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Sunday, 13 May 2012

संसदीय चैनल और सनसनी वाले चैनलों में फर्क है


संसदीय चैनल और सनसनी वाले चैनलों में फर्क है


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 राज्यसभा टीवी के एग्जीक्यूटिव एडिटर उर्मिलेश से समाचार4मीडिया के असिस्टेंट एडिटर नीरज सिंह की बातचीत
सबसे पहले हम पत्रकारिता के सफर की शुरूआत की बात करते हैं आपने पत्रकारिता के सफर की शुरूआत कैसे और कब की?
मैं पत्रकारिता में किसी योजना के साथ नहीं, बल्कि संयोगवश आया। सच पूछा जाये, तो कभी ऐसी इच्छा नहीं रही कि मुझे पत्रकार ही बनना है। मेरा फैमिली बैकग्राउन्ड भी ऐसा नहीं रहा। यह मात्र एक दुर्घटना है या सुघटना आप जो भी आप कह लें। लेकिन जर्नलिज्म में आने के बाद मैं यह महसूस नहीं करता कि यह दुर्घटना है। यूनिवर्सिटी के दिनों के दौरान ही मैंने पत्र-पत्रिकाओं में लिखना-पढ़ना शुरू कर दिया था। शुरुआती दिनों में ही दिनमान में मेरी एक रचना छपी “विवेकानन्द पर मूल्याकन”। यह प्रभा दीक्षित की सीरिज में छपी थी।  उसके बाद अमृत प्रभात में लिखना शुरू किया। इलाहाबाद से फिर मैं जेएनयू आ गया और यहां पर अपनी एमफिल की। यहां भी लेखकों-पत्रकारों से कई सामाजिक मुद्दों पर मेल-मुलाकातें होती थीं। यह सब कुछ मैं पीएचडी के साथ ही कर रहा था, लेकिन किन्हीं कारणों से मैं अपनी पीएचडी पूरी नहीं कर पाया। अध्यापन के लिए कोशिशें शुरू कीं, लेकिन वहां सफलता मिलती नहीं दिख रही थी। अब जीविका चलाने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही था तो मैंने अपने उसी पढ़ने-लिखने के क्रम को जारी रखते हुए पत्रकारिता में आने की सोची और फ्रीलांसिंग शुरू कर दी। उन्हीं दिनों नवभारत टाइम्स में ऑल इंडिया टेस्ट हुआ और मैं चयनित हो गया। कुछ दिन दिल्ली रहा फिर एक अप्रैल 1986 को मैं बिहार चला गया क्योंकि यहां मुझे रिर्पोटिंग आफर हो रही थी और मैं चाहता था कि डेस्क पर काम करने की बजाय मैं रिर्पोटिंग करूं। अपने इन्हीं दिनों में मैंने बिहार का सच नाम से एक किताब भी लिखी, जो काफी पसंद की गई औऱ इसके कई एडिशन भी प्रकाशित हुए। इसी बीच मुझे टाइम्स फेलोशिप मिली, जिस पर मैने काम किया और इसी प्रोजेक्ट के बाद मैंने छारखंड- जादुई जमीन का अंधेरा नाम से किताब लिखी। इसी प्रोजेक्ट के दौरान ही नवभारत टाइम्स का पटना एडिशन वहां बन्द हो गया। फिर मैंने हिंदुस्तान ज्वाइन कर लिया। चंडीगढ़ के बाद मैं हिन्दुस्तान दिल्ली आ गया और यहां 13 साल तक काम किया। हिंदुस्तान के बाद बिजनेस भास्कर के साथ बतौर पोलिटिकल एडिटर जुड़ा। वहां से दो साल काम करने के बाद मै राज्य सभा टीवी आया।
 
पत्रकार बनना नही चाहते थे लेकिन बन गये इस पूरे घटना क्रम में क्या कोई मलाल है अभी
नहीं, मुझे ऐसा कोई मलाल नहीं है। उस वक्त भी नहीं था जब मैं नवभारत टाइम्स में या फिर हिन्दुस्तान में था। कई बार ऐसा होता है कि आपके सपने कुछ होते हैं और आपकी दक्षता उन सपनों से अलग होती है। यह उस व्यक्तित्व पर निर्भर करता है कि जहां वह जा रहा है वहां अपने आप को कैसे पेश करेगा।  मुझे लगता है कि पत्रकारिता आने का मेरा फैसला संयोगवश भले था, पर गलत नहीं था।
 
