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Wednesday, 28 December 2011

जवाबदेही हिन्दी चैनल्स लाए हैं- अनिरूद्ध


 मुलाक़ात
Written by अनुरंजन झा
उन्होंने मीडिया सरकार के संपादक अनुरंजन झा से कम होती जा रही खोजी पत्रकारिता, स्टिंग ऑपरेशन सहित तमाम मुद्दों पर विस्तार से बात की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश-
आप काफी दिनों से पत्रकारिता कर रहे हैं, खासकर खोजी पत्रकारिता। आजकल प्रिंट और टेलीविजन पर ये चीजें दिखती नहीं तो आपको क्या लगता है की किस तरीके का बदलाव आया है।
खोजी पत्रकारिता के लिए आपके पास पैसा, समय और टैलेंट की जरूरत होती है। आज के मीडिया के पास न समय है, न टैलेंट है, न पैसा है, और न ही पैसा खर्च करने की चाह है। खोजी पत्रकारिता करने के लिए निरंतर अभ्यास की जरूरत होती है, क्योंकि आपका अभ्यास ही आपको कुशलता प्रदान करता है। यदि आपके पास टैलेंट नहीं है तो आप अपना काम ठीक से नहीं कर पाएंगे। वैसे भी अब जो नई फसलें इस क्षेत्र में आ रही हैं उन्हे खबरों की समझ नहीं है। आज का टेलीविजन तुरंत परिणाम की तलाश में है, इसमें लोगों की प्रतिक्रिया भी तुरंत देखी जा सकती है। लेकिन अगर देखा जाए तो खोजी पत्रकारिता को नुकसान इसलिए पहुंचा है क्योंकि इसमे आपको अपनी स्टोरी को काफी समय देना होता है, अपनी स्टोरी को नए तरीके से तैयार करने की जरूरत होती है और अपनी स्टोरी पर पैसा खर्च करने की जरूरत होती है। कई ऐसी स्टोरियां होती हैं लोग जिनके पीछे लगे रहते हैं लेकिन वास्तव में वो स्टोरी होती ही नहीं है। आप दस स्टोरी करने जाते हैं तो आपको दो स्टोरी मिलती हैं। लेकिन बाकी आठ स्टोरी पर भी आपके पैसे खर्च होते हैं तो कारण ये है कि किसी के पास इतना पैसा नहीं है कि वो इतने लंबा सोचे और खर्च करे।
आपको क्या लगता है कि पिछले 5-10 सालों में हम जो देख रहे हैं, लोग कह रहे हैं टेलीविजन आगे बढ़ रहा है।  टेलीविजन के सीनियर लोग जो चैनल चला रहे हैं, वो कहते हैं टेलीविजन आगे बढ़ रहा है। कुछ लोग कहते हैं खबर बिकती नहीं। आप भी वही कह रहे हैं कि खबर समझने की लोगों में वो बात नहीं रही। तो क्या हम ये मान लें कि सुधार की अब कोई गुंजाइश नहीं है?
आज से दस साल पहले आप 2001 तक आपके पास तीन चैनल होते थे, दूरदर्शन, आजतक और एक जी न्यूज़। इसके अलावा कोई चौथा चैनल था ही नहीं। आज करीब 70-80 न्यूज़ चैनल होंगे, 100 हो क्या पता और इस वातावरण में विजुअल का जो महत्व है, वो उभर कर सामने आता है। पहले कोई छोटी सी चीज़ जिसकी कोई जवाबदेही नहीं होती थी, आज उसकी जवाबदेही बहुत होती है। अक्सर आपने चैनल पर वीडियो देखा होगा कि देखिए पुलिस वाले किसी बंदे को कितना मार रहे हैं। तो वीडियो चल गया, उसका असर भी तुरंत होता है, पुलिस वाले सस्पेंड होते हैं। छानबीन होती है कि ये कैसे हो गया? ये जवाबदेही कभी सिस्टम में थी ही नहीं। ये जवाबदेही हिंदी चैनल्स लेकर आए हैं। ये इंग्लिश चैनल लेकर नहीं आए हैं। अब ये हिंदी और रीजनल्स चैनल में चल रहा है। आपको याद होगा कि कुछ महीने पहले एक वीडियो चला था कि सांसद ने एक बैंक अधिकारी को थप्पड़ मारा। अब देखिए की कितनी जवाबदेही से उसको कहना पड़ा कि नहीं साहब ऐसा नहीं था, वैसा नहीं था, खुद के बोले झूठ में पकड़ा गया वो। ये जवाबदेही सिस्टम में पहले नहीं थी। इन सब चीजो में बहुत ही हेल्दी इनपुट आया है, जो कि पहले नहीं था। एक आम आदमी की जिंदगी से संबंधित है ये और बहुत ही महत्वपूर्ण है ये। न्यूज़ पेपर का इतना प्रभाव नहीं पड़ता था जितना की इस एक विजुअल का और आपने ये भी देखा होगा कि ये जब पीछे पड़ जाते हैं, 8-10 चैनल इकट्ठा होकर उस स्टोरी को रगड़ने लगते हैं, तो सिस्टम में बहुत ही अकाउंटेबिलिटी आ जाती है, यह एक सकारात्मक पहलू है। मैं इसको बहुत ही सकारात्मक मानता हूं और अगर आप खोजी पत्रकारिता न ही कर रहे हों मगर सामान्य खबर को आप ऐसे कर रहे हैं तो ये सिस्टम में एक एंटीबायोटिक की तरह काम आता है
खोजी पत्रकारिता को लेकर किसी भी संस्थान में, चाहे वह एमसीआरसी हो, आईआईएमसी हो, या फिर सिम्बओसिस हो। कहीं भी इस तरीके की पढ़ाई है नहीं, तो क्या आपको ये महसूस होता है कि इसकी जरूरत है? 
