हेम चंद्र पांडे आज हमारे बीच नहीं हैं।

हेम चंद्र पांडे आज हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन जिस रास्ते पर चलते हुए उन्होंने अपनी जान दी, उसे भारतीय पत्रकारिता में एक मिसाल के तौर पर याद किया जा सकता है। आज देश में पत्रकारिता खरबों का धंधा बन चुकी है। उसमें काम करने वालों से हमेशा पेशेवर होने की मांग की जाती है। इस पेशे को कुछ इस तरह से समझाया जाता है कि जैसे पत्रकार समाज से बिल्कुल कटा हुआ प्राणी है और उसे घटनाओं को जैसे का तैसा रिपोर्ट कर देना है, बस। हेम कॉरपोरेट की तरफ से प्रचारित ऐसी पत्रकारिता के खिलाफ थे। हेम लोगों की तकलीफों को अपनी लेखनी का विषय बनाते थे। जरूरत पड़ने पर जन-आंदोलनों में भी शरीक होते थे। पत्रकारिता में निष्पक्षता की दुहाई देकर धन्ना सेठों का पक्ष लेने वाली अभिजात पत्रकारिता के खिलाफ आम जनता के पक्ष में खड़े पत्रकार थे।

जब दो जुलाई दो हजार दस को आंध्र प्रदेश पुलिस ने हेम को भाकपा (माओवादी) प्रवक्ता आजाद के साथ फर्जी मुठभेड़ में मार डाला तो उनकी व्यापक सामाजिक सक्रियता का ही नतीजा था कि अन्याय के खिलाफ बड़ी संख्या में लोग सामने आये। पत्रकारों और न्यायपसंद लोगों ने फर्जी मुठभेड़ की कहानी को खुली चुनौती दी। फैक्ट फाइंडिंग के लिए गयी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और पूर्व न्यायाधीशों की एक टीम ने फर्जी मुठभेड़ के सारे सुबूत इकट्ठा किये। हत्याकांड की निष्पक्ष जांच की मांग हुई, लेकिन सरकार जांच के लिए तैयार नहीं हुई। बाद में सर्वोच्च अदालत के आदेश पर सरकार को सीबीआई जांच के लिए तैयार होना पड़ा। तब भी सवाल उठा था कि जब गृह मंत्री ही हेम और आजाद के कत्ल का आरोपी हो तो उसके मातहत काम करने वाली सीबीआई कैसे निष्पक्ष जांच करेगी? आखिरकार वही हुआ, जो होना था। कुछ दिन पहले सीबीआई ने जांच की औपचारिकता निभाकर सर्वाच्च न्यायालय में कह दिया है कि हेम और आजाद को पुलिस ने असली मुठभेड़ में मारा था।

इस मामले में अदालती कार्यवाही के दौरान एक बार सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गणतंत्र अपने बच्चों की हत्या की इजाजत नहीं दे सकता। उसने सीबीआई को इस मामले की जांच करने का आदेश दिया। तब हेम की मां रमा पांडे ने भावुक होकर अदालत की इस टिप्पणी को न्याय की उम्मीद की तरह देखा था। लेकिन सीबीआई और अदालत ने मुठभेड़ को असली ठहराकर इंसाफ की आस लगाये एक मां की उम्मीद पर पूरी तरह पानी फेर दिया है। लेकिन न हेम की मां और न ही हम इस झूठ को मानने को तैयार हैं। हम इतना जरूर समझते हैं कि अपने से असहमत बच्चों के प्रति ये गणतंत्र कितना क्रूर है, इसका अमुमान हेम चंद्र पांडे की हत्या से लगाया जा सकता है। व्यवस्था से असहमति रखने वालों को सीखचों के पीछे डालने और मिटा देने का चलन दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। इलाहाबाद की पत्रकार और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता सीमा आजाद और उनके पति विश्व विजय को उम्र कैद की सजा इसकी ताजा मिसाल है।

पिछली बार हेम चंद्र पांडेय स्‍मृति व्‍याख्‍यान देते हुए सुमंता बनर्जी

ऐसे दौर में, हेम को याद करने का मतलब हर तरह के अन्याय के खिलाफ एकजुट होना है। असहमति के अधिकार के लिए लड़ना है।

हेम की मौत के बाद उनके पुराने साथियों और हम-ख्याल पत्रकारों ने मिलकर हेम चंद्र पांडे मेमोरियल कमेटी बनायी थी। तब हमने तय किया था कि हेम के आदर्शों को जिंदा रखने के लिए हर साल उनके शहादत दिवस पर एक व्याख्यान करवाएंगे। इस बहाने भारतीय समाज, राजनीति और पत्रकारिता के रिश्तों पर बात की जाएगी और बेहतर समाज का विकल्प तलाशने की कोशिश भी जारी रहेगी। इस बार दूसरा हेम स्मृति व्याख्यान होना है। पहला व्याख्यान वरिष्ठ पत्रकार और लेखक सुमंता बनर्जी ने दिया था। उन्होंने पत्रकारिता और जन-पक्षधरता पर बात करते हुए कहा था कि “हेम एक्टिविस्ट पत्रकारों की उस परंपरा में आते हैं, जो जॉन रीड, एडगर स्नो, जैक बेल्डेन, हरीश मुखर्जी, ब्रह्मा बंधोपाध्याय से लेकर सरोज दत्त तक फैली है। इस परंपरा में वे अज्ञात किंतु सचेत पत्रकार भी शामिल हैं जो हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में न्याय के पक्ष में साहस के साथ खड़े हैं।”

इस बार हमने जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में मजबूती से खड़े रहने वाले नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और इकोनोमिट एंड पॉलिटिकल वीकली के सलाहकार संपादक गौतम नवलखा को भारतीय लोकतंत्र, जनाधिकार और पत्रकारिता की हालत पर बोलने के लिए बुलाया है।

दूसरे हेम मेमोरियल लेक्चर में आपकी मौजूदगी असहमति की हत्या करने वालों के खिलाफ एक राजनीतिक टिप्पणी की तरह होगी।

[ हेम चंद्र पांडे मेमोरियल कमेटी की तरफ से भूपेन सिंह द्वारा जारी ]

Sabhar- Mohallalive.com

हेम चंद्र पांडे आज हमारे बीच नहीं हैं। हेम चंद्र पांडे आज हमारे बीच नहीं हैं। Reviewed by Sushil Gangwar on June 28, 2012 Rating: 5

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