लंबे समय तक आप प्रिंट में रहे उसके बाद सीधे किसी चैनल में एग्जीक्यूटिव एडिटर बने। प्रिंट से आने के बाद इलेक्ट्रानिक में किस तरह का चैलेंज मिल रहा है आपको।
उत्तर – यह बात सही है कि शुरू से ही मैंने प्रिन्ट में काम किया है। हालांकि विजुअल मीडिया में बतौर एक्सपर्ट आना-जाना होता रहता था, इसलिए कैमरे को फेस करना कभी कोई चुनौती नहीं रही। लेकिन एक चैनल के एग्जीक्यूटिव एडिटर के रूप में निश्चित रूप से यह एक बड़ी चुनौती है। लेकिन मैं सीखने और सिखाने, दोनों में यकीन रखता हूं। यही काम मैं यहां भी कर रहा हूं। दूसरे, टीवी और प्रिन्ट दोनों, मीडिया के ही पार्ट हैं। बहुत सारी चीजें एक जैसी हैं बस तकनीक और प्रस्तुति में फर्क है। काफी कुछ एक जैसा ही है बस दोनों के रास्ते कुछ अलग- अलग हैं। मुझे एक नया अनुभव हो रहा है और अगर सभी स्थितियां ठीक-ठाक रहीं, तो जल्द ही आरएसटीवी की टीम इसे एक अलग ब्रॉडसॉस्टर के रूप में स्थापित करने की कोशिश करेगी।
 
आम तौर पर देखा जाता है कि प्रिन्ट के जो संपादक या पुराने लोग हैं वो टीवी को दोयम मानते है। वे अक्सर कहते है कि प्रिन्ट की तुलना में इलेक्ट्रानिक नही ठहरता है। आप तो प्रिंट से इलेक्ट्रानिक में आये हैं। आपकी क्या सोच है
 देखिए, मैं इसे प्रिन्ट वर्सेज विजुवल की लड़ाई के तौर पर नहीं देखता। अगर कंटेट और क्वालिटी के आधार पर ही देखा जाए तो हिन्दी प्रिन्ट मीडिया कतई यह नही कह सकता कि हम महान हैं और हिन्दी के चैनल सारे खराब है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सारे एक जैसे ही हैं वहां भी कुछ लोग बेहतर हैं तो कुछ उनसे कमतर। अगर इलेक्ट्रानिक मीडिया में मसाला खबरों के चलन बढ़ा है तो यह चलन प्रिंट में भी दिख रहा है। दरअसल इस तरह की जो मुश्किलें खड़ी हुई हैं वह मीडिया के कारपोरेटी करण से हुई हैं। यह मीडिया के लिए खौफनाक पक्ष है इस पर चिंता करने की जरूरत है।
 
उर्मिलेश आमतौर पर अन्य बड़े पत्रकारों की तरह टीवी की बहसों या अखबार में छपने वाले लेखों में नहीं दिखते तो क्या आप पर्दे के पीछे रह कर कार्य करने में विश्वास रखते है
मैं हर तरह की भूमिका के लिए हमेशा तैयार रहता हूं। जहां तक लिखने पढ़ने का सवाल है तो वह 1986 से नियमित कर रहा हूं। पत्र-पत्रिकाओं में लिखने के अलावा अब तक मेरी सात पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आने के बाद समय की कमी भी है, इसलिए कई बार चाहकर भी कुछ नहीं लिख पाता हूं। अपने लिखने का शौक मैं अपनी किताबों के जरिए पूरा करता हूं। हिन्दुस्तान के अपने कार्यकाल के दौरान मैंने दो किताबें लिखीं थीं. बीच-बीच में लेख भी लिखता हूं। शायद आप सही कह रहे हैं मेरा ज्यादा फोकस इन पर नहीं रहा हैं। क्योकि कई बार गुजाइस होती है, कई बार नहीं भी होती है।
 
कश्मीर पर आपने लिखा, बिहार पर आपने लिखा, झारखंड पर लिखा लेकिन अपने गृह राज्य यूपी पर आपने कुछ नही लिखा। क्या यूपी पर कुछ लिखने को है नहीं, या लिखना नहीं चाहते हैं।
उत्तर- मेरी पैदाइश यूपी की है पढ़ाई भी मेरी यूपी मे ही हुई हैं बीएएमए भी वहीं पर किया मैंने जो महसूस किया कि बिहार को जितना घूमा हूं, देखा हूं या जितना मैने आंध्र प्रदेश को देखा है, जितना केरल को देखा है, जितना जम्मू कश्मीर को देखा है, उतना यूपी को नही देखा। पेशे के तौर पर जहां-जहां काम किया है उन जगहों को मैने ज्यादा सिद्दत के साथ महसूस किया और देखा-समझा है। दूसरे जिस विषय को आप नहीं जानते उस पर अगर आप लिखते हैं तो यह न्याय नहीं है। कभी कभी लेख लिखे हैं या टिप्पड़ीयां की हैं यूपी की राजनीति परलेकिन कोई गंभीर काम मैने नही किया, यह बात मैं मानता हूं।  
 