दोनों में बहुत ही कम फर्क है जो अच्छी पत्रकारिता करता है, वो भी एक तरह की खोजी पत्रकारिता ही होती है। एक बहुत सीधी सी बात है, जब आप अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए पूरा समय देते हैं, अपनी स्टोरी पर ज्यादा पैसा खर्च करते हैं, लोगों से बात करते हैं, मामले की पूरी जांच करते हैं, इसके लिए आप यात्रा करते हैं, यह सब खोजी पत्रकारिता की विशेषता होती है। इसलिए हम किसी भी स्टोरी को खोजी नहीं कह सकते। लेकिन कुछ ऐसा है जिस पर आपने ज्यादा समय बिताया है, अपना पैसा खर्च किया है, अपनी कुशलता दिखाई है, आपने अपने संगठन में समय का निवेश किया है तो वहां आप एक खोजी रिपोर्ट करते हैं। अब इस पहलू पर आते हैं। आप देख सकते हैं कि खोजी पत्रकारिता पर मीडिया प्लेटफार्म पनपता है। लेकिन यह विश्वविद्यालयों और पॉलिटेक्नीक्स में कामयाब नहीं है। पत्रकारिता का यह ब्रांड व्यवसायिक मीडिया में कामयाब है। इसलिए इसे पॉलिटेक्नीक्स और मीडिया स्कूलों में सिद्धांत के रूप में पढ़ाने का कोई फायदा नहीं है। जब तक आप अपनी स्टोरी को समय नहीं देते और फील्ड पर जाकर उसकी गहनता से जांच नहीं करते तब तक आपको इसके बारे में कुछ भी समझ में नहीं आएगा। आप ये नहीं समझ पाएंगे कि खोजी पत्रकारिता आखिर है क्या? जब तक आप छात्रों को नहीं कहते कि वे बाहर जाएं और अपनी स्टोरी कवर करें और उसे आकर मैग्जीन या वेबसाइट्स पर लिखें यानि कि जब तक आप अपनी स्टोरी के प्रति अपनी कुशलता पूरी तरह से नहीं दिखाते हैं, तब तक सिर्फ इसे सिद्धांत के रूप में आप पढ़कर नहीं समझ पाएंगे।
खोजी पत्रकारिता में स्टिंग ऑपरेशन का कितना रोल होता है?
स्टिंग एक मिथ्या नाम है। मुझे स्टिंग ऑपरेशन शब्द किसी भी सूरत में पसंद नहीं है और मैं इसका इस्तेमाल बहुत कम ही करता हूं। देखिए जब भी हमहिडन कैमरे का प्रयोग करते हैं उसके चार-पांच मानदंड होते हैं। उनमें सबसे जरूरी यह होता है कि जो हम दिखा रहे हैं वो जनता के हित में है या नहीं। इसलिए स्टिंग ऑपरेशन का मतलब यह नहीं है कि आप कैमरा उठाकर कहीं भी चल दिए। इसके लिए आपको खुद कुछ मानदंड तय करने होते हैं। मानदंड का मतलब पहला यह कि उससे सार्वजनिक हित हो और दूसरा यह कि आप जो करने जा रहे हैं उसकी आपको पहले से जानकारी हो, आपको पता हो कि जो हो रहा है वो एक अपराध है या नहीं। मतलब यह कि ये कोई मछली पकड़ने का अभियान नहीं है। आपका रिपोर्टर जाता है फिर आकर आपको बोलता है कि साहब फलाने जगह पर ऐसी धांधली हो रही है। उधर कुछ गलत हो रहा है तो पहले से पता होता है कि कौन क्या कर रहा है? और फिर आप उसके अंदर जाते हो। इसका मतलब यह है कि पहले रिपोर्टर वहां जाए जांच पड़ताल करे और जानकारी लाकर दे। और तीसरा पहलू यह है कि वो जो कहते हैं न कि फंसा लिया साहब, ये फंसाना नहीं है इसलिए नहीं है कि मैं आपको एक उदाहरण देता हूं। मान लीजिए की आप कोई स्टोरी करते हैं जिसमे कोई सांसद 30,000 रुपए के लिए दक्षिण दिल्ली में अपना फ्लैट किराए पर देता है और आपको इस स्टोरी का खुलासा करना है। आप सांसद को पैसे के लिए पूछते हुए कैमरे में कैद कर लेते हैं, और आपको मालूम होता है कि कोई भी अपने सरकारी आवास को किराए पर नहीं दे सकता, यह गैरकानूनी है। आपको इन सबका खुलासा करना होता है, इसके लिए आप सांसद के पास जाते हैं और कहते हैं कि मुझे आपका घर एक साल के लिए किराए पर चाहिए, उसके लिए आप उसे एक करोड़ देने को तैयार हैं। इस तरह का प्रलोभन देकर किसी को फंसाना भी कानून के दायरे में नहीं आता। ये तो एक उदाहरण था जो मैने आपको बताया। तो कुल मिलाकर बात ये है कि मौका देखकर रूपयों का प्रोलोभन देकर किसी को फंसाना गलत है। तो यहां बहुत सारी ऐसी बातें हैं जिन पर भारतीय पत्रकार एक मत नहीं हो पाते। मेरा मतलब ये है कि जो कैमरा लेकर इस तरीके का काम करते हैं उन्हे इसे सुधारना होगा और अपने आपको भी सुधारना होगा।
आपको क्या लगता है की बीच बीच मे सरकार की तरफ से आता है कि इस पर कुछ नियम और कानून होने चाहिए, तो आपको ऐसा लगता है इसकी जरुरत है या स्व नियमक (सेल्फ रेगुलेटरी) होना चाहिये?

