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पूरी पोल खोल दी भडासी भाई की

 क्या बात  है जगमोहन जी आपने तो पूरी पोल खोल दी भडासी भाई की ? हम तो अभी मुंबई से दूर है नहीं तो सलाम ठोक देते आपको  ?भड़ास के खर्चो की डिटेल ठीक ठीक दी है आपने ? दुनिया में अगर किसी को चूतिया बनाना आता है तो वह है  हमारे गुरु भड़ास ४ मीडिया के मालिक यशवंत सिंह ; 

नीचे की खबर जौर्नालिस्ट कम्युनिटी डाट .कॉम से साभार लेकर लगा रहा हु आप भी पढ़े :
 यों निकली 'भड़ास' की भड़ास -----

कुछ दिन पहले 'जर्नलिस्टकम्युनिटी' पर 'भड़ास' के बारे में दो लेख छपे. इनमें से एक में लिखा था कि जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम को कभी किसी से कोई दान, दक्षिणा, भीख नहीं चाहिए होगी. फिर छपा, भड़ास का संत्रास. इसके बाद भड़ास का ज़िक्र पांच योगदान में भी आया. इसका लिंक फेसबुक पे भी था. कुछ यों, "देश के महा भड़ासिए ने अब भीख मांगनी बंद कर दी है. वो अब रांडों या भांडों की तरह टुकड़ा फेंकने वालों के मर्सिये भी नहीं गाता. इधर पिछले कुछ दिनों से उसने अपने किसी रिश्तेदार के खिलाफ पुलिस कारवाई के विरोध में पत्रकारों से मदद भी नहीं मांगी है."

देश के महा भड़ासिए ने अब भीख मांगनी बंद कर दी है. वो अब रांडों या भांडों की तरह टुकड़ा फेंकने वालों के मर्सिये भी नहीं गाता. इधर पिछले कुछ दिनों से उसने अपने किसी रिश्तेदार के खिलाफ पुलिस कारवाई के विरोध में पत्रकारों से मदद भी नहीं मांगी है. 
journalistcommunity.com
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आज भड़ास ने वो दोनों लेख अपने यहाँ छाप लिए. मैंने उनको अपने पाठक बढाने के मकसद से अपने नाम या किसी भी लेख को साभार कह के भी छापने से मना करने के लिए एक मेल भेजी. एक और मेल भेज के ये भी कहा कि वे मेरे बारे में या मेरे विरुद्ध भी जो छापें. लेकिन मेरे नाम या लेख का इस्तेमाल न करें. इसके बाद हमें भड़ास के सम्पादक यशवंत से ये मेल मिली...

On Sat, Jan 21, 2012 at 2:38 PM, yashwant singh <yashwant@bhadas4media.com> wrote:

why boss. its saabhaar published article.
second, if you are publishing any article related with my name and brand, then why i can not publish that article on my platform, which you questioned.
regards


इस मेल से पहले यशवंत ने भड़ास पे मेरे पे जम के भड़ास निकाली. उसमें लिखा कि "मैंने अपने जीवन में कथित नैतिकता, सामाजिकता, दुनियादारी का बहुत ध्यान नहीं रखा. जो अच्छा लगता है वही करता हूं और लोग उसे कई बार गलत कहते हैं तो उनकी परवाह नहीं करता....आप मुझे गरियाना जारी रखें, और मैं अपना भीख मांगना. और, हां, मैं ऐसा भिखमंगा हूं कि मैं मदिरा पीता हूं और पीने के लिए भी चाहता हूं कि मेरे पाठक पैसे दिया करें. देते भी हैं. हैदराबाद वाले भरत सागर जी ने मुझे अपने पत्र में हजार रुपये का नोट भेजा था, दारू पीने के लिए, उस नोट से सच में मैंने दारू खरीदकर दो तीन दोस्तों को पिलाया और पिया. " नीचे जा के वे "अपन फटेला-फूटेला-थकेला-अकेला नहीं, मांगेला-धकेला-खाएला-लड़ेला है." पे भी उतरे हैं.बहरहाल उनकी भाषा शैली एक अलग बहस का विषय है. मगर कुछ पंक्तियाँ उन्होंने छाप देने के आग्रह के साथ इस मेल से भेजीं. उन्हें हम जस का तस छाप रहे हैं.

"यार फुटेला भाई,

अपनी तारीफ करने में क्या मुझे बिना वजह गरियाना जरूरी है? मैं तुम्हारी साइट आज देख रहा हूं ठीक से. फेसबुक भी देखा. कुछ स्क्रीनशाट अटैच कर रहा हूं. हालांकि कह सकते हो कि तुमने मेरा नाम नहीं लिखा है, लेकिन जो कुछ लिखा है, और अब जैसे जैसे आर्टिकल मेरे नाम लेकर पब्लिश किए हैं, उससे पता तो यही चलता है कि ये सब मेरे बारे में ही लिखा है. और मजेदार ये कि पांच योगदान लिखते समय तुमने अचानक बीच में भड़ास को गरियाना पेल दिया है... हंसी आ रही है तुम्हारी चिंतन लेखन शैली देखकर.

मैंने यार तुम्हारा भला नहीं किया होगा तो कुछ बुरा भी नहीं किया होगा. इस तरह किसी का अपमान करना ठीक नहीं होता.. ये पत्र इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि तुमसे काफी उम्मीद लगा रखी थी मैंने. पर तुम तो बेहद घटिया सोच वाले आदमी निकले भाई. अब जो भी लिखो, उखाड़ो, मेरे पर कोई फरक नहीं पड़ेगा क्योंकि तुम्हारे बारे में अब सही सही धारणा बना पा रहा हूं, तुम एक मेंटल केस हो, यह राइटअप देखखर कोई कह देगा. सिर्फ अपना लिखा पढ़वाने के लिए तुम दो लाइन भड़ास को गरिया रहे हो, और वही दो लाइन फेसबुक पर डाले हो ताकि सनसनी समझकर लोग पढ़ने को क्लिक करें... हद दर्जे की नीचता का काम है भाई... तुम्हें सीनियर और सींसियर मानता था लेकिन तुम बहुत छिछोरे टाइप आदमी निकले.

राइटअप व फेसबुक का लिंक अटैच कर दिया है.

यशवंत"


उनकी मेल आने के बाद उन्होंने अपनी साईट पे फिर जम के भड़ास निकाली है. तर्क का जवाब तर्क से न देने वाले किसी भी व्यक्ति की तरह कुछ भी कहा, लिखा है. ईश्वर उन्हें शांति, सद्बुद्धि और लम्बी उम्र दे.
-जगमोहन फुटेला