तुम्हारा अंजाम यही हो सकता था, यशवंत..!

-जगमोहन फुटेला-


यशवंत की गिरफ्तारी की खबर और इस लेख को लिखने के बीच मैंने बीस बार सोचा है. सोचा लिखूं तो शायद मौकापरस्ती मानी जायेगी. न लिखूं तो पंजाबी के सिरमौर लोककवि सुरजीत पातर के शब्दों में...

कुझ किहा ते हनेरा जरेगा नहीं,
चुप रिहा ते शमादान की कै(ह)णगे?

(मेरे कुछ कहने से अँधेरा जल नहीं उठेगा, चुप रहा तो दीपक क्या कहेंगे?)

हाँ मैं वेब मीडिया में हूँ. journalistcommunity.com, buddhijeevi.com और shraddhaanjali.com समेत कुछ वेब साइट्स मेरी भी हैं. सवा सौ डालर से अधिक मासिक भुगतान वाला कैनेडियन सर्वर है हमारे पास. देश दुनिया के कहते कहाते पत्रकार और बुद्धिजीवी जुड़े हैं हमारे साथ. पच्चीस लाख से अधिक लोगों तक पंहुच है हमारी. विज्ञापन हम फिर भी किसी से नहीं मांगते. इस के पीछे एक सोच रही है हमारी ....अखबारों और टीवी में अब कोई पैंतीस साल के अनुभव के बाद मैं ये मान के चला हूँ कि अपने लेखक (कंट्रीब्यूटर) से जब आप कुछ भी कह के पैसे लेते हो तो फिर वो कुछ भी लिखेगा और वो आपको छापना भी पड़ेगा. अक्सर आँख मूँद कर, बिना एडिट किये भी. और उसकी स्वाभाविक परिणति ये होगी एक दिन कि जिस दिन किसी के लिखे पे कोई पंगा होगा तो आप अपनी खुद की साईट की क्रेडिबिलिटी की खातिर उस नंगे, चंगे लिखे के साथ खड़े भी होओगे. ठीक उतनी ही, या उस से भी ज्यादा नंगई के साथ. और फिर ये सब करते करते आप खुद भी एक दिन वही करने लगोगे. वैसी ही चिरकुटी.

वेब मीडिया खुद पत्रकारों, किसी संपादक मंडल या प्रेस कौंसिल की किसी नियमावली और बंधन से तो मुक्त है ही. वो समझता है कि हिट्स और फिर उस पे विज्ञापन जुटाने, पाने के लिए सब जायज़ है. जैसे ये कि आप किसी के खिलाफ कुछ भी लिखोगे, छापने से पहले किसी तरह की कोई तस्दीक भी नहीं करोगे, फिर भी कोई सबूत समेत आपको जवाब भेज ही दे तो उसको छापोगे या नहीं भी छापोगे. और कुछ भी लिखने पे आप आओगे तो बख्शोगे मरे हुओं को भी नहीं. खुद मेरे साथ हुआ एक बार. 'भड़ास' पे छपा कि मैंने प्रभाष जी के खिलाफ राजस्थान पत्रिका के मालिकों को एक शिकायती चिट्ठी लिख मारी. और यूं उनका अपमान किया. मेरे लाख कहने के बावजूद यशवंत मुझे वो चिट्ठी नहीं दिखा सके. इसका भी कोई जवाब कभी नहीं मिला कि अगर मुझे कोई शिकायत प्रभाष जी से थी भी तो शिकायत मैं रामनाथ गोयनका की बजाय कुलिश जी से क्यों करूंगा? मैं उनके खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज कराने की सोच ही रहा था कि एक रात, आधी रात के भी कोई घंटे भर बाद यशवंत ने मुझे सोते से उठा कर 'बड़े भाई प्रणाम' कहा और फिर बिना कुछ और कहे पूछे मां बहन की गालियाँ देने लगे. मैंने जितनी बार फोन काटा, उतनी बार फिर मिलाने के बाद. मेरे द्वारा उनका नंबर रिजेक्ट लिस्ट में डाल देने तक. अगली सुबह उनका माफ़ी का एसएमएस आया. फोन भी. और पता नहीं कितने मेल भी.

मैं पंजाबी हूँ. ऐसा कि खुद्दारी जिस में कूट कूट कर भरी है. जी में आया कि चंडीगढ़ पुलिस से उठवा कर इधर मंगवाऊँ और वो हाल करूं कि फिर कभी किसी को रात में फोन कर गरियाना भूल जाए. लेकिन मेरे घनिष्ठ मित्र दयानंद पांडेय आड़े आ गए. बोले, समझ लो वो दुनिया में है ही नहीं. क्या करोगे उसका जो खुद लिखता है कि मैं मांग के पीता हूँ, पी के गरियाता हूँ और फिर उन्हीं से पैसे लेकर अगले दिन दूसरों को गरियाने लगता हूँ...आज मैं महसूस करता हूँ कि अगर कुछ दिन मैंने उनके चंडीगढ़ की अदालतों या जेल में कटवा दिए होते तो शायद वे कापड़ी और उनकी पत्नी को तंग और ब्लैकमेल नहीं करते. उनके खिलाफ रपट नहीं होती, वे अंदर नहीं होते और भड़ास भी आज बंद नहीं होती.

