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यह ब्राह्मण कथाकारों का समय है, दलित-पिछड़े कतार में हैं!



हिंदी समाज का साहित्य, इस कोण से----
♦ प्रमोद रंजन
फारवर्ड प्रेस की बहुजन साहित्‍य वार्षिकी 2012 कई मामलों में विचारोत्‍तेजक है। अंक में एक ओर अनूप लाल मंडल जैसे प्रेमचंद के जमाने के लेखक, जिन्‍हें गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया गया था, उन्‍हें बहुजन साहित्‍य के एक रत्‍न के रूप में चमकाने की कोशिश की गयी है तो दूसरी ओर ब्रह्मणववादी साहित्‍य को चिन्हित भी किया गया है। अंक का संपादकीय लेख प्रमोद रंजन ने लिखा है, जिसमें युवा कवि-कहानीकार संजय कुंदन की कहानियों को ब्रह्मणवादी साहित्‍य का नमूना बताया है। कुंदन की इन्‍हीं कहानियों को नामवर सिंह समेत हिंदी के अनेक आलोचक जमकर तारीफ कर चुके हैं। संजय कुंदन के वर्ष 2008 में ज्ञानपीठ से छपे कहानी संग्रह ‘बॉस की पार्टी’ की प्रशंसा भरी समीक्षा लगभग सभी साहित्यिक पत्रिकाओं ने छापी थी :मॉडरेटर
च तो यह है कि हम काफी पीछे हैं। हिंदी समाज को देखने के कोण में पिछले कुछ वर्षों में व्यापक परिवर्तन आया है। सामाजिक कार्यव्यापार को देखने का कथित सार्वभौमिक और सर्वसमावेशी नजरिया टूटा है और सामाजिक पृष्ठभूमि पर आधारित अध्ययनों का जोर बढ़ा है। समाजशास्त्र व अन्य अनुसांगिक अनुशासनों में इस नये कोण का अधिकांश अध्ययन अंग्रेजी में हुआ है। हिंदी भाषा इस मामले में भी दरिद्र ही रही है।
क्या यह अब भी जरूरी नहीं है कि इस कोण से हिंदी साहित्य को भी देखा जाए? बहुजन आलोचना इसी कमी को पूरा करती है। बहुजन आलोचना न सिर्फ दलित, आदिवासी व पिछड़ा वर्ग के साहित्य बल्कि ब्राह्मणवादी साहित्य और अन्य द्विज साहित्य की मौजूदगी को भी चिन्हित करती है और उनकी बुनावट के मूल (सामाजिक) पहलुओं और उसके परिणामों को सामने लाती है। विविध प्रकार के साहित्य में विन्यस्त मूल्यों और सौंदर्यबोध की मीमांसा करती है। इस प्रकार यह कई प्रकार के आवरणों, क्षद्मों और भाषायी पाखंडों का उच्छेदन करते हुए वास्तविक जनोन्मुख साहित्य की तलाश करती है, जो मनुष्य की वैचारिक और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करे।
बेहतर होगा कि इसे किसी उदाहरण से पुष्ट करूं। फारवर्ड प्रेस के इस प्रथम ‘बहुजन साहित्य वार्षिकी’ (अप्रैल, 2012) का संपादन के करने दौरान मैंने अपने प्रिय समकालीन कवियों में से एक, संजय कुंदन का कहानी संग्रह ‘बॉस की पार्टी’ पढ़ रहा था। कुंदन का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ है। उनकी यह सामाजिक पृष्ठभूमि उनकी कविताओं में भी उन्हें घेरती है, लेकिन कहानियों में यह अधिक मुखर रूप से सामने आयी है।
