क्योंकि सोनिया के रिमोट में ही खोट है





एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

असहनीय धूप के साथ घबराहट पैदा करने वाली उमस की जुगलबंदी लोगों की दिनचर्या एवं सेहत पर भारी पड़ रही है। सूरज फिर आग उगलने लगा। अर्थ व्यवस्था ने मौसम की उमस को और दमघोंटू बना दिया है और इसे समझने के लिए अर्थ शास्त्री होना जरूरी नहीं भी है। थोड़ा आंख कान खुले होने चाहिए। पर संकट यह है कि आम आदमी आर्थिक मामलों से घबड़ाता है। कमाया और बीवी के हवाले घर की जिम्मेवारी। न कोई हिसाब किताब,​​ न कोई सरोकार। पढ़े लिखे भी अर्थ व्यवस्था से कतराते हैं। तकनीक समझने में आज शाइनिंग इंडिया के गली गली पसरे शंघाई में किसी को कोई तकलीफ नहीं है , पर अपने बहिष्कार और कत्ल के चाकचौबंद इंतजाम को नजरअंदाज करके हम खुद सत्तावर्ग की नरसंहार संस्कृति को आक्सीजन दे रहे हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था का हाल पिछले कुछ वक्त से बेहाल नजर आ रहा है। आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं। जीडीपी का घटकर 9 साल के सबसे न्यूनतम स्तर 5.3 फीसदी तक पहुंच जाना, कृषि क्षेत्र में महज 1.7 प्रतिशत का विकास तो उत्पादन के क्षेत्र महज 0.3 प्रतिशत विकास दर, बढ़ता वित्तीय घाटा और बढ़ती महंगाई। एसएंडपी ने कहा है कि शक्तिशाली कांग्रेस अध्यक्ष और नियुक्त प्रधानमंत्री के बीच भूमिकाओं का विभाजन है। इसी के चलते नीति निर्धारण ढांचा कमजोर हुआ है। एसएंडपी की चेतावनी के बाद सरकार कोई ठोस कदम उठाने के बजाय अब भी आर्थिक संकट होने से इनकार कर रही है, लेकिन इस इनकार से कुछ होने वाला नहीं है क्योंकि विदेशी निवेशक इस रेटिंग और रेटिंग एजेंसी पर बेहद भरोसा करते हैं। एसएंडपी ने अपनी ताजा रिपोर्ट में भारत की ऋण साख घटाने की चेतावनी दी है। उसने कहा कि धीमे विकास और नीति निर्धारण में राजनीतिक अवरोधों के चलते भारत निवेश ग्रेड रेटिंग खोने वाला पहला ब्रिक देश बन सकता है।एसएंडपी ने कहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अलग भूमिकाएं होने के चलते ही देश में सुधारों की गाड़ी अटकी पड़ी है। आर्थिक उदारीकरण में रुकावट के लिए सहयोगी दल और विपक्ष जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि केंद्र सरकार में नेतृत्व ही इस संकट की जड़ है।फिलहाल, इंवेस्टमेंट ग्रेड कैटेगरी में भारत सबसे निचले स्तर पर है। बीबीबी रेटिंग के साथ रूस और ब्राजील भारत से एक पायदान ऊपर हैं। भारत के अलावा सभी ब्रिक देशों का आउटलुक स्टेबल है। एजेंसी ने विल इंडिया बी द फस्र्ट ब्रिक फॉलन एंजलि! शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें यह चेतावनी दी गई है। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने वैश्विक रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (एसएंडपी) की उस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया है कि भारत ब्रिक देशों में अपनी निवेश ग्रेड रेटिंग गंवाने वाला संभवत: पहला राष्ट्र हो सकता है। ब्रिक में ब्राजील, रूस, भारत और चीन आते हैं। वित्त मंत्री ने कहा कि आगामी महीनों में आर्थिक वृद्धि की संभावनाओं बढ़ेंगी।एस एन्ड पी ने अपनी रिपोर्ट में कहां हे पिछले दस सालों में ब्राजील, रूस और चीन के साथ साथ भारतीय अर्थव्यवस्था भी तेजी से बढ़ी है, लेकिन अब हालात और हैं।आर्थिक सुधारों को अगर तेजी नहीं दी गई तो इन देशों के मुकाबले भारतीय अर्थव्यवस्था पिछड़ जाएगी।

