पत्रकार कोई रांड नहीं जो भाडू भाड़ खायेगें


-विनय जी. डेविड-

मध्यप्रदेश की पत्रकारिता आज बाजारवाद की गंदगी से सराबोर है। तीसरे दर्जे की राजनीति के षडयंत्रों से घिरी इस पत्रकारिता को दलालों के गिरोह ने फुटबॉल बनाकर रख दिया है। जो ईमानदार पत्रकार अपनी लेखनी की पूजा करते हैं और सामाजिक विद्रूपताओं को उजागर करते हैं वे दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। इसकी तुलना में वसूली का कारोबार करने वाले विज्ञापन के एजेंटों की पौ बारह है। यही कारण है कि अधिकतर पत्रकार या तो पीआरओ बनते जा रहे हैं या फिर विज्ञापन एजेंट। इसी तरह विज्ञापन एजेंटों ने पत्रकारों की कुर्सियां हथिया लीं हैं और अब तो वे भ्रष्ट अफसरों की कृपा से पत्रकारों के नेता तक बन गए हैं। पत्रकारों के नेताओं के इन हिजड़ा परस्त फार्मूलौं के कारण सरकार जनता के खजाने से पत्रकारों के लिए तमाम सुविधाएं उपलब्ध करा रही है लेकिन पत्रकारों का शोषण करने वाले ये सत्ता के दलाल इन संसाधनों को पत्रकारों तक नहीं पहुंचने दे रहे हैं। 

पत्रकारों की ये रसद बीच में ही गड़प कर जाने वाले इन सत्ता के दलालों को मध्यप्रदेश सरकार के जनसंपर्क विभाग के कुछ अफसरों ने अपना एजेंट बना रखा है। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारों की नीतियों को भ्रष्टाचार की गटर गंगा में बहाने वाले इन दलालों को पत्रकारों के एक स्वयंभू नेता ने अपनी सत्ता चमकाने के लिए पनाह दी थी। आज उस गद्दार नेता का सबसे पुराना एजेंट राधावल्लभ शारदा जनसंपर्क विभाग के भ्रष्ट अफसरों का सबसे बड़ा एजेंट बन गया है। पिछले कुछ सालों में इस दलाल ने पत्रकारों को सरकार से मिलने वाली योजनाओं के सहारे ही अपना कारोबार फैलाया है। जनसंपर्क विभाग के अफसरों ने पत्रकारों के बीच पिछले पंद्रह सालों से ज्यादा समय से चल रहे विवादों की आड़ में इस दलाल को भरपूर विकास दिया।

जनसंपर्क विभाग के भुगतानों की आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो से जांच कराई जाए तो राधा वल्लभ शारदा की नपुंसक राजनीति की पोल आसानी से खोली जा सकती है। इसका कारण ये है कि विभाग के भ्रष्ट अफसरों ने इसे जनता के खजाने से टैक्सी की सुविधा उपलब्ध कराकर पूरे प्रदेश के दौरे करने का मौका दिया। इससे इस दलाल ने प्रदेश के पत्रकारों को अपने संगठन का सदस्य बना डाला। कई स्थानों पर तो पत्रकारों के नेताओं ने एकमुश्त रकम देकर सभी पत्रकारों को इसके संगठन का सदस्य बनाया। जो पत्रकार शारदा को खुलेआम गालियां देते हैं वे भी इसके संगठन के सदस्य कैसे बन गए ये उनकी समझ में खुद नहीं आता। पत्रकारों को गुमराह करने के लिए इस दलाल ने इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन की मध्यप्रदेश इकाई के नाम से मिलते जुलते नाम वाले संगठन के माध्यम से ये घोटाले किए। जनसंपर्क विभाग के एक रिटायर हो चुके एक अफसर ने सबसे पहले इसके संगठन की नींव डलवाई थी। जब पूर्व की कांग्रेसी सरकार ने आईएफडब्ल्यूजे के नाम का अनुवाद करके बनाए गए मप्र श्रमजीवी पत्रकार संगठन का सूर्य अस्त करने की पहल की तो इसी विवाद का लाभ लेकर शारदा ने अपना संगठन बना लिया। 

