ज़्यादातर पत्रकार साथी मजबूर थे, बाकी या तो ज़्यादातर पत्रकार साथी मजबूर थे, बाकी या तो कायर थे या चापलूस


 दैनिक जागरण प्रबंधन द्वारा पत्रकारों के सामने परोसे गए कागज़ में लिखा था कि इस पर वे स्वेच्छा से हस्ताक्षर कर रहे हैं लेकिन साथ में मौखिक आदेश ये था कि या तो साइन करो या रिसाइन करो : दुष्यंत कुमार का एक शेर है-- ''पक गई हैं आदतें, बातों से सर होंगी नहीं, कोई हंगामा करो, ऐसे गुज़र होगी नहीं...'' और इस शेर को यहां लिख देने का मकसद ज़रा भी ये नहीं कि इस लेख का साहित्यिक सौंदर्य बढ़ा दिया जाए, बल्कि हम में से ज़्यादातर को अब कहीं न कहीं अंदर से ये अहसास तो होता ही होगा कि हमारे पेशे के हालात लगभग ऐसे ही होते जा रहे हैं, और अगर अब हंगामा नहीं हुआ तो गुज़र वाकई मुश्किल होने वाली है।
मीडिया में फैले आतंकवादी पत्रकारों-सम्पादकों और उनके रवैये के खिलाफ़ लम्बे समय तक लिखता रहा, किसी ने तारीफ़ की, किसी ने गालियां दीं और ज़्यादातर ने समझाया। गुरु सम्पादकों और पत्रकारों ने कहा कि तुम अति उत्साही हो और कई बार जितनी गालियां सम्पादकों और साथी पत्रकारों को लिख डालते हो, दरअसल वो उतने बुरे नहीं हैं। तय हुआ कि कुछ दिन न लिख कर देखा जाए, वैसा ही किया भी गया। वर्तमान पत्रकारिता की दशा को लेकर इधर कम से कम लिखा लेकिन दरअसल हालात ऐसे नहीं हैं कि शांत रहा जाए और धैर्य की परीक्षा में खुद के अनुत्तीर्ण होने की प्रतीक्षा की जाए। जागरण में कर्मचारियों के साथ हाल ही में चल रही ज़्यादती ने मीडिया संस्थानों के तानाशाही, फासीवादी और अनैतिक रवैये के खिलाफ दोबारा माहौल बना दिया है।

पहले बात ये कि दरअसल हुआ क्या, मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों पर अमल के लिए सरकारी दबाव बनते ही सबसे बड़े अखबार होने के होर्डिंग्स देश भर में लगवा देने वाले दैनिक जागरण को अचानक ये अहसास हुआ कि उसके पास तो कर्मचारियों को देने के लिए पैसे ही नहीं है, और जो मेहनताना वो अपने साधारण कर्मचारियों को दे रहा है वो इतना शानदार है कि उन्हें सैलरी हाइक जैसे शब्दों को भाषा और विचार दोनो से ही बाहर कर देना चाहिए और जागरण प्रबंधन ने तुरंत एक कागज़ गढ़ा। कागज़ की भाषा से स्पष्ट है कि उसको गढ़ने में वकीलों से लेकर जागरण के तमाम जनवादी-महान पत्रकारों की राय भी ली गई और सर्वसम्मति से अपने ही पत्रकारों का खून चूसने वाला एक सहमति पत्र तैयार हुआ। इस कागज़ की तस्वीरें आप सब पहले भी देख चुके हैं, एक बार फिर देखें।

