाता है। वह फ़तवा जारी कर बैठते हैं बिना किसी तर्क या आधार के। कई बार वह अपनी विद्वता का दुरुपयोग करते हुए मिलते हैं। खास कर इधर हिंदी कवियों और लेखकों को ले कर उन का धिक्कार भाव बहुत जागा है। श्रीलाल शुक्ल से जो वह शुरु हुए हिंदी लेखकों की धुलाई पर तो प्रेमचंद तक की धुलाई पर उतर आए। भगवती चरण वर्मा पर भी वह फ़तवा जारी कर चुके हैं। बता चुके हैं कि वह जनसंघी और सामंती लेखक थे। वह बिना रचनाओं का ज़िक्र किए, बिना रचनाओं की पड़ताल किए किसी भी के लिए कुछ भी फ़तवा जारी करने के अभ्यस्त हो चुके हैं। और बिलकुल लगभग कुतर्क करते हुए। मुद्रा जी एकला चलो की धुन में यह भी भूल जाते हैं कि उन्हें आखिर जाना कहां है? एक समय वह लोहियावादी कहे जाते थे पर लोहिया को भी बाद में पानी पी कर कोसने लग गए। तब जब कि वह खुद बताते हैं कि लोहिया जी ने उन का विवाह भी करवाया था। अभी बीते साल कथाक्रम के एक आयोजन में वह कह गए कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान हिंदी कवि भजन लिख रहे थे। आज़ादी की कविताएं या क्रांतिकारी कविताएं तो बस उर्दू में लिखी जा रही थीं। फ़ैज़, इकबाल से लगायत कई नाम उन्हों ने गिना दिए और कहा कि हिंदी में उस समय भजन लिखी जा रही थी। वह मैथिलीशरण से लगायत दिनकर, सोहनलाल द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद , पंत, भगवतीचरण वर्मा आदि सभी को भूल गए। ऐसे ही तमाम मौकों पर वह अखबारी सुर्खियां बटोरने वाले बयान दे जाते हैं। भक्ति साहित्य, संस्कृत साहित्य, वेद, उपनिषद, भरतमुनि के नाट्यशास्त्र, तुलसी आदि से तो उन का बैर भाव जग जाहिर है।स्थापित सत्य है उन का। बहुतों का। पर दिक्कत यह है कि कर्म कांड आदि का विरोध करते-करते वह प्रेमचंद, लोहिया आदि की भी खटिया खड़ी करने में संलग्न हो जाते हैं। विरोध करने के लिए विरोध करने लग जाते हैं। तो बहुत मुश्किल होती है। नहीं सच यह है कि उन के जैसे पढे़ और जानकार बहुत कम लोग रह गए हैं। मैं मानता हूं कि मुद्रा जी का अध्ययन नामवर जी से कम नहीं ज़्यादा ही होगा। पर वह जो बोलने में अतिरेक पर अतिरेक कर जाते हैं वह हम जैसे उन के प्रशंसकों पर कई बार भारी पर जाता है। प्रेमचंद को ले कर तो उठे उन के उबाल को वीरेंद्र यादव ने मानीखेज़ टिप्पणी लिख कर उन्हें शांत कर दिया था। पर भगवती बाबू और अमृतलाल नागर पर उन्हें मकूल जवाब मिलना अभी बाकी है। हां लोहिया पर भी। खास कर इस अर्थ में भी कि जब नामवर जी कह रहे हों कि परंपरा एक वचन नहीं बहुवचन है।



