कोसो जस्टिस काटजू को, मगर अपनी औकात मत भूलो !


कोसो जस्टिस काटजू को, मगर अपनी औकात मत भूलो !


भडासी बाबू,
मुझे पता नहीं आपको अंग्रेजी आती है या नहीं और अगर आती भी है तो क्या आप NDTV या TIMES NOW देखते हैं या नहीं. और देखते भी है तो वो कार्यक्रम आपने देखा या नहीं जिस में जस्टिस काटजू ने विस्तार से बताया कि ये सोशल माडिया किस तरह साम्प्रदायिक दंगे भड़का कर समाज का सत्यानास कर पाने की स्थिति में है. उन्होंने बताया कि कैसे एक धर्मगुरु (पंडित या मुसलमान) को एक ऐसे पशु के साथ सम्भोग करते दिखाया गया जो कि उस धर्म विशेष में प्रतिबंधित है. उस तरह की एक हरकत की बानगी आप चाहें तो आप यहाँ देख लें.

ये फोटो एक साहब ने ये लिख के लगाई है कि हिन्दू बेवकूफों का धर्म है.



hinduo ka dhARM bewkufo ka dharm yeh photo se saabit bhi hota he

और फिर जब उस पे धंधे के लिए ज़रूरी कमेन्ट आने शुरू हुए तो उन में कुछ कमेंट ये भी थे. ज़रा मुलाहिजा फरमाइए.

AAJ RAAT KO GANAGA NADIHARIDUWAR U.P INDIYA ME
EK PROGERAM HAI
JISME SEETA K SAATH RAWAN KAISE SEX KARTA THAA
OR RAM LAXMAN GAY THAA
PARWATI K SAATH RAJA JANDHAR SEX KARTA THAA
OR SHIV JI KA LING PENIS KAAT KAR PHENK DIYA THAA
HANUMAN KI MAA ANJANI K SAATH KESE BALATKAR RAPE HUA

DIKHAYA JAYEGA

KYA ME AAPKO BATAAU
HINDU K SHIV BHAGWAN
KI WIFE PAARWATI K

BAHUT AASHIQ THEY

आगे लिखा है कि राम मांसाहारी था, उस की कई पत्नियां थीं, उस ने पिता का अनादर किया और खुद भगवान होते हुए पानी में डूब मरा.

भड़ासी बाबू आपने भले ही किसी अखबार या चैनल में पालिटिकल रिपोर्टिंग या ब्यूरो चीफी तक का काम न किया हो तब भी इतना दिमाग तो होगा कि ये एक फोटो उस पे ऐसे दो चार कमेंट ही इस देश में कहीं भी संभल और गुजरात कर देने के लिए काफी  बल्कि ज़रुरत से बहुत ज़्यादा है. और अगर आप नहीं समझते तो आप को वो सब समझ में आने देने के लिए इस देश में एक और गुजरात नहीं करवाया जा सकता. क्या गलत 
कहते हैं जस्टिस काटजू कि किसी को इस देश में वो सब करा पाने की इजाज़त नहीं होनी चाहिए. और ये दिक्कत आई ही तब है कि जब उस तरह का सोशल मीडिया आपत्तिजनक और भड़काऊ काम करने लगा है जिसका भारत के समाज या उस के सरोकारों से कोई लेना देना ही नहीं है. जिस अमेरिका की बात आप कर रहे हैं वहां भारत की तरह न लोग बेवकूफाना हरकतें करते हैं, न उन पे भड़कते हैं. क्यों आपको उस सोशल मीडिया की चिंता तो हो जो इस देश में साम्प्रदायिक दंगे भड़का सकने की हालत में हो मगर जस्टिस काटजू को उस समाज की भी न हो जिस में साम्प्रदायिकता भड़क सकने को उन्होंने हम सब से ज़्यादा करीब से देखा और झेला है. प्रेस काउन्सिल के अध्यक्ष के नाते जिनकी जिम्मेवारी भी है कि प्रेस को उसका कारण न बनने दें.

देश मानता है आप न मानिए उन्हें प्रेस काउन्सिल का अध्यक्ष या उन पे इस ओहदे के साथ आई वैसी कोई जिम्मेवारी. आप उनकी राय से सहमत भी न होइए बेशक. इस देश की मौजूदा व्यवस्था में जैसे अधिकार अनवर चौहान को हिन्दू धर्म को बेवकूफों का धर्म बताने का हासिल है वैसा आप को जस्टिस काटजू को नब्बे फ़ीसदी बेवकूफों में से एक बताने का भी है. लेकिन आप को सोशल मीडिया की तरफ से अपना पक्ष रखने का अधिकार किस ने दिया है? टीवी और अखबार तो फिर पाबन्द हैं अपनी ही बनाई किसी न्यूज़ ब्राडकास्टर एसोसिएशन या एडिटर गिल्ड या प्रेस कैंसिल के नियम कायदों के. आप किस के पाबन्द हैं, किस के सदस्य या नुमाइंदे? बहुत से बहुत आप अपने नुमाइंदे हैं और तब भी आपको गरियाने का हक़ किसने दिया है? बहुत पढ़े लिखे या बहुत किसी महत्वपूर्ण जिम्मेवारी वाली नौकरी पे कभी नहीं रह पाना और उस के साथ मिलने वाली परिपक्वता आप के अपने हाथ में नहीं भी हो सकता है. मगर क्या परिवार से भी वो संस्कार नहीं ले के चले आप 
कि अपने पिता से भी बड़ी उम्र के किसी व्यक्ति और सुप्रीम कोर्ट के जज रह सकने लायक बुद्धि और क्षमता वाले काटजू साहब तक को आप सिर्फ काटजू और ''पार्टनर'' कह के सम्बोधित कर रहे हैं? बदतमीज़ी की भी कोई हद होती है?

