Sakshatkar.com - Filmipr.com - Worldnewspr.com - Sakshatkar.org

कैसा पत्रकार और कैसा पत्रकारिता


कैसा पत्रकार और कैसा पत्रकारिता दिवस: कुमार सौवीर


kumar.png
जमीन बदल गयी तो मायने बदल गये। मायने बदले तो चेहरा बदल गया, रहन-सहन और जीवन की शर्तें बदल गयीं। वैश्विक अर्थशास्‍त्र की इस बाढ के चलते खासा बदलाव आ गया है समाज में। तो फिर कैसा पत्रकार और कैसा पत्रकारिता दिवस। मौजूदा हालातों में तो यह सवाल ही बेमानी हो जाते हैं। अब तो एड्स डे है, वेलंटाइन डे है, वगैरह-वगैरह।
 
इंतजार कीजिए, अभी तो और ना जाने कितने नये नये डे और यह नये आगंतुक डे, हमारे अतीत के सारे दिवसों को सुरसा की तरह निगलते दिखेंगे। नामोनिशान मिट जाएगा इन दिवसों का।
 
मुझे याद है 26 साल पहले का वह दौर, जब मेरे पिता स्‍वर्गीय सियाराम शरण त्रिपाठी जी, पत्रकारिता दिवस और मजदूर दिवस जैसे अवसरों पर बेहद मसरूफ हो जाया करते थे। हफ्तों तैयारियां चलती थीं। नौकरी से अवकाश लेकर वे हर जिलों-कस्‍बों के पत्रकारों को एकजुट किया करते थे। वे लखनऊ में तब के सर्वाधिक शक्तिशाली अखबार स्‍वतंत्र भारत में मुख्‍य उप संपादक थे। उनमें एक दर्शन था, जुझारूपन था, जिसके चलते यूपी के ज्‍यादातर जिलों में उन्‍होंने पत्रकारों का संगठन खडा किया। अब है किसी में वह जज्‍बा। न पत्रकारों में रहा और न ही पत्रकारों की एकता की बात करने वाले संगठनों में। यह तो होना ही था। तब पत्रकार अपनी कलम से पहचाना जाता था, अब पत्रकार क्‍या, संपादक तक इस बात के लिए अपनी तनख्‍वाहें मोटी करवाते घूमते हैं, कि उनकी पहंच फलां नौकरशाह या मंत्री तक है और वे जब चाहेंगे, मालिक का कोई भी काम सेकेंडों में करा देंगे। मालिक भी खुश पत्रकार भी खुश। दसियों लाख रूपये की मोटी तनख्‍याव पाने वालों से आप क्‍या उम्‍मीद करते हैं कि उनमें जनपक्षधरता आ जाए, या वे पत्रकारों और पत्रकारिता के लिए खुद को बलि चढा दें।
 
अरे अब तो वह दौर आ चुका है कि पैसे के लिए वे अपने ही किसी साथी की बलि बहुत ही संयत भाव से चढा सकते हैं। तो विदा कीजिए हिंदी पत्रकारिता दिवस को। श्रद्धांजलियां दीजिए। और जुट जाइये इस दिवस को मर्सिया पढने के लिए। आमीन।
Sabhar- Samachar4media.com

No comments:

Post a Comment