जैसे मुद्रा जी जब नागर जी पर बोलने आए तो कहने लगे कि ऐसे समारोहों में दिक्कत यह है कि झूठ बहुत बोलना पड़ता है। सुनने में बात बहुत अच्छी लगी। पर यह क्या वह तो सचमुच झूठ पर झूठ बोलने पर आमादा हो गए। नागर जी के लेखन पर जैसे उन्हों ने फ़तवा ही जारी कर दिया कि वह प्रथम श्रेणी के लेखक नहीं है। और यह बात जब उन्हों ने एकाधिक बार कही तो किसी ने टोकते हुए पूछा भी कि यह प्रथम श्रेणी का लेखन क्या होता है? पर मुद्रा इसे टाल गए। वह दास्तोवस्की और टालस्टाय आदि का नाम उच्चारने लगे। अपने पूरे भा्षण में वह सिर्फ़ फ़तवा ही जारी करते रहे। नागर जी की किसी रचना का नाम लिए बिना उन्हों ने दूसरा फ़तवा जारी किया कि उन का लेखन पुरातात्विक महत्व का है। फिर उन्हों ने एक वाकया बताया कि एक दिन जब वह नागर जी से मिलने गए तो वह लोहे का बक्सा खोले मिले। उन्हों ने पूछा कि यह क्या? तो नागर जी ने कई कागज़ दिखाते हुए कहा कि जब तुम मेरी जीवनी लिखोगे तो यह सब काम आएगा। तो नागर जी की पत्नी जो वहीं बैठी थीं, बोलीं कि सुभाष जो भी लिखना सच-सच लिखना। ज़िक्र ज़रुरी है कि मुद्रा जी का असली नाम सुभाष गुप्ता है। खैर फिर मुद्रा जी ने इस सच को नागर जी की विपन्नता से जोड़ा। नागर जी के रेडियो की नौकरी छोड़ने का भी व्यौरा बांचा मुद्रा जी ने। फिर उन के व्यक्तित्व पर भी वह ऐसे बोले जैसे नागर जी की सहृदयता या मिलनसारिता आदि भी उन की अपनी नहीं थी। वह बताने लगे कि नागर जी पर वासुदेवशरण अग्रवाल आदि का प्रभाव था। हालां कि यह भी शोध का दिलचस्प विषय होगा कि मुद्राराक्षस के व्यक्तित्व पर आखिर किस का प्रभाव है जो अपनी सारी विद्वता के बावजूद वह बिखर-बिखर जाते हैं। किसी बहस को रचनात्मक बनाने के बजाय विवादित बना कर अधूरा छोड़ देते हैं। और कि बहस के बजाय फ़तवेबाज़ी को तलवार बना लेते हैं। फ़ासिज़्म का विरोध करते-करते खुद अलोकतांत्रिक हो जाते हैं। असहिष्णु हो जाते हैं। फ़ासिस्ट हो जाते हैं। अपनी बात तो वह चाहते हैं कि हर कोई सुने पर वह खुद किसी और की बात सुनने से परहेज़ कर जाते हैं। उन को अगर गुलाब पसंद है तो चाहते हैं कि पूरे बागीचे में सिर्फ़ गुलाब ही हो। यह भला कैसे हो सकता है? वह यह भूल जाते हैं कि किसी और की पसंद कुछ और भी हो सकती है। और कि उस की पसंद को आप भले न पसंद करें, कम से कम सुन तो लें। पर उन को यह सुनना भी गवारा नहीं होता। क्या यह भी एक किस्म का फ़ासिज़्म नहीं है मुद्रा जी? चलिए इस बात को भी दरकिनार कर देते हैं। पर यह तो मुद्रा जी आप भी जानते ही हैं किन मौकों पर क्या बात कहनी चाहिए। तो यह भी जानना क्या अपराध है कि किन मौकों पर क्या बात नहीं कहनी चाहिए? दुर्भाग्य से जानते तो आप यह भी हैं पर अमल में लाते नहीं इन दिनों। अफ़सोस इसी बात का है।