यशवंत की वो सारी मेल और एस.एम.एस. आज भी सुरक्षित हैं मेरे पास. उन्हें छाप कर अभी मैं न तो किसी की कोई मदद कर रहा हूँ, न बदला ले रहा हूँ. लेकिन वो सब मेरे ये मान लेने के लिए काफी है कि नीचता की किस हद तक यशवंत गिर सकते हैं और आप उनकी न मानें तो फिर आप के साथ बदतमीजी की किस हद तक जा सकते हैं. अपने अनुभव से मैं ये मान के चल रहा हूँ कि विनोद कापड़ी और उनकी पत्नी के साथ वे किसी भी हद तक गए होंगे. क्या कसूर है उनका? क्या ये कि उन ने प्रेम किया और शादी कर ली? पत्रकार के रूप में दोनों का गुनाह क्या है और उनके निजी जीवन में झाँकने का आपको हक़ क्या? आपको उनके किसी लिखे, कहे पे कोई आपत्ति नहीं है तो फिर आप उनको फोन, एस.एम.एस. कर ही क्यों रहे हो? कर रहे तो कैसे न मान लें कि उसके पीछे आपका कोई दुर्भाव नहीं रहा होगा. मार देने का न सही, पैसे मांगने का. पैसे जो आप को किसी भी कीमत पर चाहिए. सिर्फ अपनी साईट चलाने नहीं, खुद आपके मुताबिक़ दारू पीने, पिलाने और उस के अलावा अपने रिश्तेदारों के खिलाफ पुलिस कारवाई में मदद के लिए भी.


पत्रकारिता के किन सरोकारों के लिए काम किया है आपने. कौन सा ऐसा धाँसू कांसेप्ट ले के आये आप कि पत्रकारिता जगत के दिन बहुर गए? आप किसी का भी हित नहीं सिर्फ साईट के हिट्स देख रहे थे. कभी किसी अख़बार या चैनल में संपादक छोड़ो, ब्यूरो प्रमुख तक की जिम्मेवारी निभाई नहीं आपने. न वैसी कभी कोई जिम्मेवारी, न सोच, न परिपक्वता, न प्रतिष्ठान की प्रतिष्ठा की कोई चिंता. पंजाबी की एक कहावत है कि भूखे की बेटी जैसे ही अमीर हुई तो लगी वो धूल उड़ाने. आप हर उस आदमी की उतारने लगे जो आप को लगता था कि आप से आगे निकल चुका है. ये 'भड़ास' शब्द का चयन भी आपकी उसी सहज प्रतिक्रिया का हिस्सा था. अंग्रेजी में 'भड़ास' को 'फ्रस्ट्रेशन' ही कहेंगे. आप वो निकालने लगे. गरियाने से लेकर, धमकाने और फिर किसी हद बेलगाम इस विधा वाले मीडिया की मिली आज़ादी को ब्लैकमेल कर सकने की सुविधा तक.

वो भी आपसे हुआ नहीं. पत्रकारिता की सारी सीमाएं, नैतिकताएं लांघ कर सिर्फ और सिर्फ हिट्स जो जुटाए भी आपने तो विज्ञापन फिर भी नहीं मिले आपको. हो सकता है गलत कहा हो किसी ने मुझे कभी वायस आफ इंडिया में. लेकिन इतना तो अमित सिन्हा भी कहते थे कि वायस आफ इंडिया के खिलाफ भड़ास पे कभी कुछ नहीं छप सकता. चार सौ पत्रकारों की बलि चढ़ा दी गयी वहां. एक शब्द नहीं लिखा आपने कभी उस के खिलाफ. गलत या सही, धारणा आपके बारे में यही है कि आप किसी भी प्रतिष्ठान के खिलाफ अभियान चला कर बाकियों को डराते हैं. आप खुद लिख चुके हैं कि प्रतिष्ठानों से जो पैसे मिलते थे,अब नहीं मिलते. विज्ञापन भी आप को जो मिले वो दिखावटी थे. मैंने फ्री में चलने, दिखने वाले विज्ञापन बहुत देखे हैं चैनलों और अखबारों में. वे इस लिए भी होते हैं कि वे विज्ञापन की हैसियत वाले दिख सकें. आप ने भी वो किया है. दो महीने के लिए विज्ञापन आपने महज़ डेढ़ हज़ार में भी चलाया है. जब वो चला तो तब सिर्फ वही एक विज्ञापन था भी आपके पास. पच्चीस रूपये रोजाना. सोढे के बिना पियें तो भी एक पैग नहीं आता उतने में! उस पर मीट मुर्गा छोड़ो, अचार की एक डली भी नहीं देगा कोई.


'भड़ास' के रूप में आपकी फ्रस्ट्रेशन अब आपने अंतिम परिणाम को पंहुच गई है. जिस राह पे आप चले उसकी स्वाभाविक मंजिल ये ही हो सकती थी. जहां भी रहो ये जानने की कोशिश ज़रूर करना कि जब ये सब हुआ आपके साथ तो साथ कितने लोग थे. और आज अगर अकेले हो तो उस की वजह क्या है?

....बात होती रहेगी.

Sabhar- Journalistcommunity.com

तुम्हारा अंजाम यही हो सकता था, यशवंत..! तुम्हारा अंजाम यही हो सकता था, यशवंत..! Reviewed by Sushil Gangwar on July 02, 2012 Rating: 5

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