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बनिये के अखबार को कभी अपना अखबार मत समझो!


अश्लीलता पर घमासान को लेकर कुछ सवाल
♦ पलाश विश्वास
पलाश जी ने इंडिया टुडे के ताजा अंक की कवर स्‍टोरी से जुड़ी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अपनी तरह से मामले को उठाया है। हम स्‍पष्‍ट करना चाहते हैं कि हम किसी को नौकरी छोड़ने के लिए प्रेरित नहीं करना चाहते और न ही इंडिया टुडे में किसी क्रांतिकारी बदलाव की कोई आकांक्षा पालना चाहते हैं। दरअसल बात इसलिए उठी और जिसका जिक्र आपने भी किया है, कि दिलीप मंडल जी ने जिस मीडिया को जिन जिन वजहों से अंडरवर्ल्‍ड कहा, उसी अंडरवर्ल्‍डनुमा मीडिया की कमान संभालते हुए वे अपनी ही आलोचना के घेरे में आ गये। उनकी जगह कोई और संपादक होता, तो शायद यह बहस नहीं होती, जिसे पलाश जी अश्‍लीलता पर हो रही बहस कह रहे हैं और जो दरअसल अश्‍लीलता पर बहस नहीं है। इंडिया टुडे की इस कवर स्‍टोरी की आलोचना कोई अजीत अंजुम या कोई अविनाश नहीं कर रहा, बल्कि खुद दिलीप मंडल इस कवर स्‍टोरी के जरिये अपनी ही आलोचना कर रहे हैं। इस पूरे मसले को इसी दृष्टिकोण से समझा जाना चाहिए : मॉडरेटर
वैकल्पिक मीडिया के फोरम में इंडिया टुडे के ताजा अंक की अश्लीलता को लेकर घमासान मचा हुआ है। हमारे प्रिय मित्र, अगर वे हम जैसे नाचीज को मित्र मान लेने की उदारता दिखाएं तो, आपस में भिड़े हुए हैं – मूल्यबोध और प्रतिबद्धता के सवाल पर।
मैं 1973 से दैनिक पर्वतीय से जुड़ गया था​ ​- नैनीताल में। छात्रजीवन में दिनमान के लिए भी पत्रकारिता की। 1978 से नैनीतील समाचार की टीम के साथ लग गया। सितारगंज में केवल कृष्ण ढल के साथ मिलकर साप्ताहिक लघुभारत भी चलाया। थोड़े वक्त के लिए इलाहाबाद और दिल्ली से फ्रीलांसिंग भी की। 1980 से पत्रकारिता मेरा पेशा है। 1991 में जनसत्ता कोलकाता आ गया। तब दिलीप मंडल भी हमारे साथ थे। मैं अमर उजाला छोड़कर आया था, जहां दिल्ली ब्यूरो में तब अजित अंजुम पत्रकार थे। आज दिलीप इंडिया टुडे के संपादक हैं और अजित अंजुम एक टीवी चैनल के मैनेजिंग एडिटर हैं। अविनाश भी प्रख्यात पत्रकार हैं। अब इन लोगों ने जो लफड़ा खड़ा कर दिया है, कायदे से अगस्त्य मुनि के आशीर्वाद से विंध्याचल बने हुए मेरे जैसे लोगों को उसमें पड़ना ही ​​नहीं चाहिए। लेकिन बहस जिस दिशा में जा रही है, उससे न चाहकर भी कुछ बातें कह देना अपनी हैसियत के प्रतिकूल जरूरी लगता है!
 क्या वैकल्पिक मीडिया को कॉमर्शियल मीडिया पर इतना स्पेस जाया करना चाहिए, बुनियादी मुद्दा यह है।
 क्या नौकरी की मजबूरी प्रतिबद्धता और मूल्यबोध की कसौटी है, मुद्दा यह भी है।
 क्या आज की व्‍यावसायिक पत्रकारिता में संपादक नाम की किसी संस्था का कोई वजूद है?