इज्ज़त देने से मिलती है दोस्त. उतारने औरों की तो पता नहीं मगर अपनी उतर जाती है. पहली बात तो ये है कि अपने आप को उन विदेशी नेटवर्कों का इस देश में प्रतिनिधि समझना बंद करो जिन की साइट्स में आज भारतीय समाज को साम्प्रदायिक तनाव और कल देश को गृह युद्ध की स्थिति में धकेल सकने की ताकत है. दूसरी बात ये कि बात अगर आप अपनी साईट और अपने जैसी पत्रकारिता की कर रहे हैं तो वो भी दरअसल पत्रकारिता है ही नहीं. वो सिर्फ किसी के भी द्वारा, किसी के भी प्रति, कुछ भी बकवास लिख देने भर का भोंडा जरिया है. इधर लिखो, छापो और उधर अलग से मेल कर के माफ़ी मांगो. याद है लिखा आपने मेरे बारे में भी था. लिखा था कि मैंने हिंदी पत्रकारिता के भीष्म पितामह के बारे में शिकायत लिख भेजी थी. उन को जो न मेरे कभी मालिक थे न उन के. 
लिखने, छापने के समय वो चिट्ठी आपके पास नहीं थी.आप ने मुझ से उस की पुष्टि करना भी ज़रूरी नहीं समझा था. फिर आपने कहा कि वो चिट्ठी आप मुझे एक महीने में उपलब्ध करायेंगे. चार महीने हो गए. चिट्ठी न आई. अलबत्ता आपके कुछ माफीनामे ज़रूर आ गए थे. वे आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं. लेकिन मैं आपको सच बताऊँ मैंने आपको इस लिए माफ़ नहीं किया कि आप पे मानहानि का केस ठोकने के लिए कोई दलील, सबूत, वकील या कारण नहीं था मेरे पास. मैंने ये सोच कर केस नहीं किया आप पे कि रोटी तो चलो मजबूरी है मगर दारु जैसा शौक भी जो लोगों से पैसे मांग कर पूरा करता हो उस को क्या रगड़ना. मेरे एक मित्र ने समझाया, समझो वो है ही नहीं दुनिया में. मैंने मान लिया.

लेकिन सब मेरे जैसे नहीं होंगे. शायद मैं भी मैं न रहूँ. मगर आप फैलना बंद कर दो. तर्क की बात तर्क से नहीं कर सकते तो गरियाना बंद कर दो. जहां पे हो वहीं रहो. जस्टिस काटजू जैसों को समझ नहीं सकते तो समझाना बंद कर दो. आपका मुझे मालूम नहीं मगर मेरी साईट पत्रकारों की एक प्रतिष्ठित साईट है. एक हफ्ते में बारह लाख का आंकडा हमारा भी है. भारत के बाहर के भी पत्रकार सदस्य हैं इस साईट 
के. मैं कुछ गलत नहीं समझता उन साइटों के बंद हो जाने में जो किसी भी धर्म के बारे विष-वमन करती हैं या जो साम्प्रदायिक दंगे भड़काना चाहती हैं या जिन्हें टुकड़ा डलता न रहे तो वो चरित्र-हनन या गाली गलौज पर उतर आती हैं. रही अमेरिका जैसे संपन्न देश में भी सोशल साईट बंद न हो पाने की बात तो वो अमेरिका जाने. मगर चीन में गूगल बंद हुई. क्या हो गया? भारत में भी क्या हो जाएगा? विध्वंस का पुख्ता सबूत हो तो कोई भी साईट किसी भी देश की शान्ति, सदभाव या एकता ज़्यादा ज़रूरी और महत्वपूर्ण नहीं है.

इस पे बहस करिए. मगर एक शुभचिंतक के नाते मेरा ये सुझाव है कि आप अपनी बात सलीके से कहना सीख लें. कहीं ऐसा न हो कि वो आप को जेलों के वार्डन सिखाते फिरें. आप को अपने जैसा पत्रकार होने वाला एक आदमी नहीं मिलेगा इस देश में. लेकिन जस्टिस काटजू हो सकने की तमन्ना वाले लाखों मिलेंगे. इस लिए हे भाई तमीज से रहो. अपनी औकात में. फैलोगे तो बिखर जाओगे.

ज़रूरत पड़ी तो शेष फिर...

-संपादक
Sabhar- Journalistcommunity.com
कोसो जस्टिस काटजू को, मगर अपनी औकात मत भूलो ! कोसो जस्टिस काटजू को, मगर अपनी औकात मत भूलो ! Reviewed by Sushil Gangwar on April 27, 2012 Rating: 5

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