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Wednesday, 2 May 2012

इस लिए शहीद हो रहे हैं न्यूज़ चैनल!


सवाल उठना स्वाभाविक है कि टीआरपी रेटिंग में पहले दस में से भी अधिकाँश चैनल जब घाटे में हैं तो फिर किसी भी गिनती में न शामिल चैनल आ क्यों रहे हैं और आ ही रहे हैं तो चल क्यों नहीं रहे हैं?

दरअसल इन चैनलों के आने का असल मकसद ही इन के चल न पाने का मुख्य कारण है. सुविधा के लिए शुरुआत पंजाब से कर लेते हैं. एक पंजाब टुडे था. वो सरेआम कांग्रेस राज में मुख्यमंत्री के सलाहकार भारत इंदर सिंह चहल जैसे ज़रखरीद गुलाम हो गया था. कहने वाले तो यहाँ तक कहते हैं कि उसे मिलने वाली सरकारी एड की आधी कमाई चहल को जाती थी. हाथ पाँव हिलाए बिना जो भी आता हो इस भाव भी बुरा क्या था. चैनल खूब सेवा की पांच साल. लेकिन फिर अकाली सरकार आई तो उस चैनल के मालिक कारिंदे डर के मारे कभी घूमने फिरने भी पंजाब नहीं आये. तार तंबू उखड़ कर हरियाणा जा लगे. लेकिन वहां कोई चहल न था. चैनल आखिरकार बिका और बिक के हरियाणा के मौजूदा गृह राज्य मंत्री गोपाल कांडा के शौक का साधन बन गया. चैनल की तरह चल वो उन से भी नहीं पा रहा है.

पंजाब पर ही रुकें तो 'पंजाब टीवी' आया. 'कोहिनूर' आया. नाम सुना किसी ने 
कभी? देखा किसी ने किसी घर, दूकान या सुनसान वीरान में. 'चैनल वन' आया. उसके मालिक शौक शौक में खुद चैनल का गन माइक ले के घूमा करते थे लुधियाना शहर में. कब का बिक लिया. पीबीसी आया एक. मुख्यमंत्री बादल के करीबी रिश्तेदार का था. जाता रहा. 'डी.ई.टी.वी.' था एक. पंजाब के सबसे अमीर आप्रवासी भारतीयों में से एक रखड़ा साहब का. वो भी ऐसा भ्रमित हुआ कि अब दिशा नाम से धार्मिक रूप में दिखता है. और पंजाब की ही तर्ज़ पर दिल्ली से दो चैनल आये 'सी.एन.ई.बी.' और अभी हाल ही में 'जी.एन.एन'. एक मरी हुई खाल उतार कर दूसरा जीवन पा जाने के जुगाड़ में है. दूसरा देश के दोयम दर्जे के चैनलों में भी शुमार नहीं होता. एक 'डे एंड नाईट' चैनल है. वो चलता है. मगर वो भी अपने कांसेप्ट, कंटेंट और अपनी एड इनकम से नहीं. पानी से पैसे कमा के पानी की तरह बहा देने वाले मालिक के कारण.

तकरीबन सभी का तौर तरीका एक है. बीस तीस लाख में लायसेंस मिल जाता है, वो लो. सेक्योरिटी के नाम पर पचास हज़ार स्ट्रिंगर से लो, पच्चीस कैमरामैन से. हर छ: महीने साल में बदल दो. सरकार (वो भी सिर्फ पंजाब की) का गुणगान करो. कोशिश ये कि सचिवालय में आना जाना हो जाए. उम्मीद ये कि दस काम हो जाएँ. और अगर मालिक कोई बिल्डर है तो दो चार सौ एकड़ ज़मीन के चेंज आफ लैंड यूज़ मिल जाए. खेती की ज़मीन पे फ़्लैट बन जाएँ. आधे पंजाब के पानी में कैंसर, अधिकाँश गाँवों में गरीबी से आत्महत्याओं वाली आर्थिक स्थिति या खुद नेताओं और बड़े अफसरों के हाथो हो रही हत्याओं की चिंता किसी को नहीं. न क़र्ज़ पे पैसे ले कर काम पाने वाले रिपोर्टरों की.