औद्योगिक उत्पादन लगभग शून्य है और अर्थ व्यवस्था चौपट है। संपूर्ण बहुमत न मिलने की 1984 से चल रही परंपरा को राजनीतिक बाध्यता बताकर असलियत पर पर्दा डालने का कारोबार चल रहा है। जबकि अल्पमत नरसंह राव सरकार ने बिना बहुमत देश की अर्थ व्यवस्ता को खुला बाजार बना दिया और तबसे आर्थिक सुधार बेरोकटोक जारी है। भारत अमेरिका परमाणु संधि बी बिना बहुमत पास हो गयी। तो नीति निर्धारण में विकलांगता की वजह ​​संसद नहीं है, न संविधान है और न लोकतांत्रिक व्यवस्था, अब ताजा रेटिंग रपट से यह खुलासा हो ही गया कि शरीकी मारामारी नहीं, क्षत्रपों की महांत्वांक्षा भी नहीं और नउनकी निर्मम सौदेबाजी, असली वजह सोनिया गांधी के उस रिमोट में है जिसमें गैर संवैधानिक गैर संसदीय तत्वों के सहारे आहलूवालिया , सैम पित्रोदा, नंदन निलेकणि, रंगराजन जैसे लोगों के जरिये प्रणव मुखर्जी, कमलनाथ, चिदंबरम के कंधे पर बंदूक रखकर सरकार और अर्थ व्यवस्था का संचालन कर रही हैं। बिना किसी वित्तीय नीति के महज मौद्रिक कवायद और बहुजनों के बहिष्कार और नरसंहार संस्कृति के जरिये। कारपोरेट​ ​इडिया, काला धन, बिल्डर प्रोमोटर माफिया, काला बाजार, भ्रष्टाचार और वैश्विक पूंजी के हक में । सरकार को शेयर बाजार की चिंता है। अबाध पूंजी परवाह यानी कालाधन घुमाने की फिक्र है, पर उत्पादन प्रणाली और अर्थ व्यवस्था की कोई चिंता नहीं है।बहिष्कृत भूगोल और समाज के बहुजनों की क्या औकात, सिवाल सोसाइटी को भी देश द्रेही बताने से परहेज नहीं करती यह सरकार। क्या भारतीय संविधान में सोनिया गांधी के रिमोट का कोई प्रावधान है ,क्या संविधान के मुताबिक भारतीय प्रधानमंत्री का संसद और जनता के अलाव किसी औरके प्रति ​​जवाबदेही है, इस यक्ष प्रश्न का जवाब दिये बगैर अर्थव्यवस्था की बदहाली का रोना फिजूल है। मालूम हो कि अब सिर्फ सीमा आजाद या विनायक सेन नहीं,सरकार की नजर में अन्ना हजारे भी देशद्रोही हैं।बहरहाल अन्ना हजारे ने प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से मिली चिट्ठी का जवाब देते हुए कहा, 'PMO की चिट्ठी में मुझे देशद्रोही बताया गया है. अन्ना ने चिट्ठी पर सवाल उठाते हुए कहा, 'अगर मैं देशद्रोही हूं तो सरकार आपकी है, आप कार्रवाई क्यों नहीं करते? अगर मैं देशद्रोही हूं तो मुझे जेल में क्यों नहीं डाल दिया जाता?अन्ना कारपोरेट साम्राज्यवाद या अंध हिंदू राष्ट्रवाद या खुले बाजार के खिलाफ नहीं हैं, सिर्फ कालाधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ बोल रहे हैं तो उनके साथ यह सलूक, तो व्यवस्था बदलने का ख्वाब देखने वालों का क्या होगा?ऐसी निरकुंश सत्ता तो ब्रिटिश हुकूमत के दौरान भी नहीं थी और न ही सत्ता किसी सोनिया गांधी के रिमोट में समाहित थी!