 फिर अगर हम इंडिया टुडे जैसी पत्रिका से मूल्यबोध और प्रतिबद्धता की अपेक्षा रखते हैं, तो हम वैकल्पिक मीडिया की क्यों बात करते हैं?

मेरा मकसद किसी का बचाव करना या किसी के खिलाफ हमलावर तेवर अपनाना नहीं है बल्कि इस बहस की गुंजाइश पैदा करना है कि आज की सूचना विस्फोटक विकट स्थिति में हम अपने संसाधनों और प्रतिभाओं को जन सरोकार की दिशा में कैसे संयोजित कर सकते हैं।
दिनमान के संपादक पद से जब माननीय रघुवीर सहाय को हटा दिया गया. तभी साफ हो गया था कि आगे क्या होनेवाला है। खासकर अंग्रेजी मीडिया के सहयोगी हिंदी पत्र पत्रिकाओं में मौलिक पत्रकारिता की नियति तय हो गयी थी। इसका ज्यादा खुलासा करने की शायद जरुरत नहीं है।
कुछ दिलचस्प किस्से सुनाये बगैर मेरी बातें स्पष्ट नहीं होंगी। मेरे बहस गंभीर मित्रो, इसके लिए माफ करना।
1981 में दैनिक आवाज धनबाद में काम करते हुए मैंने टाइम्स आफ इंडिया के प्रशिक्षु पत्रकार बनने के लिए परीक्षा दी थी। इंटरव्‍यू में तब धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती ने मुझसे सीधे पूछ लिया था, आपकी विचारधारा क्या है। मैंने बेहिचक जवाब दिया था – साम्यवाद। जाहिर है कि मैं फेल हो गया। उस परीक्षा में उत्तीर्ण होकर जीआईसी के हमारे सहपाठी बाद में बड़े संपादक बने। दिलीप मंडल और सुमंत भट्टाचार्य ने तो टाइम्स के प्रशिक्षण से ही पत्रकारिता की शुरूआत की, हालांकि काफी बाद में।
इससे भी पहले 1979 में मंगलेश डबराल की पहल पर इलाहाबाद में फाकाकशी करते हुए हम अमृत प्रभात की नौकरी के लिए परीक्षा में बैठे। मैं शेखर जोशी जी के घर रहता था। नीलाभ से लेकर शैलेश मटियानी​, भैरव प्रसाद गुप्त और मार्कंडेय के साथ चलता था। हमारी विचारधारा स्पष्ट थी और तब भी हम सड़क पर थे। समाचार संपादक माथुर साहब सर्वेसर्वा थे। उन्होंने बाकी सबको रख लिया, मुझे नहीं रखा।
आवाज में तब घोषित कम्युनिस्ट उर्मिलेश की मध्यस्थता में मुझे नौकरी दी गयी। आवाज प्रबंधन इससे पहले कम से कम दो कट्टर कम्युनिस्टों वीर भारत तलवार और मदन कश्यप को झेल चुका था। उन्होंने हमारी विचारधारा पर एतराज नहीं किया।
1984 में जब मैंने दैनिक जागरण ज्वाइन किया, तब तड़ित कुमार गोरखपुर में हड़ताल करवाने के लिए दोषी माने गये थे। नरेंद्र मोहन ने सीधे कह दिया ​​था, आप बंगाली हो और बंगाली कम्युनिस्ट होते हैं। आपकी विचारधारा से हमें कुछ लेना देना नहीं है। हम जो हैं, हैं, बदलेंगे नहीं। आप हमें ​​बदलने की कोशिश हरगिज नहीं करना। नारायण दत्त तिवारी के खास थे नरेंद्र मोहन जी। महतोष मोड़ आंदोलन के दौरान जब तिवारी ने कम से कम तीन बार मुझे हटाने के लिए उनसे कहा, तो उन्होंने सीधे ना कर दिया। कई बार ऐसा भी हुआ कि छह सौ रुपये महीने पर रखे गये तमाम पत्रकार काम सीखने