यो क़र्ज़ ले कर चुका न सकने 
वाला रिपोर्टर आत्महत्या करता है तो चैनल उस के मरे की खबर तक नहीं देता. अपने घर वालों को अपनी झूठी धमक दिखाने के लिए ऐसे रिपोर्टरों को थाने में ए.एस.आई. तक को भाईसाहब बनाना और उस के ज़रिये लोगों को पकड़वाना और छुड़वाना पड़ा है. हत्या, डकैती और बलात्कार की खबर वो यूं नहीं देगा कि उस से भाईसाहब की पोजीशन खराब होती है. भाईसाहब की पकड़ी दो किलो भुक्की की वो खबर वो उसे चलाने की सिफारिश के साथ भी भेजेगा जिसे देखने में खुद उस थानेदार की भी कोई दिलचस्पी नहीं है. उस पर तुर्रा ये कि पूरी तरह पंजाब पर आधारित तथाकथित राष्ट्रीय चैनल के न्यूजरूम में एक भी पंजाबी या पंजाब निवासी नहीं. मुद्दों को मारिये गोली. जगहों और लोगों तक के नाम जहां गलत जाते हैं. सुर ताल एंकर का ऐसा है कि उसकी तर्जनी, वर्तनी पंजाब में तो किसी के पल्ले पड़ती नहीं. उसके अलावा और कहीं कोई का ऐसा भी कोई कंटेंट नहीं. पंजाब पे मिश्रा जी और बिहार पे किसी सतनाम सिंह को मोटे वेतन पे बिठा कर मालिक समझता है कि उसने देश की नब्ज़ पकड़ ली. मगर हालत ये है कि एक पे एक हार्ट फेल हो रहे हैं.

दूसरे प्रदेशों में और कई चैनलों का अर्धसत्य भी यही है. अपने राज्य, अपने कारोबार और अपने हितों के लिए चैनल तो ले आये मालिक. मगर न अपनी जनता के लिए कोई सोच थी, न जुड़ाव, न उसकी ज़रूरतों को समझ सकने वाले पत्रकार. एक के बाद दूसरे का भट्ठा बैठता ही चला गया. हालत ये हो गई कि देश के नामी गिरामी पत्रकार भी उन्हें दलदल से निकाल नहीं सके. एम.जे.अकबर, सतीश जेकब और राहुल देव इसकी मिसाल हैं.

कईयों ने तो कांसेप्ट ही गलत चुने. मिसाल के तौर पर 'डे एंड नाईट'. कोका कोला के पंजाब के फ्रेंचाइज़ी कंधारी उसके मालिक हैं. उनकी पूरी टीम में एक आदमी ऐसा नहीं है कि जिस ने पहले कभी किसी भी टीवी चैनल में काम किया हो. प्रिंट से टीवी में आये सब पत्रकार जानते हैं कि अख़बार और टीवी पत्रकारिता की एक तरह से दो अलग विधाएं हैं. टीआरपी के फंडे समझना तो बहुत दूर की बात है. उन्हें ये भी नहीं पता कि ख़बरों की पैकेजिंग कैसे की जाती है. उस पर एड के नज़रिए से एक महा ब्लंडर भी. चैनल वो तब भी तीन भाषाओं में एक साथ लाये कि जब बहुभाषी चैनलों की कोई टीआरपी काउंट होती ही नहीं. बहुभाषी चैनल का ये प्रयोग उन्होंने तब भी किया कि जब राष्ट्रीय स्तर पर कभी देश का पहला प्राइवेट चैनल, जैन और इधर पंजाब में भी 'डी.ई.टी.वी.' अथ कथा समाप्तम की सी स्थिति को प्राप्त हो चुके थे.

