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Friday, 18 May 2012

वसुंधरा की धरा में बीजेपी की औकात



-निरंजन परिहार- बीजेपी के सबसे बड़े पद पर बैठे नीतिन गड़करी को अब यह सलाह देने का मन करता है कि देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर किए जाने वाले आचरण को उन्हें समझ लेना चाहिए। गड़करी अगर यह नहीं समझे, तो उनकी गिनती भी जना कृष्णमूर्ति और वेंकैया नायडू जैसे पार्टी को डुबोने वाले जोकरों में होगी, यह पक्का है। गड़करी को अपन यह सलाह नहीं देते। लेकिन राजस्थान में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में जो कुछ हो रहा है, उसके बाद बीजेपी के चाल, चेहरे और चरित्र में आए कलंकित कर देनेवाले बदलाव को बहुत आसानी से समझा सकता है। पार्टी में अनुशासन के मामले में इतनी गिरावट आ जाए, और राष्ट्रीय नेतृत्व पूरे मामले को नौटंकी की तरह देखता रहे, यह सिर्फ बीजेपी में ही हो सकता है। वसुंधरा राजे एक बार फिर खबरों में है। यह तो खैर कोई खबर है ही नहीं कि राजस्थान बीजेपी में घनघोर अंतर्कलह है। खबर यह भी नहीं है कि पार्टी से इस्तीफा देने की धमकी देकर वसुंधरा ने गुलाबचंद कटारिया की लोक जागरण यात्रा को रुकवा दिया है। और खबर यह भी नहीं है कि वसुंधरा अपने आप को राजस्थान में बीजेपी की सबसे बड़ी नेता साबित करने में एक बार फिर पूरी तरह सफल हो गई हैं। असल खबर यह है कि वसुंधरा राजे ने इस प्रकरण के जरिए पूरी बीजेपी को यह संदेश दे दिया है कि उनके वहां होगा वही, जो वह चाहेगी। ना तो दिल्ली की चलेगी और ना राजस्थान की किसी और बिल्ली की चलेगी। और वसुंधरा के सामने पूरी बीजेपी के एक बार फिर बौनी और बेजार साबित हो जाने से भी बड़ी खबर यह है कि जो लोग अगले साल बीजेपी को सत्ता में पक्का आता हुआ देख रहे थे, वे बहुत सहम गए हैं। इस घटना से उनको लगने लगा है कि हालात अब भी कोई बहुत अच्छे नहीं हैं। अंदर का माहौल पिछले चुनाव जैसा ही है। वसुंधरा का अड़ियल रवैया भी बिल्कुल वैसा ही है, जिसकी वजह से पिछली बार पूरी पार्टी डूब गई थी। अपन आज तक यह तो नहीं जान पाए कि ये बांछें होती कहां हैं, पर इतना जरूर जानते हैं कि बीजेपी में इस बवाल के बाद राजस्थान में कांग्रेस और अशोक गहलोत की बांछे बहुत खिल रही हैं। मामला सिर्फ इतना सा है कि गुलाबचंद कटारिया मेवाड़ इलाके में बीजेपी के प्रति सदभावना जगाने के लिए लोक जागरण यात्रा निकाल रहे थे। जो, वसुंधरा राजे के चंगुओं को नागवार गुजर रही थी। उनको लग रहा था कि इससे कटारिया का कद बहुत बढ़ जाएगा और उनकी औकात घट जाएगी। सो, चंगुओं के चेताने पर वसुंघरा जागी और अपने कद और पद की गरिमा के बारे में बिना बहुत कुछ सोचे समझे कूद पड़ी मैदान में। वसुंधरा के चंगुओं की चिंता यह है कि राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं। अगर कटारिया रथयात्रा निकालते तो जाहिर है उनका कद बड़ा होता। वे राजस्थान में पहले से ही बहुत बड़े नेता हैं, सो मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में उनका नाम भी शामिल हो जाता। मेवाड़ के जिस इलाके में कटारिया की इस यात्रा को निकलना था वहां विधानसभा की 30 सीटें आती हैं, जिन पर कटारिया के पक्ष में सीधा असर पड़ता। जो