‘बॉस की पार्टी’ पर निम्नांकित आलोचकीय टिप्पणी सिर्फ बानगी के लिए है, जिसमें बहुजन आलोचना की अनेक संभव पद्धतियों में से एक का इस्तेमाल किया गया है। हिंदी साहित्य को बहुजन कोण से देखने के लिए ऐसी अनेक पद्धतियों का निर्माण और उपयोग करना होगा ताकि इसके विविध अंतर्गुंफित पहलु सामने आ सकें।
संजय कुंदन और उनकी ‘बॉस की पार्टी’
संजय कुंदन के कहानी संग्रह ‘बॉस की पार्टी’ में कुल 11 कहानियां हैं। हम इन कहानियों के विभिन्न पात्रों, नायकों, खलनायकों की सामाजिक पृष्ठभूमि और उसके अनुरूप कहानीकार के व्यवहार को देखें। संग्रह की 11 कहानियों में से 6 कहानियां सीधे तौर पर ब्राह्मण परिवारों की व्यथा को व्यक्त करती हैं। ‘मेरे सपने वापस करो’ का मुख्य पात्र बलभद्र ‘मिश्र’ का पुत्र अजय है। ‘चिड़ि‍याघर’ शालीग्राम ‘शुक्ल’ के दामाद रविशंकर की कहानी है। ‘उम्मीदवार’ आर्थिक अभाव में दो बार आत्महत्या कर चुके पिता के पुत्र मुकेश ‘तिवारी’ और नौकरी न मिलने पर अपराध को विकल्प बनाने का इरादा रखने वाले जयप्रकाश ‘दूबे’ की कथा है। यह ध्यान देने योग्य है कि कहानियां बुनते हुए संजय कुंदन भारतीय समाज के जाति आधारित गझिन ताने-बाने के प्रति सचेत रहते हैं। ‘उम्मीदवार’ शीर्षक कहानी का ही संवाद देखें।
दो युवक एक नौकरी के इंटरव्यू के लिए किसी कार्यालय प्रधान के कक्ष के आगे बैठे हैं।
पहला युवक पूछता है, ‘तुम्हारा नाम क्या है?’
‘मुकेश…’
‘बस मुकेश या आगे भी…’
‘मुकेश तिवारी’
पहले ने थोड़ा सहमते हुए कहा, लेकिन दूसरे की आंखें चमकी और तपाक से कहा – ‘मेरा नाम जयप्रकाश दूबे है’।
इस नयी सूचना के बाद अब दोनों में कोई अवरोध नहीं था, कोई संशय नहीं!

इसी तरह, ‘केएनटी की कार’ का मुख्य पात्र शुद्दरों (शूद्रों) की सरकार से चिढ़ने वाले हरदयाल ‘तिवारी’ का पुत्र कमलनयन तिवारी है। ‘बॉस की पार्टी’ शीर्षक कहानी का मुख्य पात्र रूटीन क्लर्क का बेटा देवेश अपने सवर्ण होने की घोषणा करता है। अधिकांश मामलों में सरनेम के प्रति सचेत कहानीकार ने ‘सुरक्षित आदमी’ में मुख्य पात्र का नाम भी बताने की जरूरत नहीं समझी है। यह ‘ब्राह्मण जाति में पैदा हुए हाईस्कूल मास्टर के बेटे’ की कहानी है। बेटा बैंक का एक बड़ा अधिकारी है, जो वर्ष 2002 में गुजरात में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद अपने प्रदेश की ‘सेकुलर दलित सरकार’ से सशंकित है। वह कहता है, ‘खतरा सिर्फ दंगों का ही नहीं है। इस शहर में पिछले कई वर्षों से सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए थे। कभी-कभी जातीय तनाव की खबरें जरूर आती थीं। राज्य में एक गठबंधन की सरकार थी, जिसका मुख्यमंत्री दलित था। दलितों का जुलूस जब शहर के बीच से निकलता था, तो सवर्ण लोग भीतर ही भीतर आतंकित हो जाते थे’। देखना चाहिए कि सांप्रदायिक दंगों से भयभीय यह ब्राह्मण युवक इसकी तुलना दलितों की रैली से करते हुए, किस तरह के राजनीतिक परिवर्तन का आकांक्षी है?