इस कागज़ में साफ लिखा था कि जागरण के तमाम पत्रकार साथियों को अपने वेतन-भत्तों से कोई शिकायत नहीं है और इसलिए मजीठिया वेतन बोर्ड की किसी सिफारिश को लागू करने की कोई ज़रूरत नहीं है। प्रबंधन के हर फैसले में उनकी सहमति है, और ये सिफारिशें न भी लागू हों तो उन्हें फ़र्क नहीं पड़ता। कागज़ में लिखा था कि इस पर वे स्वेच्छा से हस्ताक्षर कर रहे हैं लेकिन साथ में आदेश ये था कि या तो साइन करो या रिसाइन करो। ज़्यादातर पत्रकार साथी मजबूर थे...बाकी या तो कायर थे या चापलूस...सो अमूमन सबने एक अनैतिक...अवैधानिक...और अतार्किक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर कर दिए। लेकिन बरेली यूनिट के दो साथियों ने साहस दिखाया और पत्रकारीय गरिमा का निर्वहन करते हुए, इस पर साइन करने से इनकार कर दिया।

इसके बाद  जैसा कि अंदेशा था, यूनिट के हेड ए एन सिंह ने दोनो युवा पत्रकारों को अपने केबिन में बुलाया और वही ज्ञान दिया जो अमूमन सभी संस्थान के स्वामिभक्त या चालू भाषा में चापलूस पत्रकार करते हैं। इन दोनों को नौकरी जाने से लेकर आगे कहीं का न रहने तक की धमकी दी गई। कहा गया कि मीडिया में कहीं काम नहीं मिलने दिया जाएगा। ए एन सिंह अगर इसे झुठलाते हैं, तो हमारे पास इसके भी प्रमाण हैं हालांकि उसे अभी प्रस्तुत न करना हम सही समझते हैं। खैर दोनो पत्रकारों का निश्चय दृढ़ था सो दोनो अपने निर्णय पर अडिग रहे और उस कागज़ पर हस्ताक्षर नहीं किए।

इसके बाद  कुछ दिन सब कुछ ठीक ठाक  चला लेकिन 13 दिसम्बर को जागरण के कानपुर दफ्तर  से पंकज पांडेय (वो वहां जिस  भी पद पर हों, रुचि नहीं) ने फोन कर के इन दोनो को अगले आदेश तक दफ्तर न आने का आदेश दिया। साहस से न डिगते हुए इन दोनों पत्रकारों ने ये आदेश लिखित में मांग लिया और न मिलने तक दफ्तर में काम करने का निर्णय लिया. तब से अभी तक स्थिति वैसी ही है, आदेश लिखित में आया नहीं और ये दोनो दप्तर छोड़ कर गए नहीं। इसके बाद इनके एक साथी प्रभात तिवारी ने भी इनके कदम से कदम मिला लिया, दरअसल ये तीन युवा एक नज़ीर हैं, एक नज़ीर जो बता रही है कि आगे क्या होने वाला है। क्रांति के व्यापक युद्ध हमेशा छोटी चिंगारी से शुरु होते हैं, जो हम जागरण में देख पा रहे हैं। यकीनन इसे भी दबाया जाएगा पर ये समझना अंतरिक्ष विज्ञान नहीं कि इसके दबने से मामला और बढ़ेगा और बदलाव को कोई रोक नहीं पाएगा।

खैर मामला  यहीं थमा नहीं है ताज़ा  ख़बर ये है कि 17 दिसम्बर को मामले की गंभीरता देख  मालिकान भी बरेली यूनिट  आ रहे हैं और उम्मीद है कि अब इन तीनों को और धमकाया-डराया-समझाया जाएगा। लेकिन इनमें से दो से मेरी जो बातचीत हुई  उस आधार पर इनका निश्चय दृढ़ समझ में आया और ऐसे में  अब अगर ये किसी वजह से पीछे भी हट जाते हैं तो इनको सलाम करना चाहिए क्योंकि इन्होंने प्रतिरोध की शुरुआत तो की।

