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Sunday, 29 April 2012

सबसे बड़े जातिवादी हैं दिलीप मंडल


 शिवा नन्द द्विवेदी “सहर” 
“ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद (दिलीप मंडल परिभाषित) ही समाज का सबसे बड़ा शत्रु है ” ये मानना है मेरे फेसबुकिया मित्र दिलीप मंडल का ! पिछले कुछ दिनों से फेसबुक पर पर दिलीप मंडल जिस तरह से “जातिगत आरक्षण” के समर्थन में ढोल पीट रहे हैं लग रहा है उनसे बड़ा जातिवादी कोई दुसरा नहीं हो जबकि वो खुद को समानता स्थापित करने का नेता साबित करने पर तुले हैं ! इस क्रम में शब्दों के महागुरु दिलीप मंडल ने एक शब्द खोज निकाला है ” ब्राहमंवाद ” ! ब्राहमण को छोड़ कर लगभग जितनी भी जातिया ( आरक्षण लाभान्वित) इस भारतीय समाज में रहती हैं उनके खिलाप प्रयुक्त होने वाले एक एक शब्द को सहेज कर दिलीप मंडल ब्राहमंवाद को परिभाषित करने में तुले हैं ! हालांकि इस बात को समझना या समझाना अभी मुश्किल है कि उनके इस सुधार आन्दोलन के भावी परिणाम कितने नाकारात्मक प्रभाव डालेंगे !आज के हज़ारो साल पहले की किसी किताब मनुस्मृति का हवाला वो आज भी यत्र सर्वत्र देते रहते हैं ! हालांकि वर्त्तमान में दिलीप मंडल में जिस जातिगत महाग्रंथ को लिख रहे हैं उसे हम जाति व्यवस्था पर आधारित अदृश्य महाग्रंथ कह सकते हैं ! मनुस्मृत का कोई संवैधानिक महत्त्व है की नहीं ये तो सर्व विदित है लेकिन जो नए निर्माण कि वकालत आज दिलीप मंडल सरीखे लोगों द्वारा की जा रही है वो तो संवैधानिक स्वीकृति पर आधारित भी है ! सवाल यहाँ यह है कि क्या वर्ण व्यवस्था को ख़तम करने के लिए नई जाति व्यवस्था को स्थापित करना ” सामाजिक समानता ” कि तरफ एक कदम कहा जा सकता है ? जबकि उन्ही लोगों द्वारा वर्ण व्यवस्था का विरोध भी हो रहा है ! यहाँ आरक्षण वादियों का यह ढोंग साफ़ तौर पर नज़र आता है !
आरक्षण शब्द के उपर दिलीप मंडल जी कि सोच इतनी निम्न एवं जातिगत है कि मेरे एक मित्र ने यहाँ तक कहा कि ” अगर कहीं भूकंप आ जाय तो दिलीप मंडल सबसे पहले लाश को उलटा कर उसकी जाति ही देखेंगे ” और दिलीप मंडल का बर्ताव इससे जुदा नहीं है ! मेरे मत में जितने जातिवादी दिलीप मंडल हैं उतना तो कोई मनुवादी भी नहीं रहे होंगे ! इन सबसे हट कर ज़रा आरक्षण पर बात करे तो यह विचार सिर्फ इस हित में लाया गया कि ” दौड़ प्रतियोगिता में दो सही सलामत पैरों वालों के साथ एक विकलांग को भी हिस्सा लेने और जितने का अवसर मिल सके ! लेकिन उनको क्या पता था कि भावी दिनों में दिलीप मंडल जैसे विचार धारा वाले लोग विकलांगो को अवसर देने की वजाय सबको विकलांग बनाकर ही दौडाने के लिए ही लड़ते फिरेंगे ! परिणामत: आज ब्राहमण को छोड़कर लगभग हर छोटा बड़ा समुदाय आरक्षण कि मांग कर रहा है , और देश के स्वार्थी तत्व ( राजनेता) आरक्षण के तवे पर अपनी रोटी खूब सेंक रहे हैं !
अगर आज़ादी के बाद पिछड़े तबके को विकास का विशेष अवसर देने के लिए एस.सी/एस.टी वर्ग का निर्धारण किया गया तो निश्चित तौर पर यह देख कर ही किया गया होगा कि आरक्षण कि जरुरत वास्तविक रूप से किसे है और पिछड़ा कौन है ? लेकिन जिनके लिए यह आरक्षण प्रावधान लाया गया उनको क्या मिला इस पर सोचने वाला कोई दिलीप मंडल भले ना आया हो लेकिन इस आरक्षण के कामधेनु के दायरे को और कितना बढाया जाय इस मुद्दे पर हज़ारों दिलीप मंडल खड़े मिलेंगे ! एस.सी / एस.टी के बाद ओ.बी.सी का आना इसी राजनीतिक और जातिवादी सोच रूपी ढोंग का परिणाम है ! क्या ओ.बी.सी के अंतर्गत आने वाले लोग आज़ादी की बाद अचानक पिछड़ गए ? अगर नहीं तो फिर ये ओ.बी.सी क्यों ? और अगर ये पहले पिछड़े थे तो इन्हें उसी समय एस.सी के दायरे में क्यों नहीं रखा गया ? आज यादव , बनिया , और भी तमाम जातियां जो कितनी पिछड़ी थीं और आज कितनी पिछड़ी हैं किसी से छुपा नहीं है ? लेकिन ओ.बी.सी नाम के इस राजनीतिक ढोंग ने इनको भी पिछड़ा मान लिया ! दिलीप मंडल जी अगर आप आरक्षण के माध्यम से जाति व्यस्था का अंत करना चाहते हैं तो जाइए थोड़ा पता लगाइए कि आपके गाँव में कितने ओ.