संग्रह में मुख्य पात्रों का इतनी बड़ी संख्या में ब्राह्मण होना खुद लेखक की सामाजिक पृष्ठभूमि को ही नहीं, उसकी एकांगी और संकीर्ण सोच को भी बताता है। भाषा और ट्रीटमेंट के स्तर पर ये कहानियां प्रभावशाली हैं लेकिन क्या यह काफी है? संग्रह की अन्य तीन कहानियों ‘गांधी जयंती’, ‘कभी नहीं आएगी गंगा’ और ‘कोई है’ के कथानकों में भी द्विज परिवार ही झांकते हैं। सिर्फ एक कहानी ‘ऑपरेशन माउस’ के कथानायक के गैर द्विज होने का संकेत मिलता है। कहानी का मुख्य पात्र है बीके उर्फ ब्रजेश कुमार। उसने डिप्लोमा किया है लेकिन खुद को इंजीनियर कहता है। एक छोटे से शहर में छोटी सी दुकान चलाने वाला उसका चचेरा भाई दिनेश उसके बड़बोलेपन पर कहता है ‘तुम कुछ भी बन जाओ, रहोगे मुरारी लाल के बेटे ही न’। एक अन्य प्रसंग में यही दिनेश बीके का मन रखने के लिए कहता है, ‘हमसे जो पूछता है कि तुम्हारे भैया क्या करते हैं तो हम कहते हैं कि वे इंजीनियर हैं। हम लोगों के खानदान में कोई इतना भी है क्या’। कहानीकार इस कहानी में बीके की जाति नहीं बताता लेकिन ‘रहोगे तो मुरारी लाल के बेटे’, ‘खानदान में किसी का डिप्लोमाधारी न होना’ जैसी बातें उसके बनिया या किसी अन्य पिछड़ी जाति (ओबीसी) होने का पता देती है।
अब देखें… ‘बॉस की पार्टी’ शीर्षक कहानी में निजी कंपनी के सवर्ण असिस्‍टेंट मैनेजर देवेश कुमार और ‘केएनटी की कार’ के राष्ट्रीय दैनिक के वरिष्ठ पत्रकार कमलनयन तिवारी उर्फ केएनटी की ही तरह ‘ऑपरेशन माउस’ का ब्रजेश कुमार उर्फ बीके का मौजूदा महानगरीय परिवेश, व्यथाएं, लालसाएं समान हैं। तीनों ही पात्र बिहार के रहने वाले हैं। तीनों अपनी लालसाओं को पूरा करने के लिए अपने अतीत से पीछा छुड़ना चाहते हैं। अपनी जड़ों से कटे ये तीनों पात्र मिलकर उन मध्यवर्गीय लोगों का रूपक गढ़ते हैं, जिनके लिए जीवन महज कुछ उपभोक्ता वस्तुएं जुटा लेने का नाम रह गया है। कहानीकार की नजर में उदारवादी आर्थिक नीतियों ने उनके काम के घंटों में बेतहाशा वृद्धि कर दी है, उनकी जीविका हर क्षण संगीन की नोक पर है, जिस कारण इनमें मानवीय मूल्यों का निरंतरण क्षरण हो रहा है। इन समानताओं के बावजूद कहानीकार ने सवर्ण होने पर गर्व करने की बात सोचने वाले ‘बॉस की पार्टी’ के देवेश कुमार और ‘आरक्षण के जमाने में रेलवे क्लर्क की नौकरी’ को नियामत मानने वाले ‘केएनटी की कार’ के कमलनयन तिवारी के चरित्र से काफी अलग ‘आपरेशन माउस’ के मुरारी लाल के बेटे ब्रजेश कुमार उर्फ बीके का चरित्र गढ़ा है। मसलन, नये संपादक संजीव भटनागर को सेट करने के लिए उसके सामने अपनी साली को परोसने का विचार करने करने वाले कम्युनिस्ट कमलनयन तिवारी उर्फ केएनटी के बारे में कहानीकार की टिप्पणी है कि ‘उन्होंने अपने को गिराया जरूर था, वे समझौते की राह पर चल निकले थे पर इस रास्ते पर चलने की भारी कीमत अदा करनी होती है, इसका अंदाजा उन्हें न था… वे झूठ और फरेब के कीचड़ में थोड़ी दूर चले आये थे पर इसकी सड़ांध झेल पाना उनके वश की बात नहीं थी’। मनुष्यता के न्यूनतम पैमानों को धत्ता बता चुके केएनटी के लिए कहानीकार की यह टिप्पणी क्या इस पात्र के प्रति उसके अतिरिक्त मोह के कारण ही नहीं है? कहानीकार की नजर में केएनटी की नीचता ‘मजबूरीवश’ है। इसके विपरीत ‘ऑपरेशन माउस’ के ओबीसी पात्र बीके उर्फ ब्रजेश कुमार के मामले में वह ऐसी कोई ‘मजबूरी’ नहीं दिखाता। बीके अपनी कमजोरियों के लिए स्वभाववश (संस्कारवश?) जिम्मेदार है।