मुझे लगता है कि चैनल्स को खुद को जज करना चाहिए, लाइव इंडिया और इंडिया टीवी जैसे चैनल्स पर झूठी खबरें चलाना या फिर जब कास्टिंग काउच की बात आती है तो चारो-तरफ से उसकी निंदा भी होती है। क्योंकि ऐसा देखा गया है कि मीडिया अगर कुछ गलत दिखाता है तो उसकी आलोचना भी मीडिया ही करता है।


लाइव इण्डिया की स्टोरी के बाद आपको नहीं लगता कि स्टिंग ऑपरेशन खासकर टेलीविजन की अगर हम बात करें तो खोजी पत्रकारिता को नुकसान पहुंचा है, क्योंकि उससे पहले टेलीविजन पर काफी चीजें दिखती थीं?


मेरे विचार से ये पत्रकारिता को अस्थायी रुप से झटका था। जैसा कि मेरा मानना है कि आज के वक्त में लोगों को अच्छे डॉक्टरों पर ज्यादा विश्वाश है। हम जानते हैं कि एक अच्छा डाक्टर और एक बुरा डाक्टर होता है। अच्छा डॉक्टर तो अच्छा होता है। अगर आप बुरे डॉक्टर के पास जाते हैं और वो आपकी किडनी निकाल लेता है तो इसमें सारी गलती उस डॉक्टर की नहीं है। जब हम यह जानते हैं कि वह बुरा डॉक्टर है तो हम उसके पास गए ही क्यों? लेकिन इसके बाद ये भी नहीं कह सकते की सभी डॉक्टर एक जैसे होते हैं।


आपकी कोई स्टोरी काफी दिनों से नहीं आई है, और जो लोग आपको जानते हैं वो इस उम्मीद में बैठे हैं कि काफी दिनों से अनिरुद्ध कुछ नहीं लेकर आए हैं, तो शायद कोई बड़ा धमाका करने वाले हैं?


