मोक्ष का अर्थ है- समूची आसक्तियों से मुक्ति, कोई भी आसक्ति न हो


मोक्ष के बारे में भगवत गीता का उल्लेख जरूरी है। अर्जुन भगवान कृष्ण से प्रश्न करते हैं- स्थितप्रज्ञस्य का भाषा, समाधिस्थ केशव/ स्थितिधिः किम प्रभाषेत, किम आसीत, व्रजेत किम।। यानी हे प्रभु, स्थितप्रज्ञ यानी सुख-दुख, लाभ-हानि और तमाम द्वैतों से परे व्यक्ति कैसे बोलता है? और समाधि प्राप्त व्यक्ति कैसे बोलता है? जो व्यक्ति सांसारिक द्वंद्वों से मुक्त है- यानी स्थिर है वह कैसे बोलता है, कैसे चलता है और कैसे आसन ग्रहण करता है? भगवान कृष्ण उत्तर देते हैं कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति इंद्रियातीत होता है। वह इंद्रियों के वश में नहीं रहता। वह सुख में खुश या दुख में दुखी नहीं होता। वह सदा मधुर वचन बोलता है और संसार की विपरीत या अनुकूल स्थितियां उसे व्यापती नहीं हैं। वह सदा मुक्त रहता है।
अब जरा कबीर की ओर मुड़े। कबीर ने कहा है- जस की तस धर दीनीं चदरिया। यानी ईश्वर ने जिस तरह पवित्र आत्मा के साथ पृथ्वी पर भेजा था, ठीक उसी तरह उन्हें दे देना। बिना किसी दाग के। यह तभी संभव है जब व्यक्ति अपने लिए नहीं भगवान के लिए काम करता हो। भगवान के लिए ही उसका मन, उसकी इंद्रियां, उसका दिमाग और उसकी आत्मा तड़पे। जस की तस धर दीन्हीं चदरिया।
मोक्ष का अर्थ है सारी सांसारिक इच्छाओं से मुक्त हो जाना। यानी ईश्वर में लय। भोजन मिले या न मिले, कोई बात नहीं। वस्त्र मिले या न मिले कोई बात नहीं। शास्त्रों में लिखा है कि मोक्ष प्राप्त व्यक्ति ज्यादा दिन संसार में नहीं रहता। उसका शरीर जल्दी ही छूट जाता है। संसार ही नहीं उसे अपना शरीर भी कारागार लगता है। वह शरीर की सीमा में नहीं बंधा रहना चाहता। वह विराट का अंश हो जाता है। परमहंस योगानंद जी ने कहा है- मनुष्य का इसलिए जन्मता है ताकि वह उस ईश्वर को खोज सके जो उसके भीतर ही मौजूद हैं। परमहंस योगानंद की लिखी विश्व विख्यात पुस्तक पुस्तक- योगी कथामृत (आटोबायोग्राफी आफ अ योगी) पढ़ने से मोक्ष की विस्तारित व्याख्या समझ में आती है। मोक्ष यानी ईश्वर में लय। तब व्यक्ति अपने लिए कुछ नहीं करता। वह सारे सद्कार्य ईश्वर के लिए ही करता है। वह ईश्वरमय हो जाता है। प्रत्येक जीव, प्रत्येक वस्तु में वह ईश्वर का ही प्रतिबिंब देखता है। परमहंस योगानंद के मुताबिक योगी कहता है- हमारी उत्पत्ति ईश्वर से हुई है, हम ईश्वर में ही रहते हैं और एक दिन ईश्वर के दिव्य आनंद में ही हमारा लय हो जाएगा।
अब जरा रामकृष्ण परमहंस की तरफ मुड़े। रामकृष्ण परमहंस कहते थे ईश्वर में ही सब है। उनमें लय हो जाने का अर्थ है- मोक्ष। अपना तो कुछ होश ही नहीं रहता। वेदांत भी यही कहता है। नेति, नेति। यानी मैं शरीर नहीं हूं, मैं मन नहीं हूं। मैं बुद्धि नहीं हूं। तो मैं क्या हूं? शुद्ध सच्चिदानंद आत्मा हूं। भगवत गीता कहती है- शरीर से सूक्ष्म मन है, मन से सूक्ष्म बुद्धि है और जो बुद्धि से भी परे है वह आत्मा है। रमण महर्षि कहते थे- सब कुछ ईश्वर ही है। मनुष्य माया के जाल में जकड़ कर समझता है यह शरीर और इंद्रियां ही सब कुछ हैं। इसीलिए वे कहते थे- खुद से पूछो कि मैं कौन हूं?
लेखक विनय बिहारी सिंह कोलकाता के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं
Sabhar- Bhadas4media.com.


मोक्ष का अर्थ है- समूची आसक्तियों से मुक्ति, कोई भी आसक्ति न हो मोक्ष का अर्थ है- समूची आसक्तियों से मुक्ति, कोई भी आसक्ति न हो Reviewed by Sushil Gangwar on May 11, 2012 Rating: 5

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