के बाद एकमुश्त भाग गये। डेस्क पर नरेंद्र मोहन जी हमारे सामने बैठ गये और बोले कि पहले प्रशिक्षु पत्रकार के लिए विज्ञापन बनाओ। ​​पूरे छह साल मैं जागरण मेरठ में रहा और तमाम पत्रकारों की नियुक्तियां हमने की। नरेंद्र मोहन जी कहते थे कि जब आप अखबार निकालते हो, हम हस्तक्षेप नहीं करेंगे, गड़बड़ी हुई तो अगले दिन बात करेंगे। हमारी विचारधारा कभी आड़े नहीं आयी।
हाशिमपुरा और मलियाना जनसंहारों की खबरें हम जो छाप नहीं सके, उसके लिए नरेंद्र मोहन या धीरेंद्रमोहन जिम्मेवार नहीं थे। संपादकीय प्रभारी और चीफ रिपोर्टर के तार संघ परिवार से जुड़े थे, उन्होंने अपने स्तर पर खबरें रोकीं या फिर मुसलमानों के खिलाफ खबरें छपवायीं, जिसे हम रोक नहीं सकें।​​ पर महज मुख्य उपसंपादक होने के बावजूद लोग हमें घेरते रहे। विचारधारा और प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े करते रहे। लोगों को यह समझाना वाकई मुश्किल था कि मैं सिर्फ नौकरी कर रहा था। नीति निर्धारण में मेरी कोई भूमिका नहीं थी।
इससे भी बुरी हालत में मुझे आवाज और अमर उजाला की नौकरियां छोड़नी पड़ी।
आवाज में रोजाना पेज पेज भर रपटें मेरे नाम के साथ छपती थीं। तमाम कोयला खान दुर्घटनाओं की हमने पड़ताल की। कोल इंडिया को कठघरे में खड़े करता रहा। पाठकों के फोरम चालू किये। झारखंड आंदोलन से मजदूर आंदोलन तक को आवाज दी। 1983 में मैंने शादी की और सविता के गृहस्थी संभालते न संभालते अखबार की नीतियां बदल गयीं।
खान दुर्घटना की रपट मैं बना नहीं सकता था। फर्जी मुठभेड़ की खबरें मैं छाप नहीं सकता था। तमाम खबरें हमारी प्रतिबद्धता के खिलाफ थीं।​​ तब तक बिना सोचे समझे हमने अपने को पूरे झारखंड में मशहूर कर लिया था। लोगों को हमसे भारी अपेक्षाएं थीं। हमारा खाना पीना मुश्किल हो गया था। झारखंड के कोने-कोने से लोग सीधे हमारे यहां आ धमकते थे और सविता के सामने लानत सलामत करते थे। शादी को सालभर नहीं हुआ था, पर मेरी पत्रकारिता सविता के लिए दहशत में तब्दील हो गयी थी।
तब हमने आवाज छोड़ने का पैसला कर लिया और कसम खायी कि अब अखबारों में नौकरी ही करनी है। दूसरे के अखबार से अपनी क्रांति नहीं हो सकती, यह बात हम समझ चुके थे। तभी हमने तय किया कि जिस अखबार में काम करना है, उसके लिए बाई लाइन के साथ हरगिज नहीं लिखना है।
पर जागरण में महतोष मोड़ आंदोलन के दरम्यान और अमर उजाला में खाड़ी युद्ध के मौके पर हमें यह कसम तोड़नी पड़ी।​
अमर उजाला हमने अतुल माहेश्वरी जी के कारण ज्वाइन की थी। पर गलती यह की कि मेरठ जागरण में बिताये छह साल के लिहाज से मेरठ के बदले बरेली को चुन लिया। बरेली से घर नजदीक पड़ता था, शायद यह भी एक कारण था।