चिदंबरम या प्रणव मुखर्जी आर्थिक मामलों में दक्षता के कारण नहीं, राजनीतिक जोड़ तोड़ के कारण वित्तमंत्री बना दिये जाते हैं और बाहैसियत वित्तमंत्री वे राजनीतिक बाध्यताओं को ही संबोधित करते हैं। देश, अर्थ व्यवस्था या बहुसंख्यक जनता के हितों से उनका सरोकार नहीं है। जिनके सरोकार हैं, कारपोरेट साम्राज्यवाद की बढ़त के लिए उफान पर आये अंध हिंदू राष्ट्रवाद के बहाने उन्हें राष्ट्रद्रोही बताकर निरंकुश अव्वस्था का आलम बना दिया गया है।​​बेतरतीब असहनीय मौसम की तरह हमारे लोग प्रबल धर्मांध जैसे इसे ईश्वरीय अभिशाप मानकर खामोश तमाशबीन बने हुए हैं इस हद तक कि​ ​ अपने रगों से बहते खून की खबर तक नहीं।भारत की साख को लेकर अंतरर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स [एसएंडपी] की सख्त चेतावनी को औद्योगिक उत्पादन के आंकडे़ मजबूती दे रहे हैं।एसएंडपी ने अपनी रिपोर्ट में चेताया है कि भारत की रेटिंग को सटोरिया ग्रेड में डाला जा सकता है। यही नहीं, पहली बार किसी वैश्विक रेटिंग एजेंसी ने एक प्रकार से सरकार पर राजनीतिक टिप्पणी भी की है। मुखर्जी ने एसएंडपी की रिपोर्ट के कुछ घंटे बाद ही कहा कि मौजूदा स्थिति पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगामी महीनों में देश में वृद्धि की संभावनाएं बलवती होंगी। भारत की ऋण साख घटाने की चेतावनी देने वाली एसएंडपी पर ही वित्त मंत्रालय ने पारदर्शी नहीं होने का आरोप जड़ दिया है। मंत्रालय ने कहा कि एसएंडपी जितना आंक रही है, भारतीय अर्थव्यवस्था उससे कहीं बेहतर स्थिति में है। आर्थिक मामलों के विभाग में सचिव आर गोपालन ने कहा कि आप कुछ मानदंडों के आधार पर फैसला नहीं कर सकते। हम मानते हैं कि हमारी स्थिति बेहतर है।लेकिन नए वित्त वर्ष की शुरुआत ही औद्योगिक उत्पादन के मोर्चे पर बुरी खबर से हुई है। अप्रैल में कारखानों में उत्पादन एकदम ठप रहा। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की विकास दर 0.1 प्रतिशत रही। वित्ता मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भी औद्योगिक उत्पादन की धीमी रफ्तार पर चिंता जाहिर की। उन्होने कहा कि अर्थव्यवस्था को लेकर देश मे नकारात्मक धारणा बनी हुई। सरकार इसे सकारात्मक करने के लिए कदम उठाएगी। केंद्र सरकार की नीतिशून्यता ने देश के औद्योगिक उत्पादन का पहिया पूरी तरह रोक दिया है। भारत की आर्थिक सेहत और साख में गिरावट की आशंकाओं को मजबूती देते हुए औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार अप्रैल में सिर्फ 0.1 प्रतिशत पर सिमट गई। बाइस उत्पाद व उद्योग समूहों में से दस में उत्पादन घटा है। खनन व कैपिटल गुड्स का उत्पादन बुरी तरह टूट गया है। अब निगाहें रिजर्व बैंक [आरबीआइ] की तरफ हैं, जो अगले हफ्ते मौद्रिक नीति की समीक्षा करेगा। इस दौरान वह ब्याज दरों में कमी का एलान कर सकता है।औद्योगिक उत्पादन की धीमी होती रफ्तार के बाद अब रिजर्व बैंक की तरफ से ब्याज दरों में कमी की संभावना बढ़ गई है। केंद्रीय बैंक इस महीने की 18 तारीख को मौद्रिक नीति की मध्य तिमाही समीक्षा पेश करेगा। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के प्रमुख अर्थशास्त्री डीके जोशी मानते हैं कि औद्योगिक उत्पादन में लगातार गिरावट को देखते हुए रिजर्व बैंक रेपो रेट [वह दर जिस पर बैंक आरबीआइ से कम अवधि के कर्ज प्राप्त करते हैं] में कम से कम चौथाई फीसद की कमी कर सकता है।रिलायंस इंडस्ट्रीज के केजी-डी6 क्षेत्र में उत्पादन के अब तक के निचले स्तर पर पहुंचने के बीच कंपनी ने आगाह किया है कि यदि सरकार ने उत्पादन बढ़ोतरी के लिए निवेश की मंजूरी नहीं दी, तो क्षेत्र में उत्पादन और घट सकता है। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने धमकी दी है कि वह उत्पादन में गिरावट के लिए क्षतिपूर्ति की मांग करेगी, क्योंकि इसकी वजह यही है कि सरकार गैस क्षेत्रों में निवेश योजना को मंजूरी नहीं दे रही है।

