इज्ज़त ही नहीं तो ये बहुमत भी किस काम का?

जगमोहन फुटेला





90 की विधानसभा में अपने कुल 41 विधायक, बाकी बारह का जुगाड़. उस में से एक दिल्ली जेल में दो इधर जाने को तैयार. पांच का जत्था कभी भी विधायकी ख़त्म हो जाने के डर में जीता हुआ. फिर भी हरियाणा की हुड्डा सरकार को कोई संकट नहीं है. हाँ, ये अलग बात है कि उस की कोई इज्ज़त भी नहीं है. हालत ये हो गई है हुड्डा की बदौलत कांग्रेस की हरियाणा में कि उसका लोकराज अब लोकलाज से नहीं चलता.

और ये मजबूरियाँ भी सिर्फ बहुमत न होने की वजह से नहीं हैं. भीतर प्रतिष्ठा का प्राणपण न होने से भी हैं. कुछ जीव ऐसे भी बनाए ही हैं
भगवान ने उन्हें कितना ही सुंदर स्थान दो, वे बैठेंगे उस पर गंदगी मचा देने के बाद. बहार आने से पहले जैसे खिजां चली आती है. वैसे ही गंदगी भी आ जाती है उन के साथ साथ. और फिर हालत ये हो जाती है कि उस से छूटने, मुक्त होने का दिल भी नहीं करता. कांडा एक ऐसा कोढ़ था. ये ओपी जैन और जिलेराम दूसरे हैं. सरकार के पास बड़े साधन होते हैं कोढ़ को नापने और बड़े हथियार होते हैं उसे दूर करने के. लेकिन कांग्रेस ने वो नहीं किया.


कांडा कपड़ों से बाहर है ये किस को नहीं पता था? उन राहुल गाँधी को नहीं पता था जिन के सांसद को सैंकड़ों लोगों के सामने थप्पड़ मारे उस ने सिरसा में?...या उन मुख्यमंत्री को नहीं जिन के मुंह पे मंत्री वाली
गाड़ी और सरकारी संतरी मार के चलता बना था कांडा और चरणवंदना करा लेने के बाद भी लौटा नहीं था अपने गृहमंत्रालय में पूरे एक हफ्ते तक? क्या पता नहीं था कि गुडगाँव में उस ने विवादित संपत्तियां खली कराने, हथियाने और बिकवाने का वो धंधा शुरू कर रखा है जो पुलिस की मदद के बिना चलता ही नहीं पूरे देश में कहीं किसी का? कौन मानेगा कि अपनी पुलिस से जिस जिस को पिटवाते थे कांडा, उसकी जानकारी डीजीपी या मुख्यमंत्री को नहीं होती थी? अगर मुख्यमंत्री कहते हैं कि रपट दर्ज हो जाने के बाद भी उनकी ख़ुफ़िया पुलिस को पता नहीं था कांडा के ठिकानों का तो और पता था फिर भी नहीं बताया तो भी डूब के मर जाने वाली बात है. मगर सरकार फिर भी समझती है कि उस की भी कोई इज्ज़त है.


इज्ज़त, जो हरियाणा की सरकार अक्सर दांव पे लगाती रही है. हर बार सिर्फ हार ही जाने वाले खेल में भी. एक परिवार ने, बाकायदा लिख के, आरोप लगाया कि उस के आदमी से पहले पैसे लिए और फिर उस को जान से मार डाला. रपट नामजद हो तो झूठी होने पर भी दर्ज होती है और कारवाई भी करनी ही पड़ती है. भले ही जांच में पाया जाए कि रपट झूठी थी. मगर यहाँ वो दर्ज ही नहीं हुई. हुई भी तो मुद्दत बाद. उस पे भी कोई कारवाई नहीं हुई. वजह कि रपट में नाम अल्पमत वाली हरियाणा सरकार को समर्थन दे रहे दो निर्दलीय विधायकों का था. अपने लालच के चक्कर में सरकार ने अपनी पुलिस का भी मुंह
काला हुआ, तो हो जाने दिया. कारवाई कोई नहीं होने दी. परिवार ने कहा, जांच सीबीआई से करा दो. वो भी नहीं किया. अब आखिर वो काम अदालत ने किया है. कैसे लगेंगे कांडा के बाद सरकार के मंत्री जैसी सुविधाओं वाले दो और विधायक सीबीआई दफ्तर से अदालत और फिर अदालत से निकल कर वापिस कैमरों के बीच सीबीआई की गाडी में बैठते हुए?


मगर सरकार बेशर्म है. जनता की हिफाज़त नहीं, उस में से किसी की जान जाने की जांच भी नहीं, अपने शर्तिया शातिर विधायकों को बचाना जिस का धर्म है. वो इस मर्म को समझ ही नहीं सकती कि सत्ता से बेदखल हो जाने के लिए पूरा नहीं गीतिका जैसी लड़की का आधा
कत्ल भी काफी है. वो बता के गया है कि गोपलिया कैसे कृष्ण कन्हैया बना हुआ था. कितनों की अस्मत से खेला उस ने. एक तो जायज़ बीवी थी ही उसकी. एक अंकिता भी थी और कम से एक और गीतिका से उसने शादी का वादा किया हुआ था. और फिर एक जहाज़ के लिए जो पचास एयर होस्टेस रख के चलता हो उस के हरम में तो कौन कौन कब कहाँ कहाँ ऐश करते होंगे कौन जानता है? सिरसा के बंसल नर्सिंग होम की तरह किस किस नर्सिंग होम में कौन कौन बाप होने से बचा, ये भी कौन जानता है?


