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Tuesday, 1 May 2012

चुनाव खत्म होते ही स्ट्रिंगरों से चैनलों ने पल्ला झाड़ा, कई भुखमरी के शिकार


पांच राज्‍यों के चुनाव के बाद तमाम चैनल के स्ट्रिंगर्स भुखमरी के शिकार होने लगे हैं, पर इस बात की चिंता न तो चैनलों को न ही वरिष्‍ठ पत्रकारों को है. आपने कई वरिष्‍ठ पत्रकारों को दुनिया भर के लोगों की समस्‍या पर महाबहस करते हुए देखा होगा, पर कभी अपने लोगों की समस्‍या पर चर्चा करते हुए नहीं देखा होगा. इससे स्‍पष्‍ट है कि ये लोग समस्‍या जानते हुए इसका हल नहीं करना चाहते हैं!

मुझे लगता है कि हमारे वरिष्‍ठ पत्रकारों को इस बात का डर है कि यदि यह मूर्ख स्ट्रिंगर्स समझदार हो जाएंगे तो उनके पीछे सर-सर कहता कौन घूमेगा? कौन उनके घर सब्‍जी खरीदकर पहुंचाएगा? कौन उनके बच्‍चों की फीस जमा करने स्‍कूल जाएगा? यशवंतजी, मैं पिछले दस सालों से तमाम स्ट्रिंगर्स के काम करने के तरीके और पत्रकारिता के प्रति उनके जुनून को देख रहा हूं, परन्‍तु मैंने कभी यह महसूस नहीं किया कि ये लोग अपने-अपने संस्‍थान से खुश हैं. सब को यही मलाल रहता है कि हम जिस संस्‍थान के लिए रात दिन एक किए रहते हैं वह उन्‍हें एक दलाल से ज्‍यादा कुछ नहीं समझता है.

जब स्ट्रिंगर्स पर बुरा समय आता है तो अधिकतर चैनल यह कहने से गुरेज नहीं करते कि यह व्‍यक्ति को काफी समय पहले हमारा चैनल छोड़ चुका है. फिर क्‍या, बेचारा स्ट्रिंगर उस दिन को कोसता है, जिस दिन वह प‍त्रकारिता से जुड़ता है. यशवंतजी, मैं आपको बताना चाहता हूं कि इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के अधिकतर स्ट्रिंगर्स पढ़े-लिखे होने के साथ पत्रकारिता की डिग्री लिए हुए हैं. पर इन सबका दुर्भाग्‍य है कि इन स्ट्रिंगरों को यह पता नहीं होता कि महीने के अंत में उनका मेहनताना कितना होगा? यह भी श्‍योर नहीं होता कि मिलेगा भी कि नहीं?

मैं आपको बता रहा हूं कि शायद इन्‍हें मिलता है 750 रुपये से लेकर 4500 रुपये के बीच मिलता है यानी इस महंगाई में स्ट्रिंगरों को भुखमरी का सामना करना ही है. मैं चाहकर भी अपनी भड़ास नहीं निकालना चाहता था लेकिन क्‍या करूं मैं भी मजबूर हूं. साथ ही मुझे यह भी डर सता रहा है कि कहीं मेरी नौकरी ना चली जाए. पर खुद को रोक नहीं पाया. कल रात की बात है मैंने अपने एक फ्रेंड को शादी में मूवी बनाते देखा तो थोड़ा अजीब लगा, पर उससे ज्‍यादा अजीब यह भी लगा कि वह आंखें चुराने की कोशिश कर रहा था. तब मुझे उससे ज्‍यादा बुरा लगा  कि मैं इस पार्टी में क्‍यों आया?

इसके बाद मैंने खुद से एक सवाल किया कि क्‍या मीडियाकर्मियों के इतने बुरे दिन आ गए हैं कि उन्‍हें शादियों की मूवी बनाकर अपने परिवार का पालन-पोषण करना पड़ रहा है. पर मैंने खुद को समझाया कि इसमें कौन से बुराई है, मेहनत कर रहा है, कम से कम किसी की जेब तो नहीं काट रहा है. इसके बाद मैं पार्टी से बिना कुछ खाए-पिए चला आया. यह बुदबुदाते हुए कि चैनल वाले....... होते हैं, जो मेहनत के बाद भी समय पर स्ट्रिंगरों का पेमेंट नहीं देते हैं.

यशवंतजी, हमारी पहुंच चैनल के मालिकों तक नहीं है, पर आपकी तो निश्चित होगी. मेरी आपको सलाह है कि आप शराब का सेवन नहीं करते हो तो करना शुरू कर दो क्‍योंकि यह गुण भी आपके काम को और चमकाएगा. क्‍योंकि मैंने सुना है कि शराब के नशे में जो कहा जाता है वह सीधे दिल से निकला हुआ होता है. इसलिए सर, जब कभी किसी चैनल के मालिक से बात हो तो पीकर जरूर जाएं वरना हजारों लोगों की बात यूं ही दबी रहेगा. आप एक सवाल इन मालिकों से जरूर करना कि क्‍या वजह है कि इस पेशे में लोगों को तय वेतन पर क्‍यों नहीं रखा जा सकता, क्‍यों नहीं छोटे शहरों के पत्रकारों को सुरक्षा की गारंटी दी जाती है?

मनोहर

बरेली
Sabhar- Bhadas4media.com

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