इस बीच राष्ट्रपति के उम्मीदवार पर बुधवार को आखिरी मुहर लग जाने की पूरी उम्मीद है। इस सिलसिले में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने तृणमुल कांग्रेस प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को दिल्ली बुलाया है।तूणमूल कांग्रेस केंद्र सरकार में दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी है। राष्ट्रपति पद के कांग्रेस के उम्मीदवार की जीत के लिए तृणमूल कांग्रेस का समर्थन जरूरी है। सूत्रों से जानकारी मिली है कि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को लेकर ममता बनर्जी के रुख में नरमी आई है। इससे वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के ही यूपीए की ओर से राष्ट्रपति उम्मीदवार होने की संभावनाएं और बढ़ गई हैं। तृणमूल कांग्रेस चीफ और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संकेत दिया है कि वे कांग्रेस के उम्मीदवार का विरोध नहीं करेंगी।

केंद्र यदि पश्चिम बंगाल को स्पेशल पैकेज देता है, तो प्रणब के नाम को लेकर टीएमसी की ओर से विरोध शांत हो सकता है। निर्वाचन आयोग ने मंगलवार को राष्ट्रपति चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया। इसके मुताबिक 19 जुलाई को वोट डाले जाएंगे, जबकि इसकी गिनती 22 जुलाई को होगी। मुख्य चुनाव आयुक्त वी. एस. सम्पत ने मंगलवार को एक संवाददाता सम्मेलन में चुनाव की तारीखों का ऐलान किया।गौरतलब है कि वर्तमान राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का कार्यकाल 24 जुलाई को खत्म हो रहा है। अत: नए राष्ट्रपति का चुनाव 24 जुलाई से पहले पूरा हो जाना चाहिए। दरअसल कांग्रेस की ओर से प्रणव मुखर्जी का नाम सबसे आगे है। लेकिन सूत्रों के हवाले से खबर है कि इस नाम पर ममता बनर्जी कुछ शर्तों के साथ हामी भरना चाहती हैं। ममता बनर्जी चाहती हैं कि पश्चिम बंगाल के लिए केंद्र सरकार स्पेशल पैकेज दे। लेकिन केंद्र सरकार ऐसा करने से हिचकिचा रही है।केंद्र सरकार को लगता है कि ऐसा करने से बाकी राज्यों के साथ भेदभाव होगा। उधर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह ने भी राष्ट्रपति के मसले पर पार्टी का रुख साफ नहीं किया है। राष्ट्रपति कौन होगा इसकी तस्वीर 15 जून तक साफ हो जाएगी।राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने के लिए तदर्थ आर्थिक निर्णय देश पर तोपते जाने का यह अहम मामाला है मसलन कि सनद रहें।नामांकन की अंतिम तिथि 30 जून होगी और उनकी नामांकनों की जांच 2 जुलाई तक पूरी कर ली जाएगी। नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि 4 जुलाई होगी।मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि सांसदों को अपना वोट राजधानी दिल्ली में ही डालना चाहिए, लेकिन वे अपने राज्यों में भी वोट डाल सकते हैं। राष्ट्रपति के चुनाव के लिए निर्वाचन मंडल 4,896 का होगा, जिसमें 776 सांसद और 4120 राज्यों की विधानसभाओं के विधायक शामिल हैं, इनमें दिल्ली और पुद्दुचेरी भी शामिल हैं। इन सभी के वोटों का कुल मूल्य 10,98,882 होगा, जिनमें विधायकों के मतों का मूल्य 5,49,474 रहेगा और सांसदों का 5,49,408 होगा। लोकसभा, राज्यसभा और राज्यों की विधानसभाओं के नामांकित सदस्य राष्ट्रपति चुनाव में मतदान नहीं कर सकते।कांग्रेस ने सोमवार को पश्चिम बंगाल को विशेष पैकेज देने के बहाने राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी को लेकर तृणमूल कांग्रेस को साधने की कोशिश की। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री अमित मित्रा से हुई मुलाकात पर सबकी नजर टिकी थी। यह बातचीत बेनतीजा रही। फिर भी संकेत दिए गए कि कोई न कोई रास्ता निकाला जाएगा। मित्रा ने कहा कि अभी एक राउंड की बात हुई है। आगे भी बातचीत जारी रहेगी।