 राज्यसभा टीवी डीबेट पर आधारित हैलेकिन इसके पहले जो चैनल डीबेट पर शुरू हुए बाद में उन्हें अपना एजेंडा बदलना पड़ा।
आपके सवाल में मैं एक सुधार करना चाहूंगा कि राज्यसभा टीवी केवब बहस केंद्रित चैनल नहीं है। हम लोग बुनियादी तौर पर निजी चैनल नहीं है, हम पब्लिक चैनल हैं और उसमें भी संसदीय चैनल हं। हमारा जो लक्ष्य है वह है पार्लियामेंट और जनता के बीच के संबंध को जीवंत रखना। हमारा मुख्य मकसद है कि हम पार्लियामेंट्री बहसों को सीधे अपने चैनल के जरिए लोगों तक लाएं। अभी हाल ही के दिनों में हमने खबरों का कार्यक्रम भी शुरू किया है। खबर आठ बजे। इसको हम और विस्तारित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा इंफॉरमेशन और नॉलेज पर आधारित मनोरंजन का भी एक सेगमेंट है। राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी प्रोग्राम है। कुल मिलाकर एक पार्लियामेंट्री चैनल के लिहाज से जितना कंटेंट हो सकता है हम रख रहे हैं। हमारा कॉन्सेप्ट पूरी तरह क्लीयर है। हम बाकी चैनलों की तरह सनसनी फैलाकर अपने आपको स्थापित करने में विश्वास नहीं रखते।
 
आप प्राइवेट घरानों से होकर सरकारी चैनल में आए हैं। अक्सर यह उदाहरण दिया जाता है कि प्राइवेट संस्थान ज्यादा प्रोफेशनल होते हैं। यहां आकर आपको क्या लग रहा है?
नहीं मैं नहीं मानता। मेरा तो यह मानना है कि भारत में अगर प्राइवेट सेक्टर विस्तार पा रहा है तो केवल सरकरी सेक्टर की वजह से हैं। सरकार की वजह से। पब्लिक सेक्टर के जरिए ही यह विस्तार हुआ है यह नहीं भूलना चाहिए। दूसरी बात प्राइवेट सेक्टर में भी ऐसे कई महकमें हैं जिनसे लोगों को बहुत ज्यादा निराशा होती है। चाहें वो फोन सर्विस हों या कोई अन्य। कई बार वहां भी कोई जवाबदेही नहीं दिखाई देती। हां, यह बात सही है कि पब्लिक सेक्टर में और ज्यादा जवाबदेही हो तो और भी बेहतर ढंग से काम किया जा सकता है। आप खुद ही देखिए, जो प्राइवेट हॉस्पिटल हैं वहां जाकर कितने लोग इलाज करा सकते हैं। वहीं सरकारी अस्पताल एम्स में देश के कोने कोने से लोग आते हैं
 
पत्रकारिता के अलावा क्या कर रहे हैं?
अभी तो फिलहाल कुछ और कर पाने का समय ही नहीं मिल पा रहा है। ऑफिस से लौटने के बाद अपना चैनल जरूर देखता हूं। दूसरे चैनल भी देखता हूं, खासकर न्यूज चैनल । सुबह अखबार पढ़ने के साथ-साथ आकाशवाणी जरूर सुनता हूं। यह पुराना शौक है। मेरी पत्नी भी उस समय आकाशवाणी जरूर सुनती हैं। पढ़ना मेरा शौक है और इसके लिए थोड़ा वक्त जरूर निकाल लेता हूं। इन दिनों परिवार की यह शिकायत बढ़ गई है कि उन्हें समय नहीं दे पा रहा हूं। संगीत से बेहद लगाव है। सिनेमा बहुत पसंद हैं।
 
आम तौर पर देखा जाता है वरिष्ठ पत्रकारों को नई पौध से शिकायत रहती है। इन दिनों आप राज्यसभा में नियुक्ति प्रक्रिया के तहत रोज नए पत्रकारों से मिलते होंगे। आपका क्या अनुभव है।
मुझे ऐसी कोई शिकायत नहीं है। अगर आप नए लोगों को अपनी संवदेना, मूल्यों और सोच से नहीं जोड़ पाते तो यह आपकी कमी है। अगर आपकी विचारधारा से कोई मेल नहीं खा पा रहा है तो उसमें नये लोगों का कसूर नहीं है। जो नेतृत्व करने वाले लोग हैं उन्हें इस बात पर ज्यादा जोर देना चाहिए कि वह नई पीढी को कुछ दे सकें। न कि मीन-मेख निकाल कर उन्हें दरकिनार करें। नई जेनेरेशन बहुत अच्छा कर रही है और उनसे उम्मीदें भी बहुत है।
 
