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हुलिए से ही भिखमंगा लगता है एबीपी न्यूज़



abp newsस्टार न्यूज से आनंद बाजार पत्रिका का करार खत्म होने के बाद पत्रिका का अपने दम पर चैनल लांच करने की प्रक्रिया शुरु हो गयी है. आनंद बाजार पत्रिका ने चैनल का नाम एबीपी न्यूज रखा है. अब तो चैनल का लोगो भी वर्चुअल स्पेस पर तैरने शुरु हो गए हैं. फेसबुक और सोशल मीडिया पर एबीपी चैनल के लोगो और नाम को लेकर धुंआधार प्रतिक्रिया जारी है.

एबीपी नाम के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि इसका उच्चारण करते हुए जीभ लड़खड़ाती है. फर्राटेदार तरीके से जैसा कि चैनल के एंकर बोलने के अभ्यस्त होते है, ये नाम उनकी इस आदत से मेल नहीं खाता है. ऐसे में बहुत संभव है कि स्टार न्यूज के बैनर तले काम करनेवाले एंकर इस चैनल को एबीपी के बदलते एबीवीपी न कह दें. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को तो बिना कुछ किए-धरे क्रेडिट मिल जाएगी लेकिन एंकर की किरकिरी होनी तय है.

चैनल का नाम रखने के दौरान आनंद बाजार पत्रिका भले ही अपने नाम का मोह नहीं छोड़ पाया हो लेकिन इतना जरुर है कि नाम रखने के पहले इसके सीइओ सहित बड़े एंकरों को डेस्क पर आकर,सामने आईना रखकर दो-चार बार बोल लेना चाहिए था- नमस्कार, मैं हूं दीपक चौरसिया और आप देख रहे हैं एबीपी न्यूज..तब शायद वो इसे कोई और नाम देने के बारे में गंभीरता से सोच पाते.

दूसरी बड़ी दिक्कत इसके लोगो को लेकर है. देखकर एकबारगी लगता है कि किसी बिल्डिंग की लिफ्ट की लालबत्ती वाली साइन की फोटोकॉपी कराकर,उसे ब्लू रंग से रंगकर चिपका दी गई हो. अब लोगो बेचारा बेतहाशा अदनान सामी के माफिक गा रहा है- थोड़ी सी तो लिफ्ट करा दे. चैनल शुरु होने के पहले ही इसे टीआरपी के लिए मंगता चैनल का हुलिया देने की भला क्या जरुरत थी ? अब इससे बड़ी बिडंबना क्या हो सकती है कि इन सबके वाबजूद एबीपी ने पंचलाइन नहीं बदली है. अभी भी स्टार न्यूज की पंचलाइन ही नत्थी किए हुए है- आपको रखे आगे. अब सवाल है कि जिस चैनल के अभी दूध के दांत भी नहीं उगे और झड़े हैं, वो भला देश की ऑडिएंस को क्या आगे रखेगा ? ये साल 2012 के अबतक का सबसे बड़ा मीडिया चुटकुला है.:) मीडिया का बच्चा( चैनल) पैदा होने के पहले ही सरोकार की चादर ओढ़ने की फिराक में क्यों लगा रहता है ?

कहते हैं इतिहास के निशान इतने गहरे होते हैं कि कई बार रीढ़ की हड्डी बनकर पीठ पर चमकते हैं. एबीपी न्यूज के लोगो के साथ भी कुछ ऐसा ही है. स्टार न्यूज ने आनंद बाजार पत्रिका से तलाक के बाद भी अपना इतिहास उसमें जड़ दिया. अपने सितारे का एक कोना तोड़कर दे दिया जो कि लिफ्ट की साइन है. मानो कह रहा है- लो तुम्हें स्टार न्यूज का एक टुकड़ा दिया, ये मेरे साथ इतने सालों की रिलेशनशिप की निशानी है. इसे संभालो और धीरे-धीरे स्टार बना लो, हम दूसरी संतान पैदा कर लेंगे.


विनीत कुमार : टेलीविजन के कट्टर दर्शक। एमए हिन्दी साहित्य (हिन्दू कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय)। एफ.एम चैनलों की भाषा पर एम.फिल्। सीएसडीएस-सराय की स्टूडेंट फैलोशिप पर निजी समाचार चैनलों की भाषा पर रिसर्च(2007)। आजतक और जनमत समाचार चैनलों के लिए सालभर तक काम। टेलीविजन संस्कृति,यूथ कल्चर,टीवी सीरियलों में स्त्री छवि पर नया ज्ञानोदय,वसुधा,संचार, दैनिक जागरण में लगातार लेखन। ‘हुंकार’ ब्लॉग के जरिए मीडिया के बनते-बदलते सवालों पर नियमित टिप्पणी। सम्प्रति- मनोरंजन प्रधान चैनलों में भाषा एवं सांस्कृतिक निर्मितियां पर दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी. तहलका में कॉलम. 'मंडी में मीडिया' नाम से पहली किताब.
Sabhar- Mediakhabar.com