चैनल मालिकों के लिए जिस निजी 
स्वार्थ सिद्धि का साधन थे वो तो प्राप्त नहीं ही हुआ. ऊपर से अपने दर्शक वर्ग की ज़रूरत, भाषा से कोसों दूर स्टाफ और उस पर डिस्ट्रीब्यूशन का पहाड़ सा बोझ. ये सब चैनलों को ले डूबे. मालिक किसी को देता भी क्या? ऐसे में बेरोजगार पे बेरोजगार होते चले गए कर्मचारियों की सुध लेता भी कौन. उन्हें कोई नए मिले तो वो फिर उन्हीं जैसे मिले. विषयों की समझ तो पहले भी नहीं थी. चिल्ला चिल्ला के भी टीआरपी न आनी थी, न आई. अब आरुशी काण्ड को ही लें. अधिकाँश चैनलों के स्वनामधन्य, संपादकों तक जैसे पत्रकार लगातार ये मान के चल रहे थे कि जिसका भी दोष हो नुपुर और राजेश तलवार तो बेक़सूर हैं. एक होड़ सी मची थी कि कौन सब से पहले और सब से ज्यादा उन के आंसू बहते हुए दिखा सकता है. नहीं सोचना था तो ये मोटी सी बात भी समझने की कोशिश किसी ने नहीं की कि महज़ चौदह सौ फुट के फ्लैटों से घिरे एक फ़्लैट में माँ बाप की भी मौजूदगी के बीच कोई दो दो क़त्ल कर के कैसे निकल के जा सकता है? कामनसेंस भी इस्तेमाल नहीं करना था तो ये सूत्र भी किसी ने नहीं पकड़ा कि सुबह नौकरानी की तरफ बाहर के गेट की चाबी फेंकने और नौकरानी के ऊपर आने के बाद ही नुपुर रोई क्यों थी और तलवार दंपत्ति ने ऊपर हेमराज की लाश पड़ी होने की बात भी ताले की चाबी गुम हो जाने का बहाना बना कर पुलिस से छुपाई क्यों थी? मज़ाक की हद देखिये कि अब वही उसी नुपुर के लिए चिल्लाते फिर रहे हैं कि मां रोई क्यों, उस ने हनुमान चालीसा पढ़ा क्यों?

एक और नज़ारा देखिये. नुपुर की ज़मानत सीबीआई कोर्ट से रद्द होने के बाद से सेशंस कोर्ट तक में किसी भी रिपोर्टर की आमद प्रबंधित होने के बावजूद रिपोर्टर से फ़ोनों चल रहे हैं. रिपोर्टर को पता ही नहीं कि ज़मानत पे बहस और मेरिट पे केस की सुनवाई में क्या फर्क होता है. वे बताते चले जा रहे हैं कि सीबीआई कोर्ट को बताती चली जा रही है कि नुपुर ने हत्या की रात और उसके बाद क्या क्या किया.

दरअसल चैनलों का बंद होते चले जाना एक गंभीर बहस की मांग पेश करता है. सरकार से पूछ के न मालिकों ने खोले हैं चैनल, न उन में काम करने वालों ने ही सोचा है कि मालिक का प्रयोजन और उस में काम करने वालों की भूमिका क्या है. मालिक तो फिर जोड़ तोड़ से बने फ्लैटों में से सौ बेच के दो सौ और बना लेगा. लेकिन जिन कर्मचारियों के बर्तन तक बिक लिए वे कहाँ जाएँ. दुर्भाग्य ये है कि किसी के पास कोई जवाब या उपाय भी नहीं है. सिवाय इसके कि पत्रकारिता को सही तरीकों और सही हाथों में 
लौटना होगा. कोई हर्ज़ नहीं है कि मालिकों से भी कर्मचारियों की तरह लिखवाया जाए कि मीडिया उनका फुल टाइम कारोबार है. उनके हाथों हो रहा पत्रकारों का शोषण थमेगा तो लगाम काफी हद तक पत्रकारिता के ज़रिये हो रहे शोषण और कुपोषण पर भी लगेगी. मालिक अगर बंदी के बाद भी कर्मचारियों के हित साधने के लिए पाबंद होंगे तो हर ऐरा गैरा चैनल वाला नहीं बनेगा. डूबने पे मरने के बाद भी नोंचे जाने का डर उसे होगा तो कांसेप्ट से ले कर कंटेंट तक सब अपने आप ठीक होने लगेगा.
Sabhar:- journalistcommunity.com

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