राजुल माहेश्वरी बरेली में स्थानीय संपादक थे। पर सर्वेसर्वा थे उनके आगरा में रहने वाले अशोक अग्रवाल, जिनसे हमारी कभी पटरी नहीं बैठी। बाबरी मस्जिद दंगों के दौरान जब न जाने कितने मारे गये, जैसी सुर्खिया छापी जा रही थी बैनर बनाकर, हम लोग संयमित अखबार निकालने की कोशिश कर रहे थे और सर्कुलेशन दनादन गिर रहा था। इस पर तुर्रा यह कि हम राजेश श्रीनेत और दीप अग्रवाल के समकालीन नजरिये से भी जुड़े हुए थे। आगरा से अशोक अग्रवाल जी ​​आये और बरस पड़े। अखबार की दुर्गति के लिए उन्होंने वीरेन डंगवाल, सुनील साह और मुझे जिम्मेवार ठहराया। हालत यह हो गयी कि मैंने राजुल जी से कह दिया कि अब आपके यहां नौकरी नहीं करनी। इसी वजह से बिना नियुक्ति पत्र मैं कोलकाता निकल गया प्रभाष जी के कहने पर। छह महीने बाद नियुक्ति पत्र मिला और मैं सब एडीटर था। वीरेन डंगवाल और सुनील साह तब भी वहीं थे। बाद में वीरेन दा अमर उजाला के संपादक भी बने। फिर मतभेद की वजह से उन्होंने भी नौकरी छोड़ी।
संपादक बनने की महत्वाकांक्षा हर पत्रकार की होती है। संपादक न बनकर भी लोग संपादकी तेवर में बदल जाते हैं। हमारे पुराने मित्र धीरेंद्र ​अस्थाना से हमारी पहली मुलाकात आपातकाल के दौरान जनवादी लेखक संघ बनने से पहले शिवराम आयोजित कोटा में साहित्यकारों की गुप्त सभा में हुई थी। नैनीतीस से मैं और कपिलेश भोज उस सभा में तब शामिल हुए, जब हम बीए पहले वर्ष के छात्र थे। चिपको आंदोलन के दौरान यह दोस्‍ती गहराती गयी। जब मैं मेरठ में था, तब धीरेंद्र दिल्ली में थे। पर जनसत्ता मुंबई में वे फीचर संपादक थे और कोलकाता में मैं सब एडीटर। कोलकाता आये तो मुझे पहचाना तक नहीं।​
जनसत्ता से जो लोग निकल गये, वे सबके सब संपादक बन गये। गनीमत है कि हम नहीं निकले और गनीमत यह भी कि दिवंगत जोशी जी सबएडीटरी का हमारा स्थायी बंदोबस्त कर गये। वरना संपादकों की जो दुर्गति हो रही है, उससे हम साफ बच नहीं पाते और जाहिर है कि दांव पर होता दिलीप की तरह हमारी प्रतिबद्धता भी।
हमने पत्रकारिता के दो सिद्धांत पिछले तीन चार दशकों में गढ़ लिये हैं, चाहे तो आप भी उन्‍हें आजमा सकते हैं। पहला यह कि बनिये के अखबार को अपना अखबार कभी मत समझो और हमेशा उससे अपनी पहचान अलग रखो। अपने ही हाउस में एस निहाल सिंह और अरुण शौरी की दुर्गति देखते हुए हमने पिछले बाइस साल से इस सिद्धांत पर सख्ती से अमल किया है।​
दूसरा सिद्धांत थोड़ा खतरनाक है। वह यह कि बनिये की नौकरी करो, पर बनिये से कभी मत डरो। हम शुरू से इस सिद्धांत को मानते रहे हैं और उसका खामियाजा भी भुगतते रहे हैं।