वक्त बेहद बुरा है और यकीनन सबसे अच्छा  वक्त आने के पहले का वक्त सबसे बुरा ही होता है। प्रतिरोध की ज़मीन तैयार होते देखना  अपने आप में सुखद है, तमाम और लेख हो सकता था इस मामले  पर आक्रोश में लिखे जाते पर यकीनन मैं संतुष्ट और खुश हूं क्योंकि कम से कम कहीं से प्रतिरोध शुरु तो हुआ और वो भी नई पीढ़ी की ओर से। जिन्होंने अमेरिकी  क्रांति पढ़ी है वो बोस्टन टी पार्टी का महत्व जानते  होंगे और सच मानिए ये घटना मीडिया में मालिकों-सम्पादकों  और मठाधीशों के अनाचार-अत्याचार-दलाली  और शोषण के खिलाफ बोस्टन टी पार्टी साबित होगी। आशुप्रज्ञ  और तृप्ति शुक्ल को मेरा सलाम।

पर सवाल ये है कि बाकियों का क्या? क्या हमारे वरिष्ठ पत्रकार इस मामले पर चुप्पी साधे रहेंगे या कुछ बोलेंगे...और आप साथियों...क्या केवल आर्थिक मदद कर देना हल है, क्या आप नहीं चाहते कि माहौल बदले...दुर्भाग्य है कि हम टोपी लगा कर मैं भी अन्ना का नारा तो गर्व से लगा देते हैं पर जब हक के लिए लड़ने की बात आती है तो टोपी में ही छिपने की कोशिश करते हैं। आशु और तृप्ति का मकसद सिर्फ हंगामा खड़ा करने की नहीं है, बल्कि सूरत बदलने की है...हो सकता है कि कल को वो भी डर जाएं...दब जाएं...या दबा दिए जाएं...पर इससे उनके किए की कीमत कम नहीं हो जाएगी। पर आप चुप रहे तो ये आगे आपके साथ बी होगा और यकीन मानिए अगर माहौल ऐसा ही रहा तो आपके हमारे साथ भी कोई नहीं खड़ा होगा...मार्टिन नीलोमर की दूसरे विश्व युद्ध की वो कविता याद है न...

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं  मजदूर संघी नहीं था

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था.
तय करने का वक्त आ गया है कि हमें किधर खड़ा होना है, पूंजीपतियों  के शोषण के साथ या अपने उन साथियों के साथ जो शोषण के खिलाफ आने वाले सुनहरे कल का सूरज रच रहे हैं।
लेखक मयंक सक्सेना युवा और तेजतर्रार पत्रकार हैं. लखनऊ के रहने वाले हैं. कई न्यूज चैनलों में विभिन्न पदों पर काम कर चुके मयंक सक्सेनाहैं. मयंक ने माखनलाल से पत्रकारिता की डिग्री लेने के बाद कुछ दिनों तक यायावरी की. जी न्यूज से जुड़कर करियर की शुरुआत की. वहां से सीएनईबी पहुंचे और फिर नौकरी छोड़कर कई महीने विचरण करते रहे. सीवीबी न्‍यूज (पूर्व में यूएनआई टीवी) में काम किया और वहां से भी इस्तीफा देने के बाद कई महीने तक भटकते रहे. इन दिनों 'न्यूज24' चैनल के साथ जुड़े हुए हैं.जनपक्षधर पत्रकारिता के लिए सक्रिय रहने वाले मयंक विभिन्न मसलों पर अपने बेबाक बयान और लेखन के लिए जाने जाते हैं. उनसे संपर्क 09310797184 याmailmayanksaxena@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. मयंक के लिखे पुराने लेखों-संस्मरणों आदि को पढ़ने के लिए क्लिक करें- भड़ास पर मयंक
Sabhar:- Bhadas4media.com
ज़्यादातर पत्रकार साथी मजबूर थे, बाकी या तो ज़्यादातर पत्रकार साथी मजबूर थे, बाकी या तो कायर थे या चापलूस ज़्यादातर पत्रकार साथी मजबूर थे, बाकी या तो ज़्यादातर पत्रकार साथी मजबूर थे, बाकी या तो कायर थे या चापलूस Reviewed by Sushil Gangwar on December 17, 2011 Rating: 5

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