जनसंपर्क विभाग के उसी पूर्व अफसर ने इस संगठन को मान्यता भी दिला दी। उस अफसर ने अपनी टैक्सी सेवा के माध्यम से इस दलाल को पूरे प्रदेश के दौरे कराए और दौरों की तीन गुनी संख्या में फर्जी बिल तैयार करके कोषालय से रकम आहरित कर ली। ये बिल विभिन्न ट्रांसपोर्टरों के नाम से तैयार कराए गए थे। उस समय ई पेमेंट की कोई प्रथा ही नहीं थी इसलिए ये बिल पास हुए और आडिट पार्टी ने भी अपनी दस्तूरी लेकर उन्हें अपनी हरी झंडी दे दी। बस यहीं से इस दलाल की राजनीति चमक गई। तभी से इसका पूरा परिवार जनसंपर्क विभाग में होने वाली लूट के टुकड़ों पर पल रहा है। बाद के अफसरों ने सहज कमाई की ये कहानी सुनी तो उन्होंने भी इस प्रथा को सहज की अपना लिया। सरकारी खजाने से बिल आहरित करने के लिए बनाए गए इस कमीशनखोर के संगठन ने जहां जनसंपर्क विभाग के चंद भ्रष्ट अफसरों के लिए कमाई के नए स्रोत विकसित किए वहीं इस भड़ुए ने पत्रकारों के शोषण के नए तरीके विकसित कर लिए। इसने पत्रकारों की आर्थिक सहायता के बजट पर अपने जहरीले दांत गड़ा दिए। अपने दौरों में ये दलाल पत्रकारों की संख्या के आधार पर सदस्यता राशि सबसे पहले वसूलता है।

इसके बाद पत्रकारों को आर्थिक सहायता दिलवाने का प्रलोभन देता है। खासतौर पर कमजोर आर्थिक हालत वाले पत्रकारों को इसका शिकार बनाया जाता है। इसके संगठन के इलाकाई दलाल उन सदस्यों को शारदा के पास भिजवाते हैं। उनके आर्थिक सहायता के फर्जी प्रकरण तैयार कराए जाते हैं फिर उन्हें जनसंपर्क विभाग से पास करा लिया जाता है। अपने इस कारोबार को विस्तार देने के लिए इस शातिर बदमाश ने भोपाल के जय प्रकाश चिकित्सालय में पूर्व सांसद प्रफुल्ल माहेश्वरी की सांसद निधि से एक वार्ड विकसित करवाया था। इस वार्ड के बहाने ये दलाल जेपी अस्पताल के डाक्टरों को अपने हित साधने में इस्तेमाल करता रहता है। ये डाक्टर इस दलाल के कहने पर प्रदेश भर के उन पत्रकारों के चिकित्सा देयक तैयार करवा देते हैं। डाक्टरों को ये दलीलें देता है कि फलां साथी जरूरत मंद है कृपया उसकी मदद कर दें। डाक्टर इसे पत्रकारों का सेवक समझते हैं और वे फर्जी बिलों पर बगैर कोई विचार किए दस्तखत कर देते हैं। जनसंपर्क विभाग में लगे बिलों से इस तथ्य की पुष्टि की जा सकती है। 

पत्रकारों की आर्थिक सहायता के प्रकरणों की पैरवी करते करते ये दलाल अपने भी फर्जी चिकित्सा देयकों को पारित करवाने की जुगत भिड़ाता रहता है। कुछ दिनों पहले इसने इंदौर के एक अस्पताल के फर्जी चिकित्सा देयक लगाकर मोटी रकम का भुगतान करवाने की योजना बनाई थी. इस राशि का चैक भी तैयार हो चुका था। बस केवल भुगतान होना था। तभी किसी जानकार ने इस मामले की शिकायत कर दी। जनसंपर्क विभाग के अधिकारी ने उन बिलों की जांच करवाने के लिए इंदौर के उस अस्पताल से संपर्क किया। वहां के चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि इस नाम के किसी भी मरीज का इलाज उनके असपताल में नहीं हुआ है। उस बिल क्रमांक पर किसी दूसरे मरीज का नाम दर्ज था। 

इसलिए जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों ने बिल का भुगतान तो रोक दिया पर जालसाजी करने वाले शारदा को दया करके छोड़ दिया। पत्रकार बनकर जनता के खजाने से जालसाजी करने वाला ये दलाल आज पत्रकार भवन समिति के अध्यक्ष विनोद तिवारी का संरक्षण लेकर अपना काला कारोबार चला रहा है। मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष शलभ भदौरिया को इसने जालसाजी के एक प्रकरण में फंसाकर दबा रखा है। भदौरिया के खिलाफ भी ये प्रकरण आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो में दर्ज है। इस प्रकरण की आड़ में शारदा अपना काला कारोबार चला रहा है और उसे अच्छी तरह मालूम है कि भदौरिया जब तक इस प्रकरण में फंसा रहेगा तब तक वह उसकी भी शिकायत नहीं कर सकता है। 