आहलूवालिया, निलेकणि और सैम पित्रोदा की राह निष्कंटक बनाने और मनमोहन की मनमानी जारी रखने का असली एजंडा क्षत्रपों की राजनीति की आड़ में हासिल किया जा रहा है। बाजार तय कर रहा है सबकुछ, नीतियों पर भी बाजार का ही वर्चस्व।राष्ट्रपति से लेकर मंत्रिमंडल में किस जद पर किसे​ ​ होना चाहिए, सबकुछ बाजार की मर्जी पर। क्योंकि पूरे देश को शंघाई जो बनाना है।देश के आर्थिक विकास में आयी आर्थिक गिरावट का असर दिखने लगा है। स्टैन्डर्ड एंड पुअर्स (एस एंड पी) ने भारत की इनवेस्टमेंट ग्रेड घटाने की धमकी दी है। विकास दर बीते 9 सालों के सबसे निचले स्तर पर है। इसी वजह से एस एंड पी ने इनवेस्टमेंट रेटिंग गिराने की चेतावनी दी है। इसका सीधा मतलब है कि देश में होने वाला विदेशी निवेश घटेगा।

पिछले 3 महीने में भारतीय बाजार से विदेशी निवेशक एक लाख करोड़ निकाल चुके हैं। विदेशी निवेशकों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर से भरोसा टूट रहा है। ऐसे में अब बाजार का अध्ययन करने वाली अहम अंतरराष्ट्रीय संस्था स्टैंडर्ड एंड पुअर की नई चेतावनी की भारत की निवेश साख घट सकती है। इसके उलट जमीनी हालत यह है कि जनप्रतिनिधि तो संसदीय वेतन, भत्तों और सुविधाओं को ही सत्ता में भागेदारी का पर्याय समझते हैं और कोटा व आरक्षण के सहार संसद पहुंचने वालों को तो यह विशेषाधिकार जारी रहने की चिंता सबसे ज्यादा​ ​ होती है। संसदीय व्हिप की क्या मजाल कि ये लोग अपने लोगों के मारे जाने पर उफ तक न करें, असल में न इन्हें चुनाव क्षेत्र और न देश और न बहिष्कृत समाज से कोई लेना देना है। बाजार और कारपोरेट की लाबिइंग और रणनीतियों की समझदारी भी अपने आकाओं की मर्जी मुताबिक बदलती​ ​ रहती है। इस राजनीतिक विकलांगता की तस्वीर का ही दूसरा रुख है अर्थ व्यवस्ता की बदहाली। कोई विदेशी संस्था जब रेटिंग करती है तो दो चार दिन हाय तौबा मचता है , बाद में देश का सोना गिरवी पर रखने के बजाय देश को ही बेच डालने की कारोबार निर्विरोध चलता रहता है।वित्तमंत्री ने एक बयान में कहा कि यह रिपोर्ट ताजा रेटिंग कार्रवाई पर आधारित नहीं है। एसएंडपी ने 25 अप्रैल को भारत की सार्वभौमिक ऋण रेटिंग जारी की थी, जिसमें देश की दीर्घावधि की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग को बीबीबी (माइनस) पर कायम रखा था। हालांकि उसने परिदृश्य को स्थिर से नकारात्मक किया था।

