मीडिया में भरे चूतिये और दंगों की दहलीज़ पे खड़ा समाज

जगमोहन फुटेला


देश के पहले हिंदी न्यूज़ चैनलों में से एक कल से मुसलमानों की बहुतायत वाले एक गाँव की पंचायत के पीछे पड़ा है. छाती पीट पीट के कह रहा है कि पंचायत तालिबानी हो गई है. उसे तकलीफ है कि पंचायत को किसी भी औरत के तलाक लिए बिना किसी भी दूसरे मर्द के साथ रहने पर ऐतराज़ क्यों है?


चैनल को लगता है कि किसी भी औरत को किसी से भी शादी कर के किसी भी और पुरुष के साथ रहने, सोने का हक़ है और ये हक़ उसे नहीं मिला तो औरत की आज़ादी खतरे में है. एक मौलवी साहब का चेहरा वो बार बार दिखा रहा है जो कह रहे हैं कि तलाक लिए बिना कोई औरत किसी दूसरे मर्द के साथ नहीं रह सकती. इन मौलवी साहब के चेहरे को वो हिंदुस्तान में तालिबान की तरह पेश कर रहा है. खबर का रिपोर्टर और उस में वायस ओवर देने वाला दोनों हिंदू हैं. इस चैनल का संपादक और मालिक भी. दोनों दाढ़ी वाले हैं. दोनों को ही अल नहीं है कि शरीयत क्या होती और क्या कहती है.



शरीयत को भी छोड़ो. तमगे के लिए पहले भी इस हिंदुस्तान में किसी को भी आतंकवादी बता के उड़ा देने की आज़ादी पुलिस वालों हासिल रही है. और टीआरपी के लिए किसी भी चैनल को कुछ भी बकने, बताने, दिखाने की. मगर कोई पूछे इन से कि इस्लाम में न सही. तुम्हारे खुद के धर्म, समाज या प्रांत में ऐसी छूट है औरतों को? कितनी तुम्हारे खुद के खानदान या परिवार में रही हैं ऐसी कि जिन्हें तुम्हारे पुरखों ने इधर शादी कर के तलाक लिए बिना उधर किन्हीं के साथ भी रात गुज़ारने की इजाज़त दी है? किस शास्त्र या कानून की किताब में पढ़ा है तुमने, इतिहास या मॉस काम की किसी किताब में कि ये जायज़ रहा है किसी भी देश में? अरे सुसरो जो खुद तुम्हारे परिवार, समाज में जायज़ कभी नहीं रहा तो वो मुसलमानों में नाजायज़ क्यों है? क्या गुनाह कर दिया है मौलवी साहब ने या उस पंचायत ने ये कह के कि किसी की औरत किसी और के साथ नहीं सोएगी. अकल के अंधो कुछ तो शर्म करो!



मैं बताता हूँ कि ऐसा कि ऐसा हो क्यों रहा है. टीआरपी ही एक वजह नहीं है. वजह ये भी है कि चैनल वालों ने अपने यहाँ चूतिये भरती करने शुरू कर दिए हैं. दिल्ली में आ के जिन्हें रिक्शा चलाना चाहिए था वे रिपोर्टर, इनपुट, आउटपुट और एग्ज़ीक्यूटिव एडिटर हो गए हैं. टीआरपी ला के देने के एक्सपर्ट भी. मालिकों ने भी मान लिया है कि इंडस्ट्री की समझ है तो बस उन्हें है. भाषा और मुद्दों के ज्ञानी भी हैं तो बस वही हैं. बावजूद इस के कि टक्कर वे दो ट्रेनों नहीं, दो ट्रेन में हुई लिखते और बताते हैं और लोग भले ही दस मर गए हों कहीं मगर लाश उनके लिए वहां सिर्फ एक होती है. एक हो या दस लाशें की बजाय होती वो उन के लिए सिर्फ लाश है. जिन्हें पंजाबी नहीं होती वे एक बार भी पंजाब जाये बिना पंजाब के एक्सपर्ट होते हैं और सेंसेक्स या निफ्टी का जिन्हें शाब्दिक अर्थ तक नहीं मालूम वे मुद्रा बाज़ार के विशेषज्ञ. गज़ब हो गया है. जिन्होंने कानून की एक किताब या कभी किसी ला कालेज का गेट तक नहीं देखा वे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट कवर करते हैं. जिन्हें मालूम ही नहीं कि शरीयत क्या होती है वे मुसलमानों को इस्लाम पढ़ाने चले हैं.


खासकर ये देश जिसे हम भारत के नाम से जानते हैं धर्म के नाम पर किसी भी छोटी मोटी छेड़छाड़ पे सैंकड़ों जानें ले लेने वाले दंगों के लिए बदनाम रहा है. खासकर जब वे किसी अल्पसंख्यक समुदाय के साथ हुई हों. और सच बात तो ये है कि कश्मीर से लेकर यूपी और संसद से लेकर ताज, मुंबई तक हम उसी को भुगतते आ रहे हैं. क्यों खेल रहे हो बेकसूरों के खून से ऐसे में. क्यों आप को ये आज़ादी दी जानी चाहिए? क्यों आपको ही बाहर कर दिया जाये उस मीडिया से, जिस में ज़हर भर के आप निर्दोषों की जान लेने पे उतारू हो? मेरे ख्याल से ऐसे किसी भी मीडिया कृत्य पे रिपोर्टर से लेकर मालिक तक को आईपीसी में वर्णित सांप्रदायिकता फैलाने की धारा 153 और उस के उपबंधों के तहद गिरफ्तार कर जेल भेज देना चाहिए. क़ानून बड़ा साफ़ है इस मामले में. वो कहता है कि सांप्रदायिकता का फ़ैल जाना ही नहीं, उस के फ़ैल जाने की कोशिश या उस का अंदेशा भी दंडनीय अपराध है.



कानून जब तक ये करे तब तक चैनल एक काम खुद करें. कम से कम इतना कि कोई हिंदू कम से कम अब इस्लाम की व्याख्या नहीं करेगा. और न कोई मुसलमान किसी वेद या शास्त्र की. मेरी बात नोट कर के रख लें पाठक बंधू. ये न हुआ तो अगला कोई भी सांप्रदायिक उपद्रव मीडिया में घुसे ये चूतिये ही करायेंगे. इनका हिसाब रखना. हिंदुस्तान को तालिबान तो ये नादान बना के छोड़ेंगे!

मीडिया में भरे चूतिये और दंगों की दहलीज़ पे खड़ा समाज मीडिया में भरे चूतिये और दंगों की दहलीज़ पे खड़ा समाज Reviewed by Sushil Gangwar on July 20, 2012 Rating: 5

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