नहीं नहीं कोई धमाका नहीं हो रहा है। अभी मैं अपनी दो किताबों पर काम कर रहा हूं, इनमें से एक किताब अगस्त में आने वाली है। यह एक ऐतिहासिक उपन्यास है जिसमें ग्रीस का उल्लेख किया गया है। जिसे ग्रीस में दूत कहते है। यह किताब हल्फ क्लोन द्वारा अगस्त मे प्रकाशित की जाएगी। मैं एक अन्य किताब पर भी काम कर रहा हूं। मैं मूल रूप से समाचार मीडिया पर एक संक्षिप्त लेख लिख चुका हूं। और एक उपन्यास पर काम कर रहा हूं।


आने वाली पीढ़ी के युवा पत्रकार के लिये आप कुछ सुझाव देना चाहेंगे?


मेरे विचार से जो लोग मीडिया में ग्लैमर को देखकर आ रहे हैं, उन्हे पत्रकारिता में नहीं आना चाहिए। क्योंकि यह ग्लैमर उद्योग नहीं है। मेरा मतलब है कि आज के वक्त में जो युवा टेलीविजन एंकर को देख यह धारणा बना लेते हैं कि टेलीविजन एंकरिंग ही पत्रकारिता है तो यह उनकी धारणा गलत है। पत्रकारिता में बहुत मेहनत की जरुरत होती है।


कुछ बड़े पत्रकारों का मानना है कि अब पत्रकारिता में मिशन नहीं रहा आप क्या सोचते हैं ?


नहीं ये नहीं पत्रकारिता में बहुत ज्यादा मानसिक संतुष्टि के साथ पैसे की भी जरूरत होती है। यानी कि बहुत ज्यादा मानसिक संतुष्टि और समय के साथ अपनी स्टोरी में बदलाव ताकि आखिर में आपको महसूस हो कि आपने एक बेहतर भारत के निर्माण में भागीदारी की है। वैसे तो हम जानते हैं कि हम एक गरीब देश से संबंधित हैं और जो हमारे पास संसाधन हैं वो भी सही दिशा में नहीं जा रहे हैं। इसलिए पत्रकार के लिए यह जरूरी है कि वह स्टोरीज को कम और मुद्दों को ज्यादा उठाए।


बीच में आपका एक प्रोग्राम आया टोनी बी, क्या इस तरह का और कोई शो प्लान कर रहे हैं?


अभी तो नहीं लेकिन हो सकता है आगे करें। जो भी है यह मूल रूप से वॉकी साक्षात्कार था। जो कि समाजिक भी था और इसका एक हिस्सा पेज 3 के लोगों से भी जुड़ा हुआ था, और यह लोगों का अच्छा मनोरंजन कर रहा था।


जिस तरीके के लोग मीडिया में आए हैं, जिस तरीके से छोटे-छोटे अखबार शुरू हुए, नए टीवी चैनल्स आए। लेकिन जिस तरीके के लोग आए हैं मीडिया में चैनल खुलते हैं बंद होते हैं, खुलते भी हैं तो ठीक से चल नहीं रहे, लोगों को सैलरी नहीं मिल रही है, तो क्या इसमे सरकार को कोई कदम उठाना चाहिए?


नहीं नहीं कोई स्टेप नहीं लेना चाहिए ये तो अच्छा है कि चैनल खुल रहे हैं तो उस समय नौकरियां होती हैं, ज्यादा नौकरियां होती हैं। लोगों के पास एक ऑप्शन होता है जाने का। बीच में एक खबर आई थी कि सरकार बंद कर रही है, टेलीविज़न लाइसेंस देना। मुझे लगता है कि सरकार का यह कदम ठीक नहीं है। हम आजाद देश के निवासी हैं। संविधान के अनुच्छेद 19 में हमें आजादी का अधिकार मिला है। इसलिए कुछ लोग अगर चैनल खोलने आते हैं तो आएं हम उन्हे रोक नहीं सकते और इसके लिए कोई भी निवेश कर सकता है। लेकिन ये सारे काम देश के कानून के हिसाब से हों। कोई किसी को अपनी अभिव्यक्ति प्रदान करने से वंचित नहीं कर सकता।
( यह लेख मीडिया सरकार डाट .कॉम से साभार लेकर लिया गया है )

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