हमें 24 घंटे में कितनी खबरों की जरूरत है?

ख़बर.. ख़बर और ख़बर। हमारे चारों ओर चौबीस घंटे खबरें तैर रही हैं। सैंकड़ों न्यूज चैनल हमें चौबीस घंटे खबरदार करते और रखते हैं। सबसे पहले, सबसे आगे की दौड़ में इलेक्ट्रानिक मीडिया दिन-रात एक किये रहता है। देश-दुनिया से लेकर गली-मोहल्ले तक की पल-पल की खबर प्रसारित होती रहती है। देश-दुनिया में घटने वाली घटनाओं की सूचना और जानकारी होना जरूरी है लेकिन जिस तरह चौबीस घंटे मीडिया खोद-खोदकर खबरें निकालने और उनका विश्‍लेषण करने में जुटा रहता है उसको देखते हुए स्वाभाविक तौर पर यह सवाल जहन में उठता है कि जितनी खबरें चौबीस घंटे परोसी जा रही हैं, क्या उतनी खबरों की जरूरत देश के आम आदमी को है भी? व्यवसायिक प्रतिद्वंदता और प्रतिस्पर्धा की दौड़ में न्यूज चैनल आज न्यूज के नाम पर जो कुछ देश की जनता के सामने परोस रहे हैं उसमें न्यूज के सिवाय और सब कुछ है अर्थात न्यूज चैनलों में न्यूज गायब है।
सच्चाई यह है कि न्यूज चैनलों का हालत उस पुरानी और खस्तहाल साइकिल की तरह हो गयी है जिसमें घंटी के सिवाए हर पुर्जा आवाज करता है। न्यूज चैनल न्यूज के नाम पर टोना-टोटका, यू-टयूब के वीडियो, अपराध, रोमांस, सास-बहू के चटपटे किस्से और स्टंट को बड़ी शान से परास रहे हैं। न्यूज चैनलों की बाढ़ में ऐसे न्यूज चैनलों की संख्या अधिक है जो न्यूज के अलावा सब कुछ परोसते हैं। असल में इन न्यूज चैनलों को न्यूज और पत्रकारिता के नाम पर कलंक और काला धब्बा कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। पिछले एक दशक में देश में न्यूज चैनलों की एक बाढ़ सी आई हुई है। चौबीस घंटे सैंकड़ों न्यूज चैनल समाचार प्रसारित करते रहते हैं। अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, राज्य, जिले से लेकर गली-मोहल्ले और चौक-चौराहों की न्यूज का प्रसारण कहीं न कहीं यह सोचने को विवश करता है कि आखिरकर हमें इतनी खबरों की जरूरत है भी या नहीं।

देश की जनता को जागृत करने और जनहित से जुड़े मुद्दों को उबारने और मंच प्रदान करने, जनजागरण एवं जन आंदोलन खड़ा करने और देश को नयी दिशा दिखाने में मीडिया की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। बावजूद इसके बाजारवाद की मार झेल रहा मीडिया बाजार में टिके रहने के लिए जो हथकंडे अपना रहा है उससे लगता है प्रेस अपनी मूल राह से भटक गया है। टीआरपी की चाहत में अधिक से अधिक समय तक दर्शकों को अपने चैनल के साथ जोडऩे के लिए न्यूज चैनल और मीडिया हाउस विशुद्घ रूप से कारपोरेट कल्चर में डूब चुके हैं। अपने आस-पास की खबरें जानने और समझने की जिज्ञासा स्वाभाविक है। लेकिन जिस गति से न्यूज चैनलों की संख्या देश में बढ़ी है उससे दोगुनी गति से न्यूज सेंस की कमी भी दिखाई दे रही है। चौबीस घंटे न्यूज और हर दस मिनट में ब्रेकिंग न्यूज देना न्यूज चैनलों की व्यवसायिक मजबूरी है, ऐसे में दर्शकों का बांधे रखने और टीआरपी के चक्कर में खबर की गुणवत्ता की बजाए न्यूज की संख्या, मिर्च-मसाले और चटपटेपन पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

