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Friday, 4 May 2012

सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया की लक्ष्‍मण रेखा पर फैसला सुरक्षित किया


नई दिल्‍ली : सत्रह दिनों की मैराथन बहस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही की मीडिया रिपोर्टिंग के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने संबंधी मुद्दे पर बृहस्पतिवार को फैसला सुरक्षित रख लिया। इस फैसले से नई बहस छिड़ने और मीडिया तथा अदालत के बीच कई जटिलताएं पैदा होने की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। पांच न्याधीशों की संविधान पीठ ने इस मुद्दे पर अपनी राय रखने के लिए न्यायविदों, कानूनविदों और संगठनों को आमंत्रित किया था। गत 27 मार्च से इस मुद्दे पर व्यापक सुनवाई शुरू हुई थी।
सुनवाई करने वालों में मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडिया, न्यायमूर्ति डीके जैन, न्यायमूर्ति एसएस निज्जर, न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई और न्यायमूर्ति जेएस केहर शामिल थे। उच्चतम न्यायालय का कहना है कि अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग करने वाले मीडियाकर्मियों को पता होना चाहिए कि उनकी ‘लक्ष्मण रेखा’ क्या है। हालांकि अनेक कानूनविदों ने बहस के दौरान इसे मीडिया की स्वतंत्रता पर कुठाराघात करार दिया है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका ज्यादा से ज्यादा कुछ ‘सामान्य’ निर्देश तय कर सकती है, वे भी ‘अनिवार्य’ नहीं सकते।
विख्यात कानूनविदों फली नरीमन और सोली सोराबजी ने पीठ से कहा कि वह मीडिया को नियंत्रित करने वाले नियम नहीं बना सकते हैं। जबकि पीठ का तर्क था कि अगर यह काम हम नहीं कर सकते, तो फिर कौन करेगा? नरीमन ने कहा कि जब उन्होंने एक मीडिया ग्रुप और सेबी के बीच विवाद के दौरान याचिका दायर की थी, वह नहीं जानते थे कि मामला इतना तूल पकड़ लेगा। वैसे वरिष्ठ एडवोकेट केके वेणुगोपाल ने पीठ के पक्ष में तर्क रखे और कहा कि उन्हें (मीडिया) पता होना जरूरी है कि उनकी सीमाएं कहां खत्म हो जाती हैं। कोर्ट का अपनी सुनवाई की रिपोर्टिंग को नियंत्रित करने का पूरा अधिकार है। इस पर नरीमन ने कहा कि बेहतर होगा अगर इस मामले में पीठ संपादकों की भी राय ले। (एजेंसी)

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