क्या सरकार को पता नहीं था कि कांडा बाकायदा अदालत की इजाज़त से दिल्ली पुलिस द्वारा घोषित किया हुआ भगौड़ा है? कांडा फिर भी मंत्री था. किसी के भी भगौड़ा घोषित हो जाने के बाद उसकी सूचना अखबार में तो छपती ही है. वो आस पड़ोस के राज्यों को भी भेजी जाती है. यकीनन हरियाणा के डीजीपी को भी आई होगी. अगर सरकार को फजीहत से बचाने के लिए डीजीपी ने वो चिट्ठी मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजी न भी हो डिस्पैच पे चढ़ा के तो भी किसी नींच उंच से बचने के लिए ही सही, मुख्यमंत्री को बताया ज़रूर होगा. क्यों मुख्यमंत्री पी गए उसको? तब क्यों, जब सरकार भी नहीं जाती थी?

सरकार तो न एक अकेले कांडा के जाने से जाती थी, न इन दो जैन और जिलेराम के जाने से और न कल को जनहित छोड़ के आये उन पांच विधायकों की विधायकी ही चली जाने से जिन को कि बर्खास्त कर देने की याचिका हाईकोर्ट में विचाराधीन है. बताएं कैसे?

आंकड़े बड़े साफ़ हैं. मान लीजिये कि कांडा के बाद जैन और जिलेराम भी जेल गए. वोट उनके तब भी रहेंगे. न भी रहें या वो दें न. तो भी पांच जनहितियों और बाकी चार निर्दलीयों को मिला कर उस के पास पचास विधायक होंगे. क्या डर है? कल को अगर उन तीन के साथ जनहित वाले पांच की भी विधायकी चली जाती है तब भी बाकी बचे 82 के सदन में स्पीकर समेत कांग्रेस के 45 फिर होंगे. अभी बीएसपी वाला एक भी है. जहां तक सरकार का सवाल है तो वो न मर्डर में जैन और जिलेराम का नाम आने से गिरती थी, न कांडा के कार, गनमैन लौटा देने के बाद गिरती थी. तो?..फिर क्या हुआ कि हुड्डा ने जाटों और मर्दों वाली बात नहीं की? क्यों इस्तीफ़ा भी कांडा से हाईकमान के दबाव में माँगा और इस्तीफ़ा आ जाने बाद भी उस को हरियाणा में दनदनाने दिया दस दिनों तक? सरकार भी चली जाने का डर कोई नहीं था तो फिर ऐसी भी क्या मजबूरी थी?

कुछ लोग बुरे न होते हुए भी कुछ अच्छा न कर पाने को विवश होते हैं. और कुछ दूसरो की मैल अपने सर पे लिए घूमने को अभिशप्त. हुड्डा दोनों हैं. दूसरों पे पर्दा डालते डालते वे खुद बेपर्दा हो गए हैं. हालत ये है कि वे असुरक्षित नहीं हैं फिर भी डरे हुए हैं. बुरे हैं या नहीं हैं, मगर बदनाम हैं. छवि ये बन है उनकी हरियाणा में कि हर कोई उन को धौंस दे लेता है. और वे कुछ कर नहीं सकते किसी का.
छवि ही नहीं हालत भी कोई बहुत अच्छी नहीं है उनकी. हालत ये है कि हौंडा, गोहाना और मिर्चपुर होने से वे रोक नहीं सकते. गुजरात के मामलों की सुनवाई महाराष्ट्र को ट्रांसफर हो जाने पे विजय पर्व मनाने वाली कांग्रेस के हरियाणा से मिर्चपुर केस दिल्ली चला जाता है. मारुति कांड पूरी दुनिया से आने वाले निवेश पे ताला जड़ देता है. रिवाड़ी में खुद अपने ही कांग्रेसी बवंडर किये हुए हैं. जनता है कि सोचती है कि इस कांग्रेस से तो चौटाला भला.


आप देखना. जनहित वाले पांच जाएँ या रहें.
लोकसभा के चुनाव समय से पहले हुए तो पांच साल हुड्डा की ये सरकार भी पूरे नहीं करेगी. विधानसभा चुनाव तो हरियाणा में लोकसभा के साथ ही होंगे. कोई नजूमी मैं नहीं हूँ. बस पिछले पच्चीस बरसों हरियाणा की ढाणी ढाणी, गाँव गाँव घूमे होने का कुछ अनुभव है. अपना ये आकलन है कि विधानसभा चुनाव अगर लोकसभा के साथ हुए तो जीतती भी हारेगी कांग्रेस हरियाणा में. दस में से पांच सीटें वो ले गयी तो हैरानी होगी. विधानसभा के लिए उसका मत प्रतिशत और भी कम होगा. कुछ भी कर के बीस का आंकड़ा भी नहीं छू पाएगी कांग्रेस. वो हाल कर दिया है हुड्डा ने कांग्रेस का हरियाणा में कि वो यूपी, बिहार, उड़ीसा और बंगाल की तरह यहाँ भी लंबे बनवास पे जा रही है. अपने कांडाओं की कीमत तो कांग्रेस को चुकानी ही है.गैर जाटों को तो चुन चुन कर मारा ही है हुड्डा ने कांग्रेस में. शरीफों वाली एक छवि सी थी पार्टी की. गुंडों, लफंगों और कातिलों की सरकार में भरती कर के, उसे भी मिट्टी में मिला मिला दिया है !

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इज्ज़त ही नहीं तो ये बहुमत भी किस काम का? इज्ज़त ही नहीं तो ये बहुमत भी किस काम का? Reviewed by Sushil Gangwar on August 31, 2012 Rating: 5

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