Sakshatkar.com - Filmipr.com - Worldnewspr.com - Sakshatkar.org

सबाल “सिस्टम फिल्टर” का

सबाल “सिस्टम फिल्टर” का

mkb

“हमारा सिस्टम फेल है। गांव से लेकर शहर तक। गली से लेकर मोहल्ले तक। मुखिया से लेकर मुख्यमंत्री तक। पुलिस से लेकर न्यायालय तक। कहीं भी हमारा सिस्टम काम नहीं कर रहा है।”…एक आम नागरिक के चेहरे पर ये शिकन आसानी से देखे जा सकते हैं।

बात सही भी है कि कहीं भी कोई फिल्टर सिस्टम सही से काम नहीं कर रहा है। अगर कहीं काम करता भी दिख रहा है तो उसमें ईमानदारी दूर-दूर तक नज़र नहीं आती। यही कारण है कि आज शासकीय सुविधा और न्याय मजाक ही बनकर नहीं रह गई है बल्कि, देश की एक बड़ी आबादी नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त है।

उन राज्यों में तो हालत काफी वद्दतर है, जहां की धरती अमीर और लोग गरीब हैं। भले ही लोग इसका मूल कारण अशिक्षा को मानते हों, लेकिन सब कुछ इस पर ही थोप कर नहीं छोड़ा जा सकता। अशिक्षित लोग मूर्ख नहीं होते,जबकि पढ़े-लिखे लोग प्रायः धूर्त होते हैं।

कोई जरुरी नहीं कि आप हर बात से सहमत हों। लेकिन इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि हमारे सिस्टम के जितने भी स्टेज पर फिल्टर लगे हैं, वह हर जगह फट चुके हैं, उसमें बड़े-बड़े छेद बन गये हैं। वेशक यह स्थिति सिस्टम चलाने वालों की भोग विलास की जीवन जीने की लालसा ने पैदा कर रखी है।

यह स्थिति किसी एक क्षेत्र में उत्पन्न नहीं है। भारतीय लोकतांत्रिक जीवन के हरेक पहलु “सिस्टम फिल्टर” प्रोबलम का शिकार है। और आज हम उच्च स्तर पर जो घालमेल देख रहे हैं या फिल्टर लोड देख रहे हैं, उसका मूल रहस्य यही है कि नीचे स्तर पर उसका फिल्टर नहीं किया गया या फिल्टर करने में ईमानदारी नहीं बरती गई। उदाहरणार्थ, जिस समस्या-मामले को गांव के चौकीदार या अधिक से अधिक थाना स्तर पर फिल्टर कर लिया जानी चाहिये, वह उच्चतम न्यायालय तक जंजाल बन जाती है।

आखिर क्यों नहीं हो पाता है नीचे से उपर तक, किसी भी मामले या समस्या का फिल्टर ? उसके निदान में लोगों की क्यों गुजर जाती है पूरी जिंदगी ? क्यों लूट जाती है उसके खून-पसीने की गाढ़ी कमाई ? क्यों बिक जाता है उसका घर-बार ? और नतीजा सिफर से अधिक नहीं निकलता !

राजनामा डॉट कॉम की नीति अब ऐसी समस्यायों को लेकर आगे बढ़ने का बीड़ा उठाया है। अपने पाठकों के सामने उसके परत दर परत को सरेआम खोलेगी। क्योंकि हम जिस व्यवस्था में बदलाव या उसमें सुधार की बात करते हैं, उसकी जड़ से अनभिज्ञ होते हैं। इसी का खमियाजा हमें भुगतना पड़ता है। …………मुकेश भारतीय Raznama.com

No comments:

Post a Comment