ब्रेकिंग न्यूज आते ही संवाददाता विश्‍लेषण और खबर का पोस्टमार्टम शुरू कर देता है। स्टूडियों में बैठे न्यूज एंकर ऐसे अटपटे और बचकाने सवाल फिल्ड में तैनात रिपोर्टर से पूछते हैं कि रिपोर्टर और दर्शकों दोनों का दिमाग एक बार घूम जाए। अधिकतर चैनल बेमतलब और गैर जरूरी मुद्दों पर बहस और जोरदार चर्चा कर समय बिताते हैं। सबसे पहले और सबसे तेज के चक्कर में रिपोर्टर सुनी-सुनाई, साथी पत्रकारों या फिर पुलिस-प्रशासन से प्राप्त अधकचरी और अधपकी कहानी चीख-चीखकर दर्शकों को बताते हैं। आज न्यूज चैनल दर्शकों और पाठकों के समक्ष जो कुछ परोस रहा है उस अधकचरी जानकारी को किसी भी कीमत पर न्यूज नहीं कहा जा सकता है। न्यूज का अर्थ सनसनी या उतेजना फैलाना कदापि नहीं हो सकता लेकिन आज न्यूज चैनल अपना कर्तव्य और जिम्मेदारी को भूलाकर मार्केट में जमे रहने के लिए सनसनी फैलाने को ही अपना धर्म और कर्म समझने लगे हैं, और न्यूज का मर्म समझने की शक्ति का उतरोत्तर ह्रास हो रहा है। ऐस नहीं है कि सारा तालाब ही गंदा है, लेकिन चंद गंभीर और सकारात्मक प्रयास कोने में अलग-थलग पड़े दिखाई देते हैं।

दर्शकों तक सबसे पहले न्यूज पहुंचाने की प्रवृत्ति ने न्यूज का कबाड़ा तो किया ही है वहीं मीडिया की विश्वसनीयता और प्रमाणकिता को भीह खतरे में डाला है। हमारे चारों ओर घटने वाली घटनाओं की जानकारी हमें होनी चाहिए लेकिन ऐसा लग रहा है कि अब मीडिया न्यूज की लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन कर रहा है। मीडिया घराने दूसरे बिजनेस घरानों की तर्ज पर ग्राहकों को पटाने और अपना माल खरीदने के लिए गैर-जरूरी और निजता की दीवार को तोड़कर मिर्च-मसाला लगाकर खबरें परोसने में परहेज नहीं कर रहे हैं। अगर ईमानदारी से आकलन किया जाए तो किसी भी न्यूज चैनल पर विशुद्घ न्यूज कंटेट दो-ढाई घंटे से अधिक प्रसारित नहीं किया जाता है।

आज से दो-तीन दशक पूर्व तक जिस आम आदमी के जीवन को छूने वाले और जनहित के मुद्दों के अलावा दूसरी खबरें प्रसारित-प्रकाशित करने में मीडिया परहेज बरतता था। आज मीडिया का इस बात का बड़ा गुमान है कि उसने देश को दशा और दिशा प्रदान की है। लेकिन मीडिया की अधकचरी खबरों और चीख-चीख कर न्यूज पेश करने और खोद-खोद कर खबरें देने की प्रवृत्ति ने कितनी जिंदगियों को तबाह किया है या नरक में धकेला है इस तथ्य को जानने की जहमत किसी ने नहीं की है। जब कोई संवाददाता लाइव रिर्पोटिंग के दौरान नाटकीय अंदाज में किसी लड़की, औरत या किसी अन्य संवेदनशील मसले पर अपना ज्ञान बखार रहा होता है, उस समय अधिकतर मामलों में उसके पास तथ्यात्मक जानकारी कम और बयानबाजी एवं सुनी-सुनाई किस्से और कहानी का हिस्सा ज्यादा होता है, लेकिन जब चौबीस घंटे खबरें प्रसारित करना मजबूरी हो तो नैतिकता, धर्म, और मर्यादा का क्या हश्र होगा इसे बेहतर समझा जा सकता है।

यह सच्चाई है कि प्रजातंत्र को मजबूत करने और आम आदमी की आवाज बनकर मीडिया ने बड़ा काम किया है, बावजूद इसके सुधार निरंतर प्रक्रिया है। आज मीडिया को भी अपने बदलते स्वरूप और व्यवहार पर चिंतन करने की जरूरत है। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है जिसके कारण उसकी भूमिका और भी बढ़ जाती है कि वो अपनी जिम्मेदारी को और अधिक बेहतर तरीके से समझे और जनहित से जुड़े़ मुद्दों को प्रभावी तरीके से उठाए और न्यूज के नाम गैर-जरूरी वस्तुएं परोसने से परहेज करे तो न्यूज और मीडिया दोनों के लिए बेहतर होगा।

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ लखनऊ के स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.
Sabhar- Bhadas4media.com
हमें 24 घंटे में कितनी खबरों की जरूरत है? हमें 24 घंटे में कितनी खबरों की जरूरत है? Reviewed by Sushil Gangwar on June 27, 2012 Rating: 5

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