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Sunday, 25 December 2011

''मोरारजी देसाई सीआई के ‘स्टार परफार्मर जासूस’ थे''


भारतीय संस्थानों के पास यह सूचना पहले से थी कि पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई पर सीआईए का जासूस होने के आरोप लगाने वाले अमेरिकी पत्रकार सीमूर हर्श ने दरसअल अपनी किताब में इस तरह के गंभीर आरोप लगाने से पहले कुछ भारतीय अधिकारियों से संपर्क किया था।
हाल ही में सामने आए विदेश मंत्रालय के दस्तावेजों के अनुसार तत्कालीन विदेश मंत्री पीवी नरसिंह राव ने 1983 में संसद में हालांकि यह जानकारी दी थी कि हर्श ने अपनी किताब ‘द प्राइस ऑफ पावर : किसिंजर इन द निक्सन व्हाइट हाउस’ में देसाई के खिलाफ गंभीर आरोप लगाने से पहले किसी भारतीय अधिकारी से संपर्क नहीं किया था। दस्तावेज यह भी बताते हैं कि भारतीय राजनयिकों ने हर्श को यह भी संकेत दिया था कि विदेशी पत्रकार ने देसाई को 1971 में इंदिरा गांधी सरकार के मंत्रिमंडल का सदस्य बताकर गलती की थी।
पुलित्जर पुरस्कार विजेता पत्रकार ने अपनी किताब में आरोप लगाया था कि देसाई सीआईए के ‘अति महत्वपूर्ण’ जासूस थे और एजेंसी ने उन्हें 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान जानकारी देने के लिए 20 हजार डॉलर वार्षिक दिए गए थे। विदेश मंत्रालय की फाइल में इस विवाद पर दर्ज एक नोट के अनुसार, ‘हालांकि हर्श दूतावास से संपर्क में रहे क्योंकि अमेरिका में दूतावासों के जानेमाने पत्रकारों के साथ संपर्क में रहने का आम चलन है। इस तरह के अनौपचारिक संपर्कों में हमारे कुछ अधिकारियों को आरोपों के बारे में बताया गया था जिन्होंने संकेत दिया था कि उस अवधि (1971) के दौरान मोरारजी देसाई कैबिनेट में भी नहीं थे।’
यह नोट इस मुद्दे पर 18 अगस्त, 1983 को संसद में होने वाली चर्चा के लिए तैयारी का हिस्सा था। इस पैराग्राफ पर ‘केवल विदेश मंत्री की जानकारी के लिए’ लिखा था। जिसे कथित तौर पर नरसिंह राव ने सदन को नहीं बताया। हर्श ने अपनी 450 पन्नों की किताब में दावा किया कि देसाई सीआईए के जासूस थे जिन्हें उसके लिए पैसा मिलता था और एजेंसी उन्हें अपनी बहुत महत्वपूर्ण पूंजी मानती थी।
उन्होंने यह भी जिक्र किया था कि सीआईए के पूर्व अधिकारियों ने भारतीय नेता को ‘स्टार परफार्मर’ कहा था, जिनकी जानकारी पर तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के प्रशासन ने 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान भारत के प्रति अपने कठोर रुख को जायज ठहराया था। 1986 में 90 साल के रहे देसाई ने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज कर दिया था। उन्होंने इलिनाइस में अमेरिकी जिला अदालत में अपने वकील महेंद्र मेहता के जरिए पत्रकार के खिलाफ 10 करोड़ डालर का मानहानि का दावा किया था। मेहता को खुद 1975 में धोखाधड़ी का दोषी ठहराकर एक साल के लिए जेल भेजा गया था।
पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर और तत्कालीन सीआईए निदेशक रिचर्ड हेल्म्स ने यह बयान तक दिया था कि देसाई ने कभी किसी रूप में सीआईए के लिए काम नहीं किया और किसी भी तरह का उन्हें भुगतान नहीं किया गया। हालांकि हर्श से पहले कई तरह के आरोप लगे थे। 1979 में भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत डेनियल मोयनिहान ने अपनी किताब ‘ए डेंजरस प्लेस’ में आरोप लगाया था कि अमेरिका ने भारतीय राजनीति में दो बार हस्तक्षेप किया और कांग्रेस पार्टी को पैसा दिया। एक बार तो धन सीधे इंदिरा गांधी को दिये जाने का आरोप लगाया गया जो उस समय पार्टी की पदाधिकारी थीं।
देसाई 1992 में मामला हार गये। 1979 में प्रकाशित एक और पुस्तक ‘द मैन व्हू केप्ट सीक्रेट्स’ में लेखक थामस पावर्स ने भी आरोप लगाया था कि 1971 में भारतीय कैबिनेट के एक सूत्र ने अमेरिका को जानकारी दी थी। इस तरह के आरोप निक्सन और किसिंजर के स्मृति-वृतांत में भी लगे थे। साभार : भाषा

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