संग्रह की 11 कहानियों में न कोई दलित है, न आदिवासी और न ही मुसलामन अथवा अन्य सांस्कृतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि वाला कोई पात्र है। बिना अपवाद के सभी ब्राह्मण परिवार निम्नमध्यम आय वर्ग के, कर्ज में डूबे, बेटियों के विवाह के लिए चिंतित, भारतीय संविधान में आरक्षण के प्रावधान के प्रति विद्वेष से भरे और सामाजिक न्याय की अवधारणा वाली राजनीतिक सत्ता के प्रति घनघोर प्रतिक्रियावादी रुख वाले हैं। कहानियों के मुख्य पात्र इन परिवारों के नवयुवक हैं। ये ‘धूप में चलकर दो दिन तक बीमार पड़े रहने वाले सुकुमार’ लड़के हैं। वे पढ़ाई में अव्वल रहते हैं और इनके गैर द्विज साथी, जो ठेकेदारों और नवधनाठ्यों के बेटे हैं, इनकी कॉपियों से नकल करके पास होते हैं। गलत तरीके से पद पाते हैं लेकिन इनकी मदद के लिए आगे नहीं आते या कहें यदुवंशी कृष्ण और ब्राह्मण सुदामा की मित्रता नहीं निभाते। द्विज युवकों के पिता भी निरपवाद रूप से सामाजिक रूप से प्रतिगामी और अपने पुत्रों को उसी रास्ते पर ले जाने को इच्छुक हैं (गांधी जयंती, मेरे सपने वापस करो, झील वाला कंप्यूटर, बॉस की पार्टी और केएनटी की कार)। इसके बावजूद क्या यह अनायास है कि कहानीकार की नजर में ये पिता ‘आर्थिक अभावों के बावजूद स्वाभिमानी, किसी के आगे न झुकने वाले तथा संपन्नता के मद में चूर या चापलूस लोगों को नापसंद करने वाले’ हैं?
किसी भी कहानी में स्त्री की उपस्थिति मुखर नहीं है। बहनों के रूप में (गांधी जयंती, मेरे सपने वापस करो, चिड़ि‍याघर, उम्मीदवार) वे घर में रेडियो सुनते हुए विवाह का इंतजार करने, पति की मार चुपचाप बर्दाश्त करने वाली लड़कियां हैं, जिनका प्रायः नाम तक लेने की जरूरत नहीं समझी गयी है। प्रेमिकाओं के रूप में (बॉस की पार्टी, झील वाला कंप्यूटर) उनका चरित्र रो-धो कर शांत हो जाने वाला है जबकि पत्नी के रूप में वे या तो अपनी कोई इच्छा न रखने वाली स्त्रियां हैं या जया के रूप में पति को बर्बाद करने वाली खलनायिका (मेरे सपने वापस करो, चिडियाघर)। भाइयों, प्रेमियों और पतियों की बौद्धिक क्षमता, लालसाएं और महत्वाकांक्षाएं इन्हें नहीं व्यापती।
वास्तव में प्रतिगामी रुझान अकेले नहीं होते। इनका एक पूरा पैकेज होता है। अगर आप जाति को लेकर रूढ़ हैं, तो स्त्रियों के प्रति भी आपका नजरिया वही रहेगा।
(प्रमोद रंजन। प्रखर युवा पत्रकार एवं समीक्षक। अपनी त्‍वरा और सजगता के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। फॉरवर्ड प्रेस के संपादक। जनविकल्‍प नाम की पत्रिका भी निकाली। कई अखबारों में नौकरी की। बाद में स्‍वतंत्र रूप से तीन पुस्तिकाएं लिखकर नीतीश कुमार के शासन के इर्द-गिर्द रचे जा रहे छद्म और पाखंड को उजागर करने वाले वह संभवत: सबसे पहले प‍त्रकार बने। उनसे pramodrnjn@gmail.com पर संपर्क करें।)