यशवंत-जेल : सात तालों के भीतर चैन की नींद

कल शाम यानी 21 तारीख की शाम 5-6 बजे के आसपास जब बैरक की फील्‍ड में टहलकर थकने के बाद चबूतरे पर आराम फरमाने बैठा तो एक बुजुर्ग और अपरिचित बंदी साथी पूछ बैठे- क्‍या हुआ आपके मामले में? मैंने जवाब दिया - कल 20 को बेल डेट थी, अभी कोई सूचना नहीं मिली है. उन्‍होंने तपाक से कहा - आपकी बेल डेट सुनवाई नहीं हो सकी, वकीलों के हड़ताल से, अब 3 अगस्‍त को नई बेल डेट है.

मैं चमत्‍कृत इन्‍हें कैसे पता? इनसे न तो मेरी कोई बातचीत है न कोई परिचय, फिर इन्‍हें मेरे बारे में इतना कैसे पता? वे मेरा विस्‍मय देखकर मुस्‍कराते रहे. मुझे पूछना पड़ा - आपको यह सब कैसे पता? उन्‍होंने रहस्‍य उजागर किया कि आज के नेशनल दुनिया अखबार में छपा है. मैंने मन ही मन आलोक मेहता को धन्‍यवाद किया कि कम से कम मेरी खबर सबसे पहले मुझ तक पहुंचा दे रहे हैं. बैरक में लौटकर उन बुजुर्ग सज्‍जन से अखबार लेकर पढ़ा तो खुशी में चिल्‍ला पड़ा - अबे साला, रंगदारी की रकम बीस हजार से बढ़कर एक लाख तक पहुंच गई. संभव है अगली तारीख पर खबर में एक करोड़ हो जाए. फिर याद आया कि आलोक मेहता जी के इस नवजात अखबार में शुरुआत में खबर आई थी कि मेरे दो आदमी बाइक से रंगदारी मांगने विनोद कापड़ी के पास गए थे.

मतलब ये कि मुझे महान बनाने में आलोक मेहता जी पूरा योगदान दे रहे हैं. वैसे भी जेल में रहने वाले उन्‍हें ज्‍यादा सम्‍मान देते हैं, जिन पर ज्‍यादा धाराएं हों और ज्‍यादा बड़ा मामला हो. इस लिहाज से नेशनल दुनिया मेरा लगातार प्रमोशन कर रहा है, बिल्‍कुल फ्री में. इसलिए उनका आभार. जेल में मुझे इतनी अच्‍छी नींद क्‍यों आती है, इसको लेकर आजकल चिंतन-चर्चा करता रहता हूं. एक साथी ने कहा - सात तालों में सुरक्षित शख्‍स चैन की नींद नहीं सोएगा तो कहां सोएगा? मैंने उंगलियों पर गिना वाकई कुल सात ताले लगते हैं और सच यह भी है कि यहां सुरक्षा बोध बाहर से ज्‍यादा है. बाहर की दुनिया में जीवन की गारंटी कम है. सड़क पर चलते आशंका, काम करते आशंका, घर पर रहते आशंका, आशंकाओं से घिरी रही बाहरी जिंदगी को यहां वाकई पूरी तसल्‍ली है.

आज योग क्‍लास ज्‍वाइन किया है. सुबह-शाम जमकर दण्‍ड-बैठक-कसरत से कालेस्‍ट्राल लेबल काफी घटा लिया है. दारू छोड़ने के लिए नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती होने की योजना पर अमल की जरूरत नहीं पड़ेगी. यहां मदिरा समेत सारे नशों से खुद-ब-खुद मुक्ति मिल गई है. इस कारण कांफिडेंस लेबल बढ़ रहा है. हृदय और लीवर मुश्किलों से निजात दिलाने के कारण मुझे जरूर थैंक्‍यू बोल रहे होंगे, साथ में विनोद कापड़ी-साक्षी जोशी को भी, अगर वे न होते तो ये न होता. वैसे भी कापड़ी जी से अपन का पुराना याराना है. उनके कारण भड़ास4मीडिया का जन्‍म हुआ, और उन्‍हीं के कारण अब तन-मन शुद्धिकरण होने के साथ एक बिल्‍कुल नई और अनोखी दुनिया से रुबरु हूं.