लोग राजनीति का ककहरा भी नहीं जानते, वे भी इतना तो जानते ही है यह कोई इतना बड़ा मुद्दा नहीं था, कि वसुंधरा को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा करनी पड़े। लेकिन वसुंधरा राजे ने यह किया। जानने वाले यह अच्छी तरह जानते हैं कि वसुंधरा राजे जो भी करती है, पूरी ताकत के साथ करती है। अपने सभी समर्थक विधायकों के भी इस्तीफे की बात से वसुंधरा ने पार्टी को धमकाया। तो, अकेली वसुंधरा के सामने इतनी बड़ी बीजेपी लुंज पुंज और लाचार नजर आने लगी। परंपरा तो यही है कि लोग अकसर पार्टी के सामने झुकते हैं। पर अपने सामने पूरी पार्टी को झुकाने के साथ उसकी औकात दिखाकर वसुंधरा ने यह तो साबित कर ही दिया है कि राजस्थान में सिर्फ और सिर्फ वही बीजेपी को झुकाने वाली नेता है। पूरे मामले में सबसे चोंकानेवाली बात यह रही कि राजस्थान में वसुंधरा के सबसे कट्टर विरोधी सांसद ओम प्रकाश माथुर भी उनके समर्थन में खड़े नजर आए। मगर, आप ही बताइए कटारिया अगर यात्रा निकालते तो फायदा उनका भले ही हो जाता, पर ज्यादा फायदा तो बीजेपी का ही होता। पर, यात्रा रुकवाने का मतलब यही है कि बीजेपी का फायदा भी वसुंधरा को मंजूर नहीं है। गुलाब चंद कटारिया राजस्थान में बीजेपी के वरिष्ठ नेता हैं। छठी बार विधायक हैं। सांसद रहे हैं। कई बार मंत्री रहे हैं और राजस्थान में पार्टी के अध्यक्ष भी रहे। वसुंधरा से भी पहले राजस्थान में विपक्ष के नेता भी रहे। इतने अच्छे वक्ता हैं कि वसुंधरा ही नहीं कई लोग उनकी भाषण कला की कॉपी करते हैं। सन 1977 के बाद से ही वे किसी ना किसी संवैधानिक पद पर हैं। और उससे भी ज्यादा बड़ी और महत्वपूर्ण बात यह है कि पूरे राजस्थान में कटारिया एक बहुत ही नेक इंसान और ईमानदार राजनेता के रूप में विख्यात हैं। यही वजह है कि बेहद सरल मन वाले कटारिया का नाम राजस्थान के सबसे सम्मानित नेताओं में सबसे पहले लिया है। लेकिन राजनीति के रीति रिवाजों का भी अपना अलग मायाजाल है। वहां ना तो अच्छेपन की कोई कद्र है और ना ही ईमानदारी का कोई सम्मान। कटारिया की यात्रा को भी इसीलिए रुकना पड़ा। लोक जागरण यात्रा निकालने वाले कटारिया ने पार्टी हित में यात्रा को निरस्त करने का ऐलान कर दिया। अपने आसपास के लोगों को बिल्कुल बौना बनाए रखना राजे की राजनीति की सबसे बड़ी तासीर है और अपने से बड़े होते नेताओं को किसी भी तरह खत्म कर देना उनकी राजनीति का हिस्सा। वे जो चाहती है, हर कीमत पर करके रहती है। और अकसर वह कुछ ऐसा करती है, जिससे एक तीर में कई शिकार हो जाए। इस बार भी वसुंधरा ने कुछ ऐसा ही किया है। अगले साल राजस्थान में विधानसभा चुनाव हैं, और चुनाव तक वसुंधरा ऐसा कुछ भी होने देना नहीं चाहती, जिससे उनकी ताकत को कहीं से भी रत्ती भर की भी चुनौती की गुंजाइश पैदा हो सके। कटारिया की यात्रा को रोकने के लिए इसीलिए उन्होंने इतना बड़ा दांव खेला। लेकिन राजनीति में ऐसे खेल सिर्फ बीजेपी में ही हो सकते हैं। यही वजह है कि नीतिन गड़करी को अध्यक्षीय आचरण सीखने की सलाह देने को अपन मजबूर हुए। सलाह गलत तो नहीं लगी ? (लेखक निरंजन परिहार जाने माने राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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