इतना गप हो जाने के बाद हमारा सवाल है कि क्या हमारे प्रतिबद्ध प्रतिभाशील लोगों को व्‍यावसायिक मीडिया की नौकरियां छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि उस मीडिया के जरिये श्लील-अश्लील से ऊपर जो कुछ प्रकाशित या प्रसारित होता है, उसकी जिम्मेवारी से वे बच नहीं सकते? यानी व्‍यावसायिक मीडिया में जनता के हक में थोड़ा बहुत जो स्पेस बच जाता है, उसका इस्तेमाल हम दूसरे लोगों को करने के लिए मैदान खुल्ला छोड़ दें? कृपया आप विद्वतजन इस पर सलाह मशविरा करके अपनी राय दें।
गौरतलब है कि जब इकोनामिक टाइम्स की नौकरी छोड़कर आईआईएमसी में जाने का फैसला किया दिलीप ने तो उसने मुझसे भी पूछा था और हमने मना किया था। हमने कहा था कि कम से कम एक आदमी तो हमारा वहां है। दिलीप ने कहा था कि कारपोरेट पत्रकारिता में कहीं भी कुछ करने की गुंजाइश नहीं है। हम निरुत्तर हो गये थे। फिर उसने मीडिया का अंडरवर्ल्ड किताब लिखी। जेएनयू में गया। जब वह इंडिया टुडे का संपादक बना, तो गुलबर्गा में बामसेफ के राष्ट्रीय अधिवेशन में फारवर्ड प्रेस के संपादक इवान कोस्तका से इसकी जानकारी मिली। दिलीप के इंडिया टुडे के संपादक बनने की खबर सुनाते हुए इवान ने कहा था कि मालूम नहीं कि यह अच्छा हुआ कि बुरा। उन्होंने यह भी कहा कि खुद दिलीप को नहीं मालूम।
हैमलेट की सोलीलकी याद है न? टू बी आर नट टू बी?
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​बुनियादी मसला यह है कि क्या किसी व्‍यावसायिक मीडिया के शीर्ष पर किसी प्रतिबद्ध पत्रकार को होना चाहिए? द्विज या गैर द्विज, कोई फर्क​​ नहीं पड़ता। वैसे गैर द्विज हैं ही कितने पत्रकारिता में? संपादक गिनाने जाएं तो दिलीप के अलावा हिंदी में दूसरा नाम नजर नहीं आता जो अस्पृश्य हो। सत्ता में भागेदारी का सिद्धांत आजमाएं तो शायद शुरू यहीं से करना पड़े कि मायावती का मुख्यमंत्री बनना ठीक था या गलत!
मूल्यबोध की बात करें तों जनसत्ता, देशबंधु और लोकमत समाचार जैसे दो चार अखबारों को छोड़कर तमाम पोर्टल पर नंगे चित्रों की भरमार है। बाकायदा पोर्नोग्राफी के सहारे नेट पर रीडरशिप और विज्ञापन बटोरने की होड़ है। तब क्या इन सभी मीडियासमूह के पत्रकारों को मूल्यबोध और प्रतिबद्धता की दुहाई देकर अपनी अपनी नौकरियां छोड़ देनी चाहिए। बहस की शुरुआत की है अजित अंजुम ने, जो एक टीवी चैनल के मैनेजिंग एडीटर है। चैनलों में टीआरपी के लिए क्या क्या पापड़ नहीं बेलने ​​पड़ते, उनसे बेहतर क्या जानेंगे हम?
तो क्या वे प्रतिबद्ध मूल्यबोध वाले पत्रकारों को दागी चैनलों की नौकरियां छोड़ने के लिए कहेंगे?
(पलाश विश्वास। पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, आंदोलनकर्मी। आजीवन संघर्षरत रहना और सबसे दुर्बल की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के पॉपुलर ब्लॉगर हैं। अमेरिका से सावधान उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठौर। उनसे palashbiswaskl@gmail.com पर संपर्क करें।)

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