पत्रकारों के नाम पर चलाई जा रही इस घटिया राजनीति को जनसंपर्क विभाग के अधिकारी आसानी से समाप्त कर सकते थे लेकिन कुछ भ्रष्ट अधिकारियों ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए इस दलाल को भरपूर पनाह दी। अब यदि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अप्रैल में होने वाली पत्रकार पंचायत में इस दलाल के काले कारोबार पर सवाल उठेंगे इस दलाल का धंधा बंद हो सकता है। वास्तव में पत्रकारों का शोषण करने वाला ये दलाल पत्रकारिता छोडक़र सब करता है। जनसंपर्क विभाग की खबरों या चुराई गई खबरों में हेरफेर करके ये खुद को पत्रकार साबित करता रहता है। जबकि पत्रकारों और अन्य कर्मचारियों का शोषण करने के लिए ये खुद अपने बेटों के साथ षडयंत्र रचता रहता है। अपने सरकारी घर पर इसने पीडब्लयूडी विभाग से एक दफ्तर बनवा लिया है और इस दफ्तर से ये पत्रकारों के शोषण के नए नए षडयंत्र रचता रहता है। जनसंपर्क विभाग के अधिमान्य पत्रकारों को अपने संगठन के सदस्य बताकर इस दलाल ने कमीशनखोरी का बड़ा जाल बना लिया है। जब मुख्यमंत्री जी ने पत्रकार पंचायत की घोषणा की तो जनसंपर्क विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों और बाबुओं को भय सताने लगा कि कहीं उनकी पोल न खुल जाए। उन्होंने आनन फानन में इस दलाल के माध्यम से इसके नकली संगठन के कुछ पत्रकारों की बैठक बुलवाई। इन पत्रकारों की भोजन व्यवस्था भी इन्हीं भ्रष्ट अफसरों ने ही करवाई थी। इस बैठक में पत्रकारों की कथित कार्यसमिति के नाम से पत्रकार पंचायत का विरोध करने की रणनीति बनाई गई। इसके बाद शारदा ने कई अखबारों में ये खबरें छपवाईं। कुछ अखबारों को तो पूरे के पूरे पेज बनाकर भेजे गए जिनमें पत्रकार पंचायत का विरोध किया गया था। बाद में मुख्यमंत्री कार्यालय को इन अखबारों की कतरनें भिजवाई गईं. सरकारी बजट के इन दलालों ने मुख्यमंत्री को धमकाने के लिए तरह तरह के आरोप लगवाए। जिनमें कहा गया कि बड़े समाचार पत्रों और चैनलों के पत्रकार तो पंचायत में आएंगे नहीं। जबकि सच ये है कि इसी गिरोह ने कुछ तथाकथित बड़े पत्रकारों को भयभीत किया गया कि वे पत्रकार पंचायत का विरोध करें। 

यदि पंचायत होगी तो फिर बड़े पत्रकारों को दिए गए विज्ञापन और सत्कार के देयकों की पोल भी खुलेगी। इसके बाद पूरी दुनिया में पत्रकारों के भ्रष्टाचारों की कहानियां छपेंगी। बड़े कहे जाने वाले कुछ भ्रष्ट पत्रकारों ने जनसंपर्क विभाग से लाखों रुपयों के भुगतान प्राप्त किए हैं इसलिए वे भी धीरे धीरे शारदा के सुर में सुर मिलाने के लिए मजबूर हो गए हैं। जनसंपर्क विभाग और सरकार के कुछ नेता भी भेडियों के इसी सुर में सुर मिला रहे हैं क्योंकि उन्हें भय है कि यदि जनसंपर्क के बजट में भ्रष्टाचार की कहानियां खुलेंगी तो उनकी भी राजनीति चौपट हो जाएगी। इसलिए वे भी मंत्रियों के सहयोग से मुख्यमंत्री जी की ईमानदार पहल का विरोध करने में लग गए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि मुख्यमंत्री जी अपनी ही सरकार के खिलाफ रची गई इस साजिश का शिकार होने से खुद को जरूर बचा लेंगे।

पत्रकार कोई रांड नहीं जो भाडू भाड़ खायेगें पत्रकार कोई रांड नहीं जो भाडू भाड़ खायेगें Reviewed by Sushil Gangwar on February 23, 2012 Rating: 5

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