यहां की पूरी जिंदगी के बारे में ''जानेमन जेल'' शीर्षक से एक किताब लिखने का प्‍लान किया है. जेल पर यह ऐसी किताब होगी जिसे पढ़ने के बाद हर एक का एक बार जेल हो आने का मन होगा, लेकिन सब मेरे जैसे किस्‍मत वाले नहीं. किताब जेल में बंद कई साथियों की जिंदगी पर होगी. और दावा है, हर कोई इसे पढ़ेगा, फिर सोचेगा. अभी तक मैंने कोई किताब नहीं लिखा. जो लिखा वह सब भड़ास4मीडिया पर छपा. लेकिन जेल आने के 18वें दिन मुझे लगा कि अब सही वक्‍त व मैटेरियल है किताब लिखने के लिए. बस केवल प्रकाशक की कमी है. अगर कोई प्रकाशक खोज दे, छापने के लिए तैयार कर दे तो मजा आ जाए. कोई नहीं मिलेगा तो अपने साथी हिंदयुग्‍म वाले शैलश भारतवासी तो हैं ही.

''जानेमन जेल'' लिखने को लेकर काफी उत्‍साहित हूं. हर रोज कुछ नया मिल-जुड़ रहा है. समाज जिन्‍हें दागी मानता है, वे लोग यहां कितने सरल व सच्‍चे इंसान लगते हैं, उनका अतीत कितना खौफनाक, उद्देलित करने वाला होता है, यह जानने-बूझने का क्रम जारी है. अपराध, अपराधी, समाज, सिस्‍टम, संवेदना... हर एक शब्‍द पर एक नहीं कई कई उपन्‍यास के थीम हैं. मेरे लिये यहां अकस्‍मात आना पूर्व नियोजित जैसा लगता है. एडवेंचर की तलाश में पीने-भटकने वाला मैं आजकल तसल्‍ली से इस अनोखी दुनिया का आब्‍जर्वेशन कर रहा हूं. कहने वाले कहते हैं कि डासना जेल यूपी की सर्वाधिक अनुशासित व सिस्‍टमेटिक जेलों में से है. यहां रहकर मुझे भी ऐसा ही अनुभव हो रहा है.

योग क्‍लास ज्‍वाइन करने के बाद अब यहां की भजन मंडली ज्‍वाइन करने की इच्‍छा है. सोर वाद्ययंत्रों से युक्‍त भजन मंडली को सुन-देखकर मुझे अपने काल्पिनिक भड़ास बैंड का मूर्त रूप सामने नजर आता है. वैसे भी मेरी गायकी का बैरक के मेरे कई साथी प्रशंसक हो गए हैं और गाहे बगाहे फरमाइश करते रहते हैं कि जरा वो 'सजधज के मौत की शहजादी आएगी' वाला गाना सुना दो. इस देश-समाज-सिस्‍टम की हिप्‍पोक्रेसी-करप्‍शन-शोषण को बहुत गहरे देख बूझकर और ब्रह्माण्‍ड-धरती के जीवन चक्र को वृहत्‍तर अर्थों में भांपकर कोई शख्‍स बहुत ज्‍यादा उम्‍मीद और उत्‍साह के साथ संवेदनशील जीवन नहीं जी सकता.

वह सुख-दुख दोनों से एक वक्‍त के बाद ऊपर उठने लगता है. सुख है तो सुख नहीं है, दुख है तो दुख नहीं है. नाम हुआ तो क्‍या हुआ, बदनाम हुआ तो क्‍या हुआ. इन विलोम शब्‍दों के परे असली आनंद, जीवन, एमझ आदि है. उस अवस्‍था का एहसास सही रूटीन किस्‍म की लाइफ में संभव नहीं है. घर-परिवार, मकान, नौकरी.. ये सब कुछ बांधते, रोकते, मूढ़ बनाते हैं. भटकना, भोगना, अनुभवों के विविध किस्‍म के भंडार में गोते लगाने से बंद पड़े ज्ञान चक्षु खुलने लगते हैं. तभी बुद्ध पैदा होते हैं, तभी कबीर का निर्माण होता है. तभी दूरदृष्टि का विकास होता है. पता नहीं मुझे क्‍यों लगता है कि जेल में आकर ज्‍यादा आजाद हूं. घर-परिवार, आफिस-कम्‍प्‍यूटर के साथ रहते हुए एक बंदी सा जीवन जी रहा था. इन्‍हें छोड़ना आसान नहीं होता. क्‍योंकि इससे अलग हम जिंदगी की कल्‍पना ही नहीं कर पाते. हमारा माइंडसेट समाज-सिस्‍टम ने ऐसा बना रखा है. बड़ी मुश्किल हुई होगी राजकुमार गौतम को राजमहल-राजपाट त्‍यागने में, तय करने में बहुत दिन लगे होगे, पर तज दिया तो नई शुरुआत हो गई.

