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Monday, 2 January 2012

पेड़ न्यूज' के चंगुल में पत्रकारिता


आकांक्षा यादव :  
आजकल ‘पेड-न्यूज’ का मामला सुर्खियों में है। जिस मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, ‘पेड-न्यूज’ ने उसकी विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा कर दिया है। प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया जिस तरह से लोगों की भूमिका को मोड़ देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा है, ऐसे में उसकी स्वयं की भूमिका पर उठते प्रश्नचिन्ह महत्वपूर्ण हो जाते हैं। मीडिया का काम समाज को जागरूक बनाना है, न कि अन्धविश्वासी. फिर चाहे वह धर्म का मामला हो या राजनीति का. पर मीडिया में जिस तरह कूप-मंडूक बातों के साथ-साथ आजकल पैसे लेकर न्यूज छापने/प्रसारित करने का चलन बढ़ रहा है, वह दुखद है. शब्दों की सत्ता जगजाहिर है. शब्द महज बोलने या लिखने मात्र को नहीं होते बल्कि उनसे हम अपनी प्राण-ऊर्जा ग्रहण करते हैं। शब्दों की अर्थवत्ता तभी प्रभावी होती है जब वे एक पवित्र एवं निष्कंप लौ की भाँति लोगों की रूह प्रज्वलित करते हैं, उसे नैतिक पाश में आबद्ध करते हैं। सत्ता के पायदानों, राजनेताओं और कार्पोरेट घरानों ने तो सदैव चालें चली हैं कि वे शब्दों पर निर्ममता से अपनी शर्तें थोप सकें और लेखक-पत्रकार को महज एक गुर्गा बना सकें जो कि उनकी भाषा बोले। उनकी कमियों को छुपाये और अच्छाइयों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करे. देश के कोने-कोने से निकलने वाले तमाम लघु अखबार-पत्रिकाएं यदि विज्ञापनों के अभाव और पेट काटकर इस दारिद्रय में भी शब्द-गांडीव की तनी हुई प्रत्यंचा पर अपने अस्तित्व का उद्घोष करते हैं तो वह उनका आदर्श और जुनून ही है. पर इसके विपरीत बड़े घरानों से जुड़े अख़बार-पत्रिकाएँ तो 'पत्रकारिता' को अपने हितों की पूर्ति के साधन रूप में इस्तेमाल करती हैं.



‘पेड-न्यूज’ का मामला दरअसल पिछले लोकसभा चुनाव में तेजी से उठा और इस पर एक समिति भी गठित हुई, जिसकी रिपोर्ट व सिफारिशें काफी प्रभावशाली बताई जा रही हैं।पर मीडिया तो पत्रकारों की बजाय कारपोरेट घरानों से संचालित होती है ऐसे में वे अपने हितों पर चोट कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं। अतः इस समिति की रिपोर्ट व सिफारिशों को निष्प्रभावी बनाने का खेल आरंभ हो चुका है। पर समाज के इन तथाकथित कर्णधारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि रचनात्मक पत्रकारिता समाज के लिए काफी महत्वपूर्ण है। पत्रकारिता स्वतः स्फूर्ति व स्वप्रेरित होकर निर्बाध रूप से चीज को देखने, विश्लेषण करने और उसके सकारात्मक पहलुओं को समाज के सामने रखने का साधन है, न कि पैसे कमाने का. यहाँ तक कि किसी भी परिस्थिति में मात्र सूचना देना ही पत्रकारिता नहीं है अपितु इसमें स्थितियों व घटनाओं का सापेक्ष विश्लेषण करके उसका सच समाज के सामने प्रस्तुत करना भी पत्रकारिता का दायित्व है. 

आज का समाज घटना की छुपी हुई सच्चाई को खोलकर सार्वजनिक करने की उम्मीद पत्रकारों से ही करता है। इस कठिन दौर में भी यदि पत्रकांरिता की विश्वसनीयता बढ़ी है तो उसके पीछे लोगों का उनमें पनपता विश्वास है. गाँव का कम पढ़ा-लिखा मजदूर-किसान तक भी आसपास की घटी घटनाओं को मीडिया में पढ़ने के बाद ही प्रामाणिक मानता है। कहते हैं कि एक सजग पत्रकार की निगाहें समाज पर होती है तो पूरे समाज की निगाहें पत्रकार पर होती है। पर दुर्भाग्यवश अब पत्रकारिता का स्वरूप बदल गया है। सम्पादक खबरों की बजाय 'विज्ञापन' और 'पेड न्यूज' पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। यह दौर संक्रमण का है. हम उन पत्रकारों-लेखकों को नहीं भूल सकते जिन्होंने यातनाएं सहने के बाद भी सच का दमन नहीं छोड़ा और देश की आजादी में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया. ऐसे में जरुरत है कि पत्रकारिता को समाज की उम्मीद पर खरा उतरते हुए विश्वसनीयता को बरकरार रखना होगा। पत्रकारिता सत्य, लोकहित में तथा न्याय संगत होनी चाहिए।


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