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी का कहना है कि अप्रैल महीने के आईआईपी आंकड़ों से निराशा हुई है। लेकिन इंडस्ट्रियल ग्रोथ को पटरी पर लाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। सरकार ने पावर और फाइनेंस सेक्टर में जरूरी कदम उठाए हैं। इंफ्रा सेक्टर में निवेश को बढ़ावा देने के लिए भी कदम उठाए गए हैं। आईआईपी आंकड़ों में कैपिटल गुड्स के आंकड़ों ने चिंता बढ़ा दी है।

मुखर्जी ने कहा कि अप्रैल से अब तक ऐसी कुछ उल्लेखनीय घटनाक्रम नहीं हुआ है, जिससे यह संकेत मिलता हो कि झटके सहने की अर्थव्यवस्था की क्षमता कमजोर हुई हो। हालांकि 2011-12 की चौथी तिमाही के आर्थिक वृद्धि दर के आंकड़े उम्मीद से कम रहे हैं। उन्होंने कहा कि एसएंडपी की ताजा रिपोर्ट इस बात की ओर इशारा करती है कि निवेश ग्रेड रेटिंग को तय करने वाले मुख्य कारक वृद्धि बढ़ाने की सरकार की क्षमता तथा आर्थिक झटकों से निपटने की क्षमता है।

मुखर्जी ने कहा कि आगे चलकर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कई चीजें सकारात्मक हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी के दौर को बदलते हुए इनमें आधा फीसद की कटौती की है। खनन क्षेत्र की वृद्धि दर सुधरी है। इसके अलावा कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं के लिए ईंधन की आपूर्ति सुधरी है।

वित्तमंत्री ने कहा कि तिमाही निवेश वृद्धि दर की स्थिति सुधरी है, जो 2011-12 की तीसरी तिमाही में नकारात्मक थी। 2012-13 में सामान्य दक्षिण पश्चिम मानसून का अनुमान लगाया गया है। हाल के सप्ताहों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम घटे हैं।

मुखर्जी ने कहा कि विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति एक बार फिर से भरोसा दिखाना शुरू किया है और चालू कैलंडर साल के पहले पांच माह में 12 अरब डॉलर का शुद्ध निवेश किया है। 2011 के पूरे साल में एफआईआई का निवेश 8.3 अरब डॉलर रहा था।

फिक्की के डायरेक्टर इकोनॉमिक अफेयर्स-रिसर्च सौम्यकांति घोष का मानना है कि इंडस्ट्री की सुस्त पड़ती ग्रोथ रफ्तार से आरबीआई पर प्रमुख दरों में कटौती का दबाव बढ़ गया है। और उम्मीद है कि आरबीआई प्रमुख दरों में 0.25-0.5 फीसदी की कटौती कर सकता है।

बाजार गिर रहा है, कंपनियां निवेश कम कर रही हैं लेकिन डिमांड ग्रोथ के चलते देश की इकोनॉमी पर प्रणव सेन का भरोसा कायम है। योजना आयोग के प्रणव सेन ने कहा कि जैसे की निवेश की स्थिति में सुधार आएगा, अर्थव्यवस्था को पटरी पर आने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।

स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (एसएंडपी) की भारत की ऋण साख घटाने की चेतावनी को लेकर यूपीए सरकार विपक्षी दलों खासतौर पर भाजपा के निशाने पर आ गई है।

मंगलवार को सरकार पर निशाना साधते हुए भाजपा ने कहा कि सरकार के लिए अब जागने की जरूरत है, क्योंकि यह साफ है कि आर्थिक संकट सरकार के अंदरूनी मतभेदों की वजह से पैदा हुआ है। भाजपा नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार पर जोरदार हमला बोला।

आईआईपी के निराशाजनक आंकड़ों के बाद बाजार के जानकार 18 जून को आरबीआई की पॉलिसी में रेट कट की उम्मीद जता रहे हैं। नोमुरा के विवेक राजपाल के मुताबिक बॉन्ड यील्ड में गिरावट इस बात का रुख है कि प्रमुख दरों में कटौती की पूरी उम्मीद है।