बी.से ऐसे हैं जो सीना चौड़ा कर ये कहने को तैयार हैं कि मै एस.टी हूँ , पता लगाइए फिर जातिवाद ख़तम करने कि दुहाई दीजिये ! आज ओ.बी.सी क्या शर्म महसूस करता है एस.सी/ एस.टी कहलाने में , अगर नहीं तो उसे भी एस.सी एस.टी के दायरे में लाने कि लड़ाई लड़िये , शायद जातिवाद समस्या का कुछ निवारण मिल सके ! अगर ये हो गया तो पुरे समाज में सिर्फ एक ब्राहमण ही जातिवादी बचेगा उसे भी देख लिया जायेगा लेकिन पहले इन आरक्षण लाभावन्वित जातिवादीयों से तो दो हाथ कर लीजिये ! अगर ये जातिवादी नहीं हैं तो इतनी कटेगरी ( एस.से, एस.टी, ओ.बी.सी ) को स्वीकार क्यों किये हैं ? वी.पी .सिंह सरकार के समय जब सरकारी नौकरियों में ओ.बी.सी आरक्षण कि जब बात आई तब ओ.बी.सी में तमाम ऐसी जातियों को राजनीतिक हित ध्यान में रखते हुए रखा गया जो पहले से ही मजबूत स्थिति में थी ? ये कैसी समानता है दिलीप मंडल ?
सबसे बड़ा सवाल है की आखिर आरक्षण में इतनी कटेगरी क्यों बन रही है ? आज का हर गैर ब्राहमण ( जाट, गुर्जर,मीना) जो सर्व शक्ति सम्पन्न है, आरक्षण की मांग कर रहा है या आरक्षण से लाभान्वित भी हो रहा है ! क्या आरक्षण के दायरे में हो रही वृद्धि( ओ.बी.सी ) का दुष्परिणाम नहीं है ? क्या यहाँ विकास से ज्यादा राजनीति की बू नहीं आ रही है ?
दिलीप मंडल जी, रही बात सोच कि तो आप लोग पाषाण युग से बाहर आयें , ब्राहमण ने हमेशा समय और समाज के जरुरत के हिसाब से अपने सोच में विकासोन्मुख बदलाव किये हैं ! आज का कोई एक ब्राहमण दिखा दें जो नौकरी नहीं करने को तैयार है या नौकरी के समय यह बात पूछता हो की जिस संस्था के साथ वो काम कर रहा है , उसका मालिक किस जाति का है या उसे किसके अंतर्गत काम करना पड़ रहा है ? हमने सोच को बदला है अब आप बदल लें तो थोड़ा बेहतर हो समाज में ! आज का ब्राहमण पाषाण युग में नहीं है बल्कि यथार्थ में सामाजिक तौर तरीको से जी रहा है ! क्या आप बता सकते हैं कि आपकी इस ढोंगी समानता का राज क्या है ? जिस मानक के आधार पर आप विकास के सपने देख रहे है उस आधार पर ना तो कोई समानता आ सकती है ना ही कोई विकास की संभावना ! दिल्ली विश्वविद्द्यालय में एड्मिसन ले लेने से कोई सामाजिक समानतअ नहीं आ सकती है ! डी.यु और जे.एन.यु इस समाज में हैं जबकि आप डी.यु और जे.एन.यु में ही समाज खोजने में लगे हैं ! इसी बहस के क्रम में फेसबुक मेरे एक मित्र ने कहा ” द्विवेदी जी जिस दिन आप अपनी बेटी की शादी किसी आदिवासी से करने को तैयार हो उसी दिन समानता आ जाएगी ”
मै यहाँ सिर्फ एक बात कहूंगा कि इन पैसठ सालों के आरक्षण वादी युग में क्या आपने इतनी समानता देखि है कि कोई चमार(जातिगत नहीं) अपनी बेटी की शादे किसी धोबी के घर कर दे ! नहीं सर , अभी औरों को छोडिये ये आरक्षण का महामंत्र अभी उन्ही लोगों के बीच समानता नहीं ला सका है जो पैसठ सालों से इसका रसास्वादन कर रहें है ! इसका कारन एक मात्र यह है कि ” आरक्षण कभी समानता का मन्त्र हो ही नहीं सकता सिवाय राजनीतिक मुद्दे के ” !मेरे मित्रवत अग्रज दिलीप जी कभी कभी अजीब पूर्वाग्रह से ग्रसित मुद्दे लेकर आते हैं , जैसे उनका उद्देश्य जातिगत असामनता का विरोध करना नहीं बल्कि ब्राहमणों का विरोध करना हो ! कभी किसी फिल्म में विलेन कि जाति को लेकर तो कभी फिल्म को ही जाति से जोड़ना काफी हास्यपद लगता है और ऐसे मुद्दे पर बहस करना दीवार पर सर मारना है ! दिलीप मंडल के बदन से सामाजिक कार्यकर्ता की महक नहीं एक जातिवादी राजनेता कि गंध आती है ! उनको अपना पक्ष खुलेआम कर देना चाहिए कि क्या वो सामाजिक मुद्दों के चिन्तक हैं या जातिवादे नेता ? क्योंकि दोनों नहीं हो सकते ! फिलहाल तो अन्यों को जातिवादी बताने वाले मेरे मित्र सबसे बड़े जातिवादी खुद हैं जिनकी सुबह दोपहर शाम जातिवादी घड़ी देकर ही होती है ! मेरे मत में इस तरह से जातिवाद फैलाना साम्प्रदायिकता  फैलाने जैसा है 
Sabhar- Pravakta.com

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