मनुष्‍यों की भीड़ में, विचारों की रेलमपेल में बड़ा मुश्किल है स्‍वतंत्र तरीके से सोच पाना, कर पाना, जी पाना और कह पाना. जिन दिनों गार्ड पार्टिकल यानी हिंग्‍स बोसोन कण के पता चलने का ऐलान हो रहा था, उन दिनों मैं जेल में बंद कथित बुरे लोगों के भीतर नया गुण-रूप-भार धारण करने को तैयार उप अणु अर्फ गार्ड पार्टिकल देख रहा था. महर्षि अरविंद की एक कविता अमर उजाला अखबार में पढ़ रहा था अणु, इलेक्‍ट्रान और जीवन के ऊपर. सोचने लगा हर युग में संवेदनशील और जीवन को बूझने में लगे लोगों का एक समूह रहा है, जिसने तात्‍कालिक आवेगों, उत्‍तेजनाओं, भावनाओं, प्रतिक्रियाओं के बहुत आगे देखने-समझने-पाने की कोशिश की. मुझे लगता है कि हर किसी की अपनी अपनी यात्रा, समझ, चेतना होती है और वह उसी के इर्द-गिर्द दुनिया की गुणा-गणित, लंबाई-चौड़ाई-गहराई मापता है.

आखिर में कहना चाहूंगा कि मेरा किसी व्‍यक्ति से कोई बैर नहीं, लड़ाई मेरी खुद से है, और भ्रष्‍ट सिस्‍टम से है. इस प्रक्रिया में, इस कार्रवाई में जो नए नए अनुभव मिल रहे हैं, वे चेतना के लेबल पर इवाल्‍व कर रहे हैं. खुद को और सबको समझने की में मदद दे रहे हैं. यशवंत रहे ना रहे, यह सोच जिंदा रहेगी, प्रयोग करने की चाहत जिंदा रहेगी, नया कुछ खोजने की आदत जिंदा रहेगी. इसी चाहत, जिद, खोज ने सृष्टि को बढ़ाया, निखारा है, तमाम विसंगतियों के बावजूद सात तालों में चैन की नींद का रहस्‍य मेरे लिए भी रहस्‍य है. वह भी तब जब मदिरा लंबे समय से पीने वाला आदमी अचानक छोड़ने को मजबूर हो जाए. तब अनिद्रा एक बड़े संकट के रूप में सामने आता है. लेकिन यहां रात नौ बजते ही आसपास के साथियों के आपसी वार्तालाप के बीच ऐसी नींद आती है कि सुबह छह बजे ''उठ जाओ रे... चलो रे चलो'' की राइटर की दहाड़ती गुड मार्निंग मार्का आवाज से ही टूटती है.

मैं ही नहीं सबके सब खूब सोते हैं. दिन में भी, रात में भी. अनिंद्रा और हाइपर टेंशन की कैद में करवट बदलते महानगरियों को सलाह है कि वे जिंदगी चाहते हैं तो जेल टाइप सिस्‍टम डेवलप करें, जहां सामूहिकता-बराबरी-सुरक्षा और पक्‍कड़पन साझा मौजूदगी हो. जेल से मैं भी डरता रहा हूं, क्‍योंकि समाज जेल को बुरी जगह के रूप में देखता है. यहां आकर लगा कि अब तक मैं बुरी जगह और बुरे लोगों के बीच था, जहां हर कोई अपने घात, ताक, स्‍वार्थ, चिंता में डूबा होता है. यहां तो सब विश्राम की मुद्रा में है, सबका सब कुछ स्‍थगित है, बस ढेर सारा जीवन है. जो यातना, यंत्रणा, भागमभाग, पीड़ा, बेचैनी इन‍के हिस्‍से में है, वह बाहर निकलने के बाद के लिए पेंडिंग है. उधार के छह पन्‍ने भर चुका हूं. अब जगह नहीं है. प्रणाम, सलाम, नमस्‍ते.

यशवंत

(भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत ने यह लेख जेल के भीतर 21 जुलाई को लिखा है)

Sabhar- bhadas4media.com

यशवंत-जेल : सात तालों के भीतर चैन की नींद यशवंत-जेल : सात तालों के भीतर चैन की नींद Reviewed by Sushil Gangwar on July 28, 2012 Rating: 5

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