अप्रैल में आईआईपी ग्रोथ बढ़कर 0.1 फीसदी रही है, जबकि मार्च में आईआईपी सिकुड़कर -3.5 फीसदी रही थी। हालांकि साल-दर-साल आधार पर आईआईपी ग्रोथ में गिरावट देखने को मिली है। साल 2011 के अप्रैल महीने में आईआईपी ग्रोथ 5.3 फीसदी रही थी। वहीं अप्रैल में संशोधित आईआईपी ग्रोथ -3.5 फीसदी के मुकाबले -3.2 फीसदी हो गई है।

अप्रैल महीने में माइनिंग सेक्टर की ग्रोथ सिकुड़कर -3.1 फीसदी रही। वहीं पिछले साल अप्रैल में माइनिंग ग्रोथ 1.6 फीसदी रही थी। अप्रैल में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ घटकर 0.1 फीसदी रही है। साल 2011 के अप्रैल महीने में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ 5.7 फीसदी रही थी।

अप्रैल में इलेक्ट्रिसिटी सेक्टर की ग्रोथ भी घटकर 4.6 फीसदी रही है। पिछले साल की समान अवधि में इलेक्ट्रिसिटी सेक्टर की ग्रोथ 6.5 फीसदी रही थी। कैपिटल गुड्स सेक्टर की ग्रोथ को बड़ा झटका लगा है। अप्रैल में कैपिटल गुड्स सेक्टर की ग्रोथ सिकुड़कर -16.3 फीसदी रही। साल 2011 की समान अवधि में इस सेक्टर की ग्रोथ 6.6 फीसदी रही थी।

अप्रैल में बेसिक गुड्स सेक्टर की ग्रोथ घटकर 2.3 फीसदी रही है। पिछले साल अप्रैल महीने में बेसिक गुड्स की ग्रोथ 7.1 फीसदी रही थी। हालांकि साल 2012 के अप्रैल में कंज्यूमर ड्यूरेबल्स गुड्स सेक्टर की ग्रोथ बढ़कर 5 फीसदी रही है। साल 2011 के अप्रैल महीने में इस सेक्टर की ग्रोथ 1.6 फीसदी रही थी।

अप्रैल में कंज्यूमर नॉन-ड्यूरेबल्स गुड्स सेक्टर की ग्रोथ भी बढ़कर 5.4 फीसदी रही है। पिछले साल की समान अवधि में इस सेक्टर की ग्रोथ 4.6 फीसदी रही थी। अप्रैल में कंज्यूमर गुड्स सेक्टर की ग्रोथ भी बढ़कर 5.2 फीसदी रही। वहीं साल 2011 के अप्रैल महीने में कंज्यूमर गुड्स सेक्टर की ग्रोथ 3.2 फीसदी रही थी।

भारत में निवेश की वकालत करते हुए मानव संसाधन और संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने स्वास्थ्य, सूचना प्रौद्योगिकी और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों का जिक्र किया, जहां अमेरिका द्विपक्षीय लाभ के लिए साथ मिलकर काम कर सकता है।

सिब्बल ने कहा कि यदि अमेरिका गठजोड़ के लिए अटलांटिक के पूर्वी तट की ओर देश तलाशता है तो कई वजहों से भारत ही वह देश होगा।

यहां अमेरिका-भारत व्यापार परिषद (यूएसआईबीसी) और भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) द्वारा आयोजित दोपहर के भोज के दौरान उन्होंने यह बात कही।

भारत ने कहा कि अमेरिका को जिन चीजों की जरूरत है वह सब भारत में है, मसलन लोकतांत्रिक सरकार, मजबूत न्यायपालिका और पूरी स्वतंत्रता।

सीआईआई के अध्यक्ष अदि गोदरेज ने इस मौके पर उम्मीद जताई कि वैश्विक रुझान में गिरावट अस्थायी है। गोदरेज भारत-अमेरिका रणनीतिक वार्ता के लिए यहां आए मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के शिष्टमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं।


क्योंकि सोनिया के रिमोट में ही खोट है क्योंकि सोनिया के रिमोट में ही खोट है Reviewed by Sushil Gangwar on June 13, 2012 Rating: 5

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