कारगिल वार के समय आप अकेले हिंदी पत्रकार थे जो वहां से रिपोर्ट कर रहे थे अकेले हिदी पत्रकार होने की वजह से जो लोकप्रियता आपको मिलनी चाहिए थी, क्या वह मिल पाई है
मैं पहली बार इस सवाल पर सावर्जनिक तौर पर कुछ बोल रहा हूं। जब हम लोग कारगिल गये तो एक ऐसे ग्रुप से गया थे जिसके पास हिंदी और अंग्रेजी, दोनों ही भाषाओं के अखबार थे। यह बात सही है कि अंग्रेजी की रिपोर्ट्स और रिपोर्टर को ज्यादा महत्व मिला और हिंदी को कम। हिंदी के पत्रकारों को बाद में भेजा गया अंग्रेजी के अखबारों के रिपोर्टर को पहले। उन दिनों मोबाइल नहीं था इंटरनेट लैपटॉप कुछ भी नहीं। जो अंग्रेजी के और इलेक्ट्रानिक के पत्रकार थे उनको सेटेलाइट फोन उनके संस्थान की तरफ से मिला था और हम लोगों को ऐसा कोई साधन नहीं मिला। हम कागज पर लिखते और कई बार आर्मी के हेलिकॉप्टर के पायलट को वह रिपोर्ट देकर प्रार्थना करते कि आर्मी के पीआऱओ तक यह रिपोर्ट पहुंचा दीजिएगा और वे वे रिपोर्ट दिल्ली फैक्स कर देते। सीमाओं और सीमित संसाधनों के बावजूद भी हम लोग रोज रिपोर्ट भेजते। पहले कई दिनों फैक्स जारी रहा, लेकिन कुछ दिनों के बाद वह भी बंद हो गया। अंग्रेजी अखबार वालों के पास सेटेलाइट फोन था वे उससे खबरें डिक्टेट कर देते। मुझे याद है एक अंग्रेजी अखबार जो कि कारगिल की रिपोर्ट छापता था वह उस फोन कंपनी का लोगो भी छापता था जिससे रिपोर्टर खबरें देता था। मैं आपकी बात से सहमत हूं कि मेरे इस योगदान और प्रयास को उतनी पहचान नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी।
 
 आपके पत्रकारीय जीवन में इस घटना के बाद या किसी और रिपोर्ट के बाद कोई बड़ा बदलाव आया  
मुझे पत्रकारिता में बहुत संघर्ष करने प़ड़े जिसकी कई निजी वजहें भी हैं। जिनका जिक्र मैं नहीं करना चाहूंगा। कई बार अपने आप को बचाते हुए जूझते हुए काम करना पड़ा। स्टाफ रिपोर्टर के तौर पर एनबीटी से शुरुआत की और अपनी मेहतन के दम पर जो मिलता गया वही मेरे लिए मेरे काम का पुरस्कार बनता गया। 1993 में टाइम्स फैलोशिप मिली तो और अच्छा काम करने का मौका मिसला। कश्मीर पर मिले असाइमेंट को काफी नोटिस किया गया। केरल चुनाव कवर करने का बेहद चुनौतीपूर्ण था क्योकि आमतौर पर हिंदी पत्रकारों को दक्षिण नहीं भेजा जाता। इस तरह से जो मैंने चैलेजिंग काम किए वे मेरे खुद जीवन में काफी महत्वपूर्ण रहे।
 
आप राजनीतिक रिपोर्टर रहे हैं क्या इस बात से सहमत हैं कि आज भी पत्रकारिता का फोकस राजनीतिक खबरों पर ही रहता है।
पहले भी मैं नहीं मानता था की पत्रकारिता केवल राजनीति खबरों तक ही सीमित है। मेरा मानना है कि जितना बहुरंगी हमारा समाज है और इस समाज की जितनी तस्वीरे हैं उन सबकी रिपोर्टिंग होनी चाहिए। हिंदी में विज्ञान की रिपोटरिंग क्यों नहीं हो रही है? खेलों में बस क्रिकेट की ही क्यों? पत्रकरिता में समाज के हर एक पहलू की खबर आनी चाहिए। और हिंदी में तो लोग देखने वाले भी हैं और चाहते भी हैं। लेकिन बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि हिंदी पत्रकारिता के संपादक और मालिक इस चुनौती को गंभीरतापूर्वक नहीं ले रहे हैं। उन लोगों को केवल मुनाफा नजर आ रहा है। सही बात है कि मुनाफा भी जरूरी है, लेकिन मुनाफे के साथ भी बहुत कुछ किया जा सकता है।
Sabhar- Samachar4media.com

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