सुनता हूं कि मुद्रा जी एक समय नागर जी से बाकायदा और नियमित डिक्टेशन लेते थे। नागर जी की आदत थी बोल कर लिखवाने की। एक समय मुद्राराक्षस और अवध नारायण मुदगल नागर जी का डिक्टेशन लेने के लिए जाने जाते थे। घर में कुमुद नागर, अचला नागर और शरद नागर ने भी उन के डिक्टेशन खूब लिए हैं। खैर इसी कारण से या किसी और कारण से सही मुद्राराक्षस नागर जी के शिष्य कहे जाते रहे हैं। पर आज उन्हों ने अपनी फ़तवेबाज़ी के गुरुर में नागर जी की सारी रोशनाई धो कर बहा दी अफ़सोस इसी बात का है। मुद्रा जी को जाने कोई बताने वाला है कि नहीं कि साहित्य या कोई भी रचना का कोई कैरेट या डिग्री नहीं होती। पसंद या नापसंद होती है। यह कोई इम्तहान नहीं है कि आप किस श्रेणी में पास हुए। रचना को रचना ही रहने दीजिए मुद्रा जी। अध्ययन एक चीज़ है, उस का दुरुपयोग दूसरी चीज़। जीवन में ज़िद चल जाती है आप की तो ज़रुर चलाइए पर यह फ़तवेबाज़ी की ज़िद अब सार्वजनिक मंचों पर ठीक बात नहीं लगती। नागर जी बड़े उपन्यासकार हैं। रहेंगे। किसी मुद्रा की फ़तवेबाज़ी उन्हें खारिज कर फ़ुटपथिया साबित नहीं कर देगी। बूंद और समुद्र से नाच्यो बहुत गोपाल, खंजन-नयन, मानस के हंस, अग्निगर्भा, करवट आदि उन की तमाम-तमाम रचनाएं उन के पाठकों में ऐसे ही हैं जैसे हवा-पानी, धरती-आकाश। हां फिर भी अगर आप को लगता है कि भगवती चरण वर्मा या अमृतलाल नागर आदि ने इतना खराब लिखा है कि उन्हें खारिज़ कर देना चाहिए तो मुद्रा जी बाकायदा उन की रचनाओं के हवाले से तार्किक ढंग से लिख-पढ़ कर खारिज करिए आप का स्वागत है। पर बार अधकचरे फ़तवे जारी कर गगनविहारी बयान जारी कर यह सब करना आप की विद्वता को शूट नहीं करता। लिखा तो कभी प्रेमचंद को ले कर अलीगढ़ के शैलेष ज़ैदी ने भी था। पर क्या प्रेमचंद की मूर्ति खंडित हो गई? हां शैलेष ज़ैदी अब कहां हैं, कम ही लोग जानते होंगे। माफ़ कीजिएगा मुद्रा जी अगर किन्हीं क्षणों में आप को किसी दिनकर, किसी गिरिजा कुमार माथुर या किसी श्रीलाल शुक्ल या किसी और ने भी बैर भाव में या किसी और भाव में ही सही काट लिया है तो उस का दंश जब-तब जिस-तिस पर बार-बार उतारना आप की सेहत और हिंदी साहित्य की सेहत के लिए ठीक नहीं है। उस दंश को बिसारिए और जानिए कि आप भी हमारी और हिंदी साहित्य की शान हैं, धरोहर हैं हमारी। यही बने रहिए। जैसे नामवर जी के पास भी अंतर्विरोध बहुतेरे हैं। बावजूद इस सब के नामवर जी ने आज अपने गुरुदेव के प्रति उन की रचनाओं को याद कर, उन की तकलीफ़ और उन के संघर्ष को याद कर उन के लिए मन में एक मिठास घोली,मन में और सम्मान बोया। आप भी नागर जी के लिए मिठास भले न घोलते, सम्मान भले न बोते पर बात-बेबात कसैलेपन से तो बच ही सकते थे। माफ़ कीजिए मुद्रा जी आज जो भी कुछ हुआ उसे देखते हुए अपनी बात एक बार फिर से दुहराने को मन कर रहा है कि आज की तारीख में अगर शिष्य हो तो नामवर सिंह जैसा। मुद्राराक्षस जैसा नहीं।आमीन !



दयानंद पांडेय

अपनी कहानियों और उपन्यासों के मार्फ़त लगातार चर्चा में रहने वाले दयानंद पांडेय का जन्म 30 जनवरी, 1958 को गोरखपुर ज़िले के एक गांव बैदौली में हुआ। हिंदी में एम.ए. करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में आ गए। वर्ष 1978 से पत्रकारिता। उन के उपन्यास और कहानियों आदि की कोई डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं।

लोक कवि अब गाते नहीं पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का प्रेमचंद सम्मान तथा कहानी संग्रह ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ पर यशपाल सम्मान।

लोक कवि अब गाते नहीं का भोजपुरी अनुवाद डा. ओम प्रकाश सिंह द्वारा अंजोरिया पर प्रकाशित। बड़की दी का यक्ष प्रश्न का अंगरेजी में, बर्फ़ में फंसी मछली का पंजाबी में और मन्ना जल्दी आना का उर्दू में अनुवाद प्रकाशित।

बांसगांव की मुनमुन, वे जो हारे हुए, हारमोनियम के हज़ार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाज़े, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास), 11 प्रतिनिधि कहानियां, बर्फ़ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण), सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित) तथा सुनील गावस्कर की प्रसिद्ध किताब ‘माई आइडल्स’ का हिंदी अनुवाद ‘मेरे प्रिय खिलाड़ी’ नाम से तथा पॉलिन कोलर की 'आई वाज़ हिटलर्स मेड' के हिंदी अनुवाद 'मैं हिटलर की दासी थी' का संपादन प्रकाशित।

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शिष्य हो तो नामवर सिंह जैसा, मुद्राराक्षस जैसा नहीं शिष्य हो तो नामवर सिंह जैसा, मुद्राराक्षस जैसा नहीं Reviewed by Sushil Gangwar on August 31, 2012 Rating: 5

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