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यशवंत की गिरफ्तारी का मतलब न्‍यू मीडिया की बढ़ती ताकत

यशवंत सिंह यानि किसी जमाने में परम्परागत मीडिया को त्याग कुछ मिशनरी टाइप पत्रकारिता करने का जज्बा। मुझे याद है जब यशवंत ने दैनिक जागरण छोड़ दिल्ली में भड़ास ब्लॉग शुरू कर एक नया कुआं खोदा था। धीरे-धीरे भड़ास ब्लॉग पर हजारों की संख्या में पाठक और लेखक जुड़ गए। फिर आया भड़ास4मीडिया। उन्हीं दिनों मैंने भी जी न्यूज़ छोड़ा था और खुद का प्लेटफार्म वेब एंड मोबाइल मीडिया खड़ा किया। यशवंत और हम दोनों न्यू मीडिया की शुरुआत आकर रहे थे।

वे दिल्ली में थे और मैं यूपी के फर्रुखाबाद जैसे छोटे जिले में ग्रामीणों के लिए काम करने चला आया। अक्सर फोन पर इस मीडिया को चलाने के लिए बातें होती। कैसे खड़ा होगा, कहाँ से पैसा आएगा? फिर चल निकला। अलोक तोमर के लिखे सरकार की पोल खोलते राज इस पर छपे। ये भारत ही नहीं दुनिया के लिए भी नयी खबर थी। अलोक तोमर ने मीडिया और सरकार के बीच के रंडी भडुए जैसे कई रिश्ते खोल पूरी दुनिया में नंगा कर दिया। ये कुव्वत न्यू मीडिया की थी, जो सब खोल दे रहा था। यहाँ न विज्ञापन का दबाब था और न ही किसी को खुश करने की चाहत। केवल एक चाहत थी- जनता जाने इस देश में क्या और कैसे कैसे चलता है। कैसे अन्ना को फेल किया जाता है और कैसे राडिया का ब्लैक कोट कब, कहाँ और किसके कहने पर पहना जाता है। कौन हैं राजीव शुक्ल और कौन हैं एन राम।

बरखा दत्त होंगी टॉप रिपोर्टर मगर अब आम जनता उन्हें रिपोर्टर से ज्यादा दलाल मानती है। जो देश के लुटेरे राजा को सत्ता दिलाने में भूमिका निभाती रही। यकीन करने में कोई गुरेज नहीं। अब ये सब आदर्श नहीं रहे। इन सब का स्याह चेहरा अब जेहन में बस चुका है। और विनोद कापड़ी के बारे में कुछ कहने की जरुरत नहीं। न्यूज़ चैनल की सफलता के माने ये कतई नहीं कि बहुत बेहतरीन पत्रकार हैं। यशवंत के साथ जो सलूक आपने अपने सम्बन्धों के आधार पर कराया है इससे आपका ग्राफ बुरी तरह गिरा है। सफलता से ज्यादा सफलता कैसी है इस बात पर चर्चा अधिक होती है। देश की टॉप क्लास की कॉल गर्ल के ठाठ बहुत सफल हो सकते हैं, मगर जिस प्रकार का काम करके वो सफलता पाई हुई होती है, उसे सभ्य समाज में कोई जगह नहीं देता। ठीक वैसे ही मीडिया की सफलता है।

यशवंत की गिरफ्तारी कर यूपी पुलिस ने तो बहुत अच्छा काम किया ही है कापड़ी ने भी अपनी औकात दिखा दी है। अब पुलिस गुंडों और बदमाशों को पकड़ने की बजाय भले आदमी और मीडिया को ही अन्दर करेगी। यही दिन देखना बाकी रहा था। और कापड़ी जी अपनी लेखनी से किसी को झुकाते तो समझते तुम्हारी जिम्‍मेदारी। शराब के जाम के साथ बने पुलिसिया रिश्ते की दम पर आतंक फैलाना कोई मर्दानिगी नहीं है। कापड़ी जी आपकी जगह किसी नेता ने ये काम किया होता तो इतना अफ़सोस नहीं होता मगर आप पत्रकार की गिनती में खुद को शामिल करते हैं इसलिए जो कृत्य आपके द्वारा कराया गया बेहद शर्मनाक है।

अब अखिलेश की यूपी सरकार की बात करें। मुझे समझ में नहीं आता कि यशवंत ने कुछ दिनों पहले शिवपाल यादव से वेबसाइट का जन्मदिन क्यूँ मनवाया था? क्या वे शिवपाल से परिचित नहीं थे या फिर उन्हें भी राजनेताओं से सम्बन्ध बनाने की जरुरत पड़ गयी थी। मिलेंगे तो जरुर पूछेंगे। हम लड़ाई लड़ेंगे। यक़ीनन लड़ेंगे। मिलकर लड़ेंगे। गाँव से लेकर दिल्ली तक न्यू मीडिया के साथी यशवंत के साथ है और ये संख्या एक दो तीन नहीं एक लाख से ऊपर है। दिल्ली हिलाने की कुव्वत है न्यू मीडिया में। कहीं ऐसा न हो कि न्यू मीडिया को दिल्ली चलो का नारा लगाना पड़े।

लेखक पंकज दीक्षित जेएनआई न्‍यूज के संपादक हैं. वे कई मीडिया